Thursday, July 30, 2009

भारत का आउटसोर्स्ड प्रधानमंत्री और उसकी निर्लाजता !!!!!!!!!!!!!!!

सवर्प्रथम बड़े आदर और सम्मान के साथ मैं आदरनिये प्रधानमंत्री सरदार श्री मनमोहनसिंह जी से उनकी देश को विगत में की गई सेवा और उनकी अद्व्भुत कार्यशैली के लिए साधुवाद देना चाहूँगा।

  • श्री मनमोहन सिंह जी बड़े विन्रम, सौम्य, सरल, निष्ठावान, कुशाग्र, विद्वान, वफादार (किस के पता नही), इमानदार, स्पष्ट, नेक, साफ़ छवि वाले, बेदाग, समर्पित, अध्ययनशील, विकास उन्मुखी, प्रगतिशील, आधुनिक, खुले विचारो के, धार्मिक, अराजनैतिक वियक्ति है। बस पिछले १० - १२ सालो में मैंने इतना ही इस महान शक्सियत के बारे में सुना है। कभी नही सुना की देशभक्त भी है की नही, कभी नही सुना की जिस आम आदमी का कचूमर निकाल दिया उसके प्रति भी कुछ सोच है की नही।

बस बड़े ही डरावने तरीके से कही परदे के पीछे से एक हाथ हिलाते हुए आते है और पता नही फ़िर कहाँ आझोल हो जाते है। यह उस लोकतान्त्रिक और आधुनिक युग की बात कर रहा हूँ जब की आपको यह भी पता होगा की अमिताभ के पोते का नाम क्या होगा या धोनी की गिर्ल्फ्रैंड कौन है परन्तु है कोई माई का लाल जो बता दे की १२० करोड़ लोगो के देश के प्रधानमंत्री के घर के कौन सदस्य है। खैर मेरा आज का मुद्दा यह है ही नही। यह तो इस शख्स की रहस्यमय और अबूझ शक्सियत के बारे में हमारी उत्कंठा है।

  • ऐसे कई मुद्दे है जो मनमोहन सिंह जी के वियाक्तित्व को सुलझा सकते है जैसे की एक मुद्दा परमाणु समझोते से सम्बंधित है आप याद करे की श्री मनमोहन सिंह जी ने समझौता करते हुए एक बार भी यह तर्क नही दिया की देश के हित में है की नही बहुत से तर्क दिए कोमुनिस्ट को रूडीवादी और अंधी अमरीकी विरोध के बारे में, यह भी बताया गया की अब भारत अंधेरे से मुक्त हो जाएगा, यह भी की अब हम प्रगति करेंगे परन्तु हौले से भी यह नही बताया गया की किस कीमत पर। क्या भारत कोई राष्ट्र है भी की नही या अन्धो की जमात भर ही है जिनको परमाणु समझोते के बल्बों की सुर्ख रौशनी से अपनी आंखे चौन्ध्वानी भर है। नही बताया गया की प्रधानमंत्री की राष्ट्र की निष्ठां से कोई सरोकार है भी की नही। परन्तु प्रधानमंत्री की घोर वियाक्तिवादी और एकपक्षीय (अमरीकी) सोच इस ५००० साल के भारत राष्ट्र की प्रतिब्द्ताओ पर भारी पड़ने की निर्लाजता तो की ही है।

  • आज तक सरदार मनमोहन सिंह यह नही बता पाए की रौशनी के लट्टू इस समझोते से चलने के आलावा भारत की प्रतिष्ट के कितने लट्टू फियूज किए है। हमे बताया जाए की मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री है या अमेरिका के हिंदुस्तान में लट्टू मंत्री?

  • दूसरा हमे मनमोहन सिंह जी ये बताये की पाकिस्तान सम्बन्धी नीति पर फन्ने खा बनने का फितूर कहाँ सवार हुआ? न तो पाकिस्तान पर निर्णय करने की आपकी नैतिकता है, न आप हिंदुस्तान के चुने हुए सांसद है (लोगो द्वारा) , न आप बहुमत के प्रधान मंत्री है, न आपका कोई जनाधार है , न आप कोई राजनैतिक व्यक्ति है, आप तो एक परिवार विशेष द्वारा चुने हुए एक मनोनीत व्यक्ति मात्र है। फ़िर किस इकबाल पर आप और किस नैतिकता पर आप पाकिस्तान जैसे गंभीर विषय पर अपने अल्प ज्ञान का परचम लहराए। मैं फ़िर कहेता हु की आप व्यक्ति बहुत अच्छे हो सकते हो परन्तु प्रधानमन्त्री के नाते तो आप बुहुत ही कुरूप और निकृष्ट हो।

मैं आज आप को एक कहानी भी सुनाता हु, जरा ध्यान से सुनना फ़िर जाकर अइना देखना की खड़े कहाँ है। टीवी चैनलों के सिंह इस किंग वाले गाने से आप मत भरमा जाना। नही तो आपमें और बारहा मन की धोबन देखने वाले मेलो के बच्चो में कोई अन्तर मुझे नही दीखता है।

राजा विक्रमादित्य के समय में एक द्वारपाल था। एक दिन महाराज के पास आकर राजा को बताता ही की राजा आप कल शिकार पर अकेले मत जाना नहीं तो वहा पर आपको विश्राम करते समय वृक्ष के नीच एक बहुत विषैला सर्प दंस मार देगा जिस से आपकी मृत्यु हो जायेगी। राजा कहेते है ठीक है एसा नहीं होगा में अपने साथ तुम्हारे कहेने से कुछ सैनिक भी लेता जाऊंगा. परन्तु उस जंगल में पिछले कई वर्षो से जाता हूँ। मुझे नहीं लगता की वहा पर किसी विषेले सर्प का वास है. अगले दिन राजा जंगल जाता है. उसको आराम करने की आवश्यकता होती है. परन्तु अपने सैनिको को पेहेरेदार की बात याद कर अपनी सुरक्षा के जिम्मेदारी छोड़ कर सो जाता है. फिर स्वपन के हिसाब से सर्प आता है परन्तु जैसे ही फन फैलाकर राजा को डसता है तभी चौकस सैनिक उसको मार गिराते है. राजा की जान बच जाती है. राजा तुंरत महल वापस आकार उस पेहेरेदार को बुलावा भेजता है. और उस से पूछा की आप तो बिलकुल सही थे परन्तु आप बताये की आपको पता कैसे चला इस घटना का. तो पेहेरेदार राजा को बताता है की जिस समय मेरा रात के पहेरा होता है मुझे उस समय नींद आती है और उस समय में मैं जो स्वपन देखता हूँ वो निश्चित रूप से सच होते है. राजा सुन कर उसे कल दरबार में आने के लिए कहेता है. पेहेरेदार सोचता है अब राजा को मेरी कीमत का पता चला है. अगले दिन वो राजदरबार में पहुचता है राजा उसे इनाम देता है और अपनी नौकरी से इस्तीफा देने के लिए कहेता है. सभी लोग यह सुन कर आश्चर्यचकित होजाते है. तभी राजा कहेता है हे पेहेरेदार तुमने हमारी जान बचाई इस के लिए हम तुम्हारे आभारी है उसके लिए हमने आपको अपने व्यक्तिगत कोष में से इनाम देदिया है परन्तु आप ने अपनी नौकरी के वक्त अपने कर्त्तव्य का पालन न कर कर सोकर दंड का कार्य किया है. इसलिए आपको पद मुक्त किया जाता है. आपका जो काम रात को राज्य की रक्षा करना था वो आप करने में असमर्थ रहे और किसी भी वक्त दुर्घटना के समय आपका सोते रहेना राज्ये पर आक्रमण के समय हार का कारण बन सकता है. हो सकता है आप व्यक्तिगत रूप से मुझे अच्छे लगते हो और मेरी जान भी बचाई है परन्तु आपने अपनी पहरेदारी की पात्रता से अन्याय किया है इसलिय उस से आपका पदमुक्त होना ही शासन के लिए सही होगा.

  • तो मित्रो इस कहानी के जरिए मीडिया में बैठे भोपूओ को मैं बता देना चाहता हूँ की हो सकता है मैं सरदार मनमोहन सिंह के व्यक्तिगत गुणों से प्रभावित हु और वो अच्छे भी हो परन्तु जरुरी नहीं की उनके यह गुण उनकी प्रधानमंत्री की पात्रता के उपयुक्त ही हो. इसलिए जो आपने प्रधानमंत्री काल के दौरान अपने कार्य के नमूने दिए है उनसे आपकी प्रधानमंत्री की पात्रता पर गंभीर प्रशनचिंह लगते है. उचित होगा आप आपने कार्य से इस्तीफा देकर आपने अध्भुत गुणों से कोई रिलेशनशिप फर्म चलाये प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं. परन्तु आप न राजा हरिश्चंद्र है जो स्वम सिंहासन छोडेंगे और न वो कांग्रेसी विशेष परिवार राजा विक्रमादित्य है जो आपको पदमुक्त करेगा. और न हम ही मगध की प्रजा जो लोकतंत्र की ताकत को समझ सके.

  • चलिए अब बात करते है आपके तथकथित गुणों के बारे में एक एक करके सब से पहेले प्रशन आता है आपके अर्थशास्त्री होने के लाभ का. तो बता दू वो दावा भी एक दम झूठा है. हमे आपके अर्थशास्त्री होने का एक भी लाभ नहीं मिला। क्योंकि यदि कांग्रेस दावा करती है की नरेगा उसकी देन है तो कतई भी आप उसको लागु करने के पक्ष में नहीं थे. दूसरा आज जो महंगाई है वो आपके गुणों की चाट है जिसको आपका आम आदमी अपनी खाली उंगलियों से चटखारे ले ले कर चाट रहा है. संसेक्स आप के प्रधानमंत्री काल में पाताल में चला गया है. होम लोन मिल नहीं रहे है.

  • प्रगतिशील भी आप कभी नहीं थे और न आप चाहते होना। आप ढोंगी है और दम्बी है जिसने अटल सरकार की स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क निर्माण को ही ठेंगा दिखादिया। उसी सरकार की देन गावों को शहरो से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना का आपने गला घोंट दिया। इसलिए न तो आप हमारी प्रगति ही चाहते और न ही आप प्रगतिशील है.

  • तीसरा आप सभ्य और सोम्य भी नहीं है यदि होते तो रूस में पीछे राष्ट्रपति जरदारी से मिलते वक्त शिष्टता बरतते. आपने व्यक्तिगत संबंधो के प्रोटोकाल को तोडा बड़ी ही असभ्यता से व्यक्तिगत बातो को आपने मीडिया को बड़े उचे स्वर में कहा जिसको कोई भी सोम्य और सभ्य नहीं कहेगा. इसलिए यह दावा भी आपके बारे में खोखला है.

  • चोथा लोग आपको वफादार कहेते है जोकि बिलकुल ही गलत है. आप सबसे पहेल प्रणव मुखर्जी के निचे काम करते थे. आज आप उनसे चिड़ते है. फिर नार्सिम्म्हा राव ने गुमनामी के अँधेरे से निकाल कर वितमंत्री बनाया. वो बेचारा जिन्दा रहेते आपके सहयोग से महरूम रहा. मरने के बाद उसके नाम से एक स्मारक दिल्ली में नहीं बन सका. उसके बच्चे आप से मिलने को आज भी तड़फते है. पर मजाल है जो आप कभी उनसे मिलने का समय दिया हो. तो इसकी क्या गारंटी है की कल अमरीका की गोद में बैठ कर आप सोनिया गाँधी और कांग्रेस को उसकी औकात नहीं दिखा देंगे. अरे औकात तो आपने साढे चार साल आपकी पालकी ढोने वाले कोमुनिस्ट को भी दिखा दी. तो सहभ आप इस्तिमाल करो और फैंको की नीति के दक्ष खिलाडी है. इसलिए ये गुण भी आपका परचित मात्र एक ढकोसला भर है।

  • अब आता है आपके विनम्रता के भावः की बात तो मैं बता दू वो भी एक दम गलत है. आप न कभी विनम्र थे और न है। आप को याद दिला दूँ की आपकी पहेली बार सरकार बनाने के तुंरत बाद आपने अपने संसद भवन के कमरे में प्रतिनिधि मंडल लाये अडवाणी जी के मुहं पर सरे आम कागज फैंके थे. और अभी हाल फिलाल आपने चुनावो के समय अडवाणी जी पर आरोप लगाते हुए अपनी असभ्यता का परिचय दिया था. जब अडवाणी जी ने शिष्टाचार वश हाथ जोड़े थे और आपने उनका अभिवादन भी स्वीकार नहीं किया था. इसलिए आप की विनम्रता का वो असली और नंगा सच था.

  • रही बात आपके स्पष्ट व्यक्ति होने की बात तो संसद में अभी चलते आपके बयान से पता चल जाती है की आप कितने स्पष्ट है। आप की घोर अस्पष्टता के कारण ही आपकी कांग्रेस पार्टी, आपके संरक्षक गाँधीपरिवार, भारतीये संसद, विदेशमंत्रालय और विपक्ष में अनिश्चता का माहोल है. तो आप ही बता दे की आप कितने स्पष्ट है. और फिर इस घोर अनिश्चिता का कारण आपकी स्पष्टता की ही विफलता नहीं है.

  • खैर अब बात आती है आपकी विद्वता की तो आपने जो साँझा बयान पाकिस्तान के साथ अभी दिया है और उस लिखित बयान में जो त्रुटी जिसका की आपके शंकर मेनन जी दावा करते है। तो अपने समझ के बहार है की एक घोषित रूप से हिंदुस्तान का विद्वान जो की उसके प्रधानमंत्री की पात्रता का मुख्य स्तम्भ है और जो रिजर्व बैंक का गवर्नर रहा है और सयुंक्त राष्ट्र की मोटी पेंशन लेता है. उसकी ड्राफ्टिंग में भी त्रुटी है वो भी अंग्रेजी में. तो भाई इसका मतलब आपने इंग्लॅण्ड की ऑक्सफोर्ड पर भी कालक मल दी. जब आप क्लर्की का काम भी नहीं कर पा रहे हो तो कहाँ की विद्वता. और जिसके पीछे हिंदुस्तान संसारभर में हंसी का पात्र बने उस की विद्वता पर फिर हम क्यों खिल्ली उडवाय.

  • हाँ इन सब गुणों में आप खुले विचारो के तो है वो मैंने स्वीकार कर लिया। आप की ही सरकार में सेम्लेगिकता का विचार इस भारत को मिला है जिस से पता चलता है. की वाकई इस गुण की पात्रता तो आप में है ही. जिस से मैं तो कम से कम सहमत हूँ ही.

  • अब में कुछ आपके चाटुकारों पर भी आता हूँ जो आपके सिख होने की वजह से काफी दम भरते है। जो सिख भाई है उनको बता दू की हिन्दुओ के रक्षक परम पूजनिय प्रात समरनीय आदरनिये श्री गुरु गोबिंद सिंह जी जिनकी एक सिंह दहाड़ से मुसलमानों के अंतडियो में पानी सूख जाता था. या वो महाराजा रंजित सिंह जो पंजाब का शेर था. क्या सिख भाई देखते है की श्री मनमोहन सिंह जी उस परम्परा के वाहक है. यह में उन ही पर छोड़ता हु. मुझे कोई शक शुबहा नहीं की वो भी रंजित सिंह जैसा ही हिंद शासक पसंद करेंगे।

अंत में प्रधानमंत्री जी अनुरोध करूँगा की आपकी नोबल पुरस्कार की चाहत पर इस ५००० वर्ष के राष्ट्र को बलि न चढाया जाय. और कांग्रेस से अनुरोध करूँगा की भारत सुपर पावर बनेगा जब चीन के नेताओ से राष्ट्र प्रतिबधता सीखोगे. किसी राष्ट्र पर रीड विहीन राष्ट्राध्यक्ष थोप कर और उसकी कलाबजिया देखकर नहीं. निर्णय आपका है तब तक सिंह (परन्तु जंगल का नहीं) इस किंग.

Wednesday, July 29, 2009

भारत में कौन है सबसे शक्तिशाली?????????????

इस प्रशन को यदि युधिष्ठर से पूछे यक्ष पर्श्नों में भी शामिल कर लिया जाए तो प्रशन शीघ्र नही मिलने वाला। और इस प्रशन को शीर्षक बानाने का उदेश्ये भी पिछले कुछ दशको के भारतीये और वैश्विक इतिहास के गेहेरे परन्तु भयंकर अश्चार्जनक खूंखार समुन्द्र में गोता लगाना भी है।
मुझे यह एक बात बहुत ज्यादा कचोटती भी और दिग्भ्रमित भी करती है की हिंदुस्तान की वो कौनसी शक्ति है जो हिंदुस्तान से जुड़े इन अतिमहत्वपूर्ण चीजो का निर्धारण करती है. और कौन मेरे इन कुछ एक घोर आश्चर्यजनक तथ्यों के उत्तर दे सकता है।
  • हिंदुस्तान की संसद को पता नही की भारत की विदेशनीति क्या है?
  • हिंदुस्तान की सरकार को पता नही की विदेश नीति के नाम पर किसका बंटाधार किया जा रहा है?
  • हिंदुस्तान के विदेश मंत्री को पता नही की उसके मंत्रालय में क्या हो रहा है।
  • वो क्या मिश्र देश में अदभुत शेक (जूस) का रसपान होगया की हिंदुस्तान का प्रधान मंत्री एक महीने पहेले जरदारी के सामने राजा रंजित सिंह की दहाड़ से विसरित हो कर अनारकली के घुंघुरू की भांति रसिकता का श्रृगांर करके हिंदुस्तान की नाक को अरब के घोडो के नीचे रुन्दवा आया।
और इस भारत की विदेश नीति को विध्वंस नीति को कौन बना रहा है। उसको सामने लाया जाए और सम्मानित किया जाए की भारत को इस कद्र बेचोगे तो तुम हो ही परन्तु रद्दी के भाव क्यों?
  • दूसरा मेरा प्रशन था की क्यों भारत सरकार ने प्रियंका वढेरा और उसका वढेरा परिवारू, राहुल गाँधी को ताउम्र के लिए सुरक्षा से छूट दे रखी? अब इस प्रशन को मेरे गाँधी परिवार से कोई इर्ष्या को न माना जाए। बल्कि एक बहुत ही गंभीर बात है की एसा क्या है जो इनको अति अति विशिष्ट व्यक्ति का तमगा दे कर संविधान में संशोधन तक की हद तक चले गए। यह कोई छोटी बात नही है की की भारत जैसे देश इनको उस अति विशिष्ट और वो भी ताउम्र के लिया इन को खासुल खास बनाया गया है। मैं सोचता हूँ जहाँ शंकराचार्य भी अपने २००० वर्ष पुराने ध्वज को चेक कराते है। जहाँ पूर्व राष्ट्रपति के जूते खुलवा लिए जाते है वहां एसा क्या अलाद्दीन के चिराग का तेल है की इनको अपने एलिजाअबेत ब्रिटिश महारानी की समान विशेष अधिकार देकर हिंदुस्तान के नागरिको का राज परिवार अघोषित रूप से बना दिया। वो गायत्री देवी भी आज स्वर्ग चली गई जो इन ही की दादी इंदरा जी के राज परिवार के विशेषा अधिकार ख़त्म करने के विरूद्व लडाई करती रही। परन्तु अब कुछ कुछ वैसे ही अधिकार उसके पोते और पोतीया एन्जोये कर रही है।

  • तीसरा प्रश्न मेरा दो प्रतिशत कोट पैंट और टाई पहेने ९८ प्रतिशत धोती वाले लोगो पर रौब गाठने पर है। यह टाई पहने जो अंग्रेजी के हर वाक्य के पीछे न (जैसे वी आर गोइंग न ) जैसे अद्भुत वाक्य विन्यास करते नजर आते है। मैं दावे के साथ कहेता हूँ जिस अंग्रेजियत पर भारत के ये दो प्रतिशत लोग अकड़ते फिरते है इन में से ९८ % लोग अंग्रेजी में एअसे है जैसे तरबुजो के बीच आलू बुखारे. अंग्रेजी का एक वाक्य बिना (न) के सहारे पूरा नहीं कर सकते. मित्रो अभी विदेश में था मैं तो एअसे ही कुछ हिन्दुस्तानी अंग्रेजो से पाला पड़ा तो मुझे हँसे बिना न रहा गया। अंग्रेजी एअसे बोलते जैसे की अब यह वाक्य न समझ आया तो अपना बल प्रयोग भी करेंगे और जिस (न) का मैंने ऊपर जिक्र किया उसका इस्तेमाल तो वाक्यों में एअसे करते है जैसे मुहं में टुकडा देकर उसको ठूंस कर हलक में उतरने का प्रयास करते हो. चलो थोडा से मैंने इसी बात पर ज्यादा जोर दे दिया परन्तु उदेश्य यह बताने का है की यह १०० करोड़ लोगो के दो प्रतिशत और उसमे भी ९८ % अंग्रेजी भाषा में अल्प अंग्रेज भाषी (हर अन्ग्रेजी वाक्य के पीछे 'न' पर जोर देने वाले) मीडिया और हिंदुस्तान की नीतियो के करता धरता है.

  • चौथा प्रशन मुझे हिंदी मीडिया के सभी मुर्धन्यो और पत्रकारों से पूछना है जो की संसार के सबसे बड़े, सबसे ज्यादा बिकने वाले और सबसे अधिक विस्तृत किसी भी भाषा के अखबारों से ज्यादा यह हिंदी के अखबार मुख्य धारा की राजनेतिक खबरे क्यों नहीं छापते। अंग्रजी अख़बार ही सारे स्टिंग ओपरेशन करता है। अंग्रेजी अखबार ही सरकार की आलोचना करता है। सारे विवादित और प्रमुख पत्रकार और मुख्य लोग अंग्रेजी अख़बार में ही लिखते है और हिंदी के अखबार हमे कभी मुख्य समाचार दिल्ली में हुई चार हत्या, भोपाल में हुई सड़क दुर्घटना, और पटना में हुई बारिश की ही खबर पढाता रहता है। खैर टीवी की तो मैं बात ही नहीं करना चाहता। और उसी दिन अंग्रेजी के अख़बार भारत सरकार की सभी नीति निर्धारण और सरकार की संसद में हुई या केबनेट में हुई मुख्य बातो पर कई पन्ने छाप देता है। अब दोबारा यह ही प्रशन उठता है की यह अंग्रेजी मीडिया ही देश की गंभीर मुद्दे पर चर्चा क्यों करता है क्यों ९८% हिन्दुस्तानियो के अखबार के पाठक गंभीर बातो को जानने से वंचित रहे। इस बात के लिए सारे हिंदी मीडिया पर मेरी तरफ से थू थू है। यह हिंदी मीडिया के लोग अपने प्रोफेशन से खिलवाड़ और देश के साथ देशद्रोह कर रहे है। आप उदहारण के तौर पर आज ही के अख़बार देख लो अंग्रेजी अखबारों में विपक्ष के मुख्य बिंदु है और हिंदी अखबारों में प्रधानमंत्री का ओपचारिक भाषण और विपक्ष के यशवंत सिन्हा की अति महत्वपूर्ण बाते अंदर के किसी पन्ने के कोने में है. क्योंकि हिंदुस्तान के लोकतंत्र की ताकत का दम भरने वाले यह अख़बार वाले बड़ी चालाकी से उसी लोकतंत्र के रक्षक और वोटरों को महत्वपूर्ण नीतियो की जानकारी न देने का महापाप करते है और उनसे वोट डलवाते प्याज के मुद्दे पर, खरबुजो के बीजो पर, सड़क के स्पीड ब्रेकरों पर, नालियो के बंद होने पर, रोडवेज की बसों के किराये बढ़ने पर और मित्रो बाद में हमे ही और विदेशियो को भी बताते है की इस बार हिंदुस्तान के वोटरों ने बड़े जज्बे और जागरूकता से प्रधानमंत्री की विनवेश नीति/ विदेश नीति/ और वगैरह वगैरह पर स्पष्ट बहुमत दिया. अरे भइये उस वोटर को तो पता ही नहीं की किस चिडिया की नीति के बात कर रहे हो. और उसको तो आपने अँधेरे में रखा उसको तो अपने इंडिया गेट की बारिश से भीगती युगल जोडियो और कार्टून कोने में ही व्यस्त रखा और अब अपने स्वार्थ के लिए उसका मन चाह विश्लेषण कर रहे हो मतलब की गधे की गलती और धोभी की धुनाई.

  • तो भाई सबसे ताक़तवर वोटर तो नहीं है वो तो २ % चाटुकार है जिसने हिंदुस्तान के लोगो को मुर्ख बनाने की तनखाह लेनी है। एअसे ही अपने स्वार्थो के लिए इ वी एम् मशीनों को बना दिया। भारत के वैज्ञानिको का कमाल, विदेशो में ख्याति प्राप्त मशीन और न जाने क्या क्या भारत के आदमियो को भरमा दिया. क्योंकि अब उसको गौरवशाली मशीन और भारत के गौरव से जोड़ दिया अब उसपर तो प्रशन लग ही नहीं सकता यदि लगा तो भारत के गौरव से खिलवाड़ है।

  • इस तेरहे से भारतीय लोकतंत्र का आम भारतीये को मुखोटा पहेना दिया। अब उसकी आड़ में कुछ भी कर लो जो की आज कल भारत सरकार कर रही है. ऊपर से तुर्रा यह की भारत के जागरूक मतदाता ने इस (नीति ढकोसले) को भारी मतों और भरोसे से जीताया है. अरे शिखंडी टाइप नौटंकी बंद करो और भारत के लोगो को कबूतरी लीला मत करवाओ. जो करना है करो परन्तु इस भारत ने न तो सरदार मनमोहन सिंह को चुना और न उसके बलूचिस्तान की प्रेम कथा की नाटक मंचन प्रस्तुति को.

  • इस के आगे इन शिखंडियो ने संविधान के साथ भी यह ही किया है अपने आप और अपनी कलंदरी कलाओ के लिए ४२ संसोधन कर लिए परन्तु कांग्रेस के आलावा उसमे कोई और पार्टी कुछ करे तो अम्बेडकरवादी दलितों को सामने कर देते है की महान विचारक, चिन्तक और दलित चेतना के पुरोधा के मानसिक विचार जो उन्होंने भारत के संविधान के रूप में कागज के रूप में उकेरकर किताब की शकल में हमारे ऊपर ठोक दिए को कांग्रेस के आलावा कोई भी बदलने की गुस्ताखी नहीं कर सकता।

  • अब मित्रो ऊपर की सभी बातो के बाद मुझे बता दो की इस देश में सर्वशक्तिमान है कौन? अरे तुम तो भेड़ हो और गडरिया तुम्हे हांक रहा है.और गले में मारा सांप लटकाए घूम रहे हो की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का लंगूर तुम ही हो.भाई मना नहीं करता की तुम नहीं हो परन्तु देखो तो और खास तौर पर क्षत्रिये और हिंदी भाषी अख़बार वाले की संसद में क्यों अंग्रेजी अखबार की प्रतिया ही लहराई जाती है? क्यों तुमको इतना सम्मान भी नहीं मिलता? इसका जवाब भी मित्र तुम ही हो क्योंकि तुम हिंदुस्तान की असली ताकत और उसके लोगो को समाचार और सुचना न देकर उसको अँधेरे में रखने का महापाप कर रहे हो. और यह अंग्रेजी के २% लोग ही देश के सर्शक्तिमान है और इनके ही नेता प्रियंका और राहुल है इसलिये वो भी विशेष अधिकार के पात्र है.

  • बाकि मेरे और आपके जैसे है जो इंडिया टीवी पर "एअ सी पी अर्जुन" और चटकारे लेकर "वारदात" देख रहे है और देश के २% लोग भविष्य की भारत की विदेश नीति का सौदा कर रहे है. और बाद में हम लोग ही भारी बहुमत से उसको वोट देकर मोहर लगायेंगे अब यह इतर बात है की हम मोहर तो अपने मोहल्ले में सड़क चौडी करने और नगर का सौन्दर्यकरण न होने पर उतेजित होकर वोट देने गए थे. और रातो रात इन ही पत्रकार मोहदय ने हमे देशी की विदेश नीति पर वोट देने वाला जागरूक वोटर करार देकर इतिहास के पन्नो पर महान घोषित कर दिया. और हमे पता भी नहीं की हम इतने बड़े जागरूक है की विदेशो के लोग हमारी जागरूकता पर शोध कर रहे है. इसी को ही तो कहेते है की माँ मर गई अँधेरे में और धी (बेटी) का नाम लालटेन .

  • देखा नहीं अपने अभी कांग्रेस को सत्ता में लाने का हमारे सभी मीडिया भाइओ ने क्या वियाख्या दी है के भारत के नागरिको ने साम्प्रदायिक बीजेपी को नकार दिया. और इटली की महान नेता और दिव्ये गुणों से ओतप्रोत, मानवता और त्याग की प्रतिमूर्ति और उनके टोपीधारी देशभक्त संघठन कांग्रेस को भरी बहुमत देकर सरकार बनाने (देश बिगाड़ने) का अवसर दिया. अब यह अलग बात की जो ११६ सीट बीजेपी ने जीती है उसके सभी मतदाता एका एक साम्पर्दायिक होगए. सुन रहे है चुनाव आयोग वाले की नहीं।
    धन्य हो प्रभु ९८% लोगो की भावनाओ को अभिवियक्ति देने के लिया। इतिहास आपके कारनामो को याद रखेगा. और देश के इन सर्वशक्तिमान लोग को भी.

Sunday, July 26, 2009

एक बहुत ही गंभीर प्रशन ?????????????

आज सब कुछ एसे घटित हो रहा है जैसे संजय धृतराष्ट्र को सब कुछ सच सच बता रहा है और धृतराष्ट्र बस संजय आगे चलो के आलावा कुछ भी नही बोल रहा है। आज हम कुछ कुछ धृतराष्ट्र के समान ही व्यवहार कर रहे है। हिंदू राष्ट्र के बारे में कल्पना तो बहुत ही दूर की बात है अब तो अपनी असिमिता बचानी ही भारी हो गई है।

आज समय आगया कुछ कडियो को जोड़ कर देखने का ताकि कुछ तो हिंदुस्तान के लोग अपनी झुकी आंखे ऊपर उठा कर द्रौपदी चीरहरण को रोकने का साहस करे। एक सज्जन थे जसवंत सिंह जी जिन्होंने राव सरकार में एक भेदिया होने की बात कही थी और परमाणु परिक्षण इसी के सूचना लीक करने पर बाद में रोक दिए गए। दूसरा हवाला डोभाल साहब की किताब से मिलता है। इन घटनाओ के बाद भारत में आकास्मक सप्रंग की सरकार बन गई। फ़िर सारे जनमत के खिलाफ होने के बावजूद अमरीका से परमाणु करार होगया। और लाखो किसानो की आत्महत्या, शेयर बाजार की औंधे मुह गिरे होने, लाखो बेरोजगारों , लाखो नौकरियो के छुटने, महंगाई के आसमान छूने और पिछली सरकार के घोर नैतिक पतन होने, आम जनता के एक व्यापक दिखने वाले विरोध के बावजूद कांग्रेस पहेले से भी अधिक बहुमत से सरकार बनने में कामयाब हो गई। उस बीच मीडिया ने चुनाव में सभी म्हेत्व्पूर्ण घटनाओं और चर्चाओं पर से ध्यान हटाकर वरुण गाँधी पर ही फोकस कर दिया इसमे एक नही सभी चैनल थे। कांग्रेस ने इस से पहेले विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद चुनाव आयोग में चावला साह्भ को फिट किया। और भी बहुत से समवैधानिक पदों पर कांग्रेस ने जनमत विरोधी और परम्परा विरोधी कृत्य किए। प्रधानमंत्री के एक राज्यसभा उमीदवार को लोकसभा में चुनाव में न उतारकर एक गैर लोकसभाई व्यक्ति को नहेरु के बराबर इतिहास में दूसरी बार प्रधानमंत्री बनवा दिया। सबसे बड़ा और घनघोर आश्चर्य मुझे उस समय के कांग्रेसी लोगो पर था जो चुनाव में कांग्रेस की वापसी की बात कुछ एसे कहे रहे थे जैसे की सूरज पूर्व से निकलता है तो अगली सरकार कांग्रेस की ही बनेगी। और भी बड़ा अचरज नम्बर दो स्थान रखने वाले सरकार में मंत्री प्रणव मुखर्जी का बिहार में लालू को अगली सरकार में न रखने का खुले आम निर्णय सुनना एक बहुत ही बड़े गुप्त रहस्ये को खोलता है। मीडिया का बाद में बीजेपी का बैंड बजाना भी इसी साजिश का एक हिस्सा है। कुरैशी जो की चुनाव आयोग के मेंबर है अकेले ही लन्दन में बैठे बैठे ही भारत में आम चुनावो की तारीखों की घोषणा कर देते है। और अब तो इलेक्ट्रोनिक मशीन का चुनाव में किसी एक विशेष दल को जिताने का आरोप इन सभी कडियो को आपस में जोड़ कर एक बड़ी तस्वीर बनाता नजर आता है।

अब आते है आज के हिंदुस्तान की बदलती तस्वीर पर पहेली बात बिना किसी बात के भारत पर बलूचिस्तान शरारत का आरोप पाकिस्तान के साँझा बयान पर स्थापित कर दिया गया है। हिंदुस्तान को जी ८ में मुह की खानी पड़ी। हिंदुस्तान को इसी पाकिस्तान से मुंबई के अपराधियों को सजा दिलाये बिना बात शुरू कर दी है।

मित्रो पश्चिमी देश हिंदुस्तान मैं २०० साल शासन कर के और ८०० साल की गुलामी से त्रस्त हिन्दुओ को नही झुका पाए। नही जान पाए की यह हिंदुस्तान इतना गरीब असहाए होते हुए भी अपने पर अभिमान क्यो करता है। कहेते है यूनान मिश्र रोमन सब मिट गए जहाँ से परन्तु हस्ती हिन्दुओ की नही मिटती जहां से। क्योंकि हिन्दुओ में नैतिकता थी और उसी नैतिकता की थाती पर वो अभीमान करता था। उसकी बहु बेटी नाचती जरुर थी पुरातन काल से क्योंकि संगीत और नृत्य हिन्दुओ की शोभा थी परन्तु उसे आईटम गर्ल बना कर उसने नही नचाया था। आज हिन्दुओ की नैतिकता उनसे छिनी जा रही है। कभी सेम्लिंगिकता के नाम पर तो कभी स्टार प्लस के सच के नाम पर। अरे हिंदुस्तान में जो बातें कभी घर से बहार नही आई वो आज सरे आम टीवी पर दिखाई और बोली जा रही है। और कैसे कैसे कुतर्क दिए जा रहे है ओ चार पैसे के राजीव खंडेलवाल (इस शो का एंकर) क्या बताना चाहता है हमे तू स्टार प्लस के चार पैसे में बीके हुए भाड़े के हमे बाताना चाहता है क्या तू की सच बोलना और बुलवाना तुझे आता है। इतना ही सच का पुजारी है तो क्यों नही अपनी जनम की पुरी कहानी हिंदुस्तान को बता देता एक एक क्षण के साथ। फिर देखते है की सच कैसे सामने आता है। आज हिंदुस्तान में जो रिश्तो की गरिमा थी उसको तार तार किया जा रहा है और हम सब टीवी पर पालतू पिल्लै की तरह देख रहे है। आज शब्दों से आपकी इज्जत उतारी जा रही है कल हाथो से उतारी जायेगी। धीरे धीरे तुम्हे नंगा किया जा रहा है। नही याद तो करो याद जब इसी स्टार प्लस पर बे वॉच दिखाया गया था तो कितना बवाल हुआ था परन्तु अब तो बे वॉच एक आम बात हो गई अब तो बे वॉच छोड़ो अपनी हिन्दी फिल्मो में गे वॉच कर लो। कुछ कुतर्की जिन्हें गोबर में भी विटामिन ढूंडने में महारथ है वो कहे भी सकते की देखो आप विरोध कर रहे थे अब तो सब नोर्मल है। भाई नोर्मल तो है परन्तु नंगा होने में एक दम से अंतर्वस्त्र नही गिरता पहेले पगड़ी गिरती है जो की गिर चुकी फ़िर कमीज़ उतरती है वो भी उतर गई अब पैंट उतर रही है अभी नही संभले तो फ़िर इसी का नंबर है। और बिगाड़ने का क्या है बिगडेगा तो नंगा होने भी कुछ नही बस बात तो समझने की है। की इन्सान ही बना रहेना चाहते हो या जानवर। कुत्ते बिल्ली भी नंगे ही घूमते है परन्तु हम नही। इस क्यों को जानने और समझने वाला इन्सान ही है और उसी नंगाई को गले लगना चाहते हो तो कुत्तो को आप पर फक्र होगा परन्तु इंसानों को नही। अब हर कुतर्क का उत्तर तो मेरे भी पास नही।

हाँ जहा तक मेरी बात है मुझे कोई भी ओब्जेक्शन नही है परन्तु इसको एक रणनीति के तहेत हिंदुस्तान को अनैतिक बनने की चतुराई पर क्रोध है। क्योंकि राम, रामायण, मन्दिर, वेद, देश छीन ही लिया ले देकर परिवार नामक इकाई थी जिसको १००० वर्षो से गुलामी में भी नही गवई परन्तु ये टीवी के भेडिये उसी पर नजर टिकाये है। हाँ इस बार आक्रमण अपनों से ही है। आजकल टीवी में छोटे शहरों के लड़के लड़किया है। इस बार इस वार से बचना मुश्किल है क्योंकि वार कमर के निचे है। यह कम पढ़े लिखे पैसे और नाम के लालच में बिल्कुल भदेस भाषा में टीवी पर बैठ कर नंगाई पर भाषण झाड़ रहे है। और हमे बता रहे है प्रगतिशीलता क्या है ओ दस दस पैसे में अपनी बेचने वालो याद रखो तुम्हारा इस्तेमाल हो रहा है। तुम्हे नही पता की लोहे की कुल्हाडी में लगा लकड़ी का दस्ता न होता तो लकड़ी के कटने का रास्ता न होता।

और याद रखो नही सुधरे तो फ़िर डंडे के आगे नंगे और भूत दोनों ही भागते है। संभल जाओ नही तो इस बार देश माफ़ नही करने वाला।

अंत में मित्रो ऊपर की दोनों लाल और नीली घटनाओं को जोडो तो पता चले गा की एक में नीति बन रही है और दूसरी में परिणाम है। अब देखना यह है कीयह नीति हिन्दुओ और उसके देश को कितना अनैतिक बनाएगी. इस अनैतिकता का दाम क्या है? और लाभ क्या है? परन्तु जितना सरल लगता है और उतना है नही क्योंकि यह पुरी एक नसल को ही ख़तम कर देगी।

और फ़िर कहेते रहेना की किसी एक समय में एक हिन्दू होता था. जैसे की तिब्बती अपने बच्चो को कहेते है की किसी एक समय उनका एक देश तिब्बत होता था. आज बता दू हिन्दू की नैतिकता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है जो उसे आज तक जिन्दा रखे है. और अब निशाना उसीको बनाया जा रहा है. देखना यह है की हिन्दू फिर से एक घनघोर संकट से कैसे बहार निकलता है. मित्रो याद रखना हम कर्म के लिए धर्म का धागा नहीं छोड़ते. और धर्म नैतिकता है.

Thursday, July 9, 2009

क्यों अजमेर पर ही चादर जाती है? शिव पर किसी का गंगा जल क्यों नही?

मैं आज बात करना चाहता हूँ उस ढोंग की जिसको हमारा कोरपोरेट वर्ल्ड का हिंदू तबका भी करता है। क्योंकि सबसे ज्यादा गाफिल यह ही तबका है। सन्दर्भ और भी महत्वपूर्ण तब बन जाता है जब आम हिंदू इन को अपना नायक बनाना चाहता हो। और सही भी है, भाई आर्थिक प्रगति का युग है यदि हिंदू, धीरू भाई अम्बानी और श्री लक्ष्मी मित्तल को अपना आदर्श बना भी लेते है तो ग़लत क्या है? यह लोग तो अब प्रतिक बन ही गए है। परन्तु गहरई से विश्लेषण करने से पता चलता है की मुद्दा आर्थिक रूप से संपन्न और तथाकथित एलिट क्लास के सबसे ज्यादा भ्रम से जुडा है। और आज मैं उनको ही बतलाना चाहता हूँ की क्यों भारत असली में सेकुलर नही है और जिसको तथाकथित सेक्लुरिसम कहा जाता है वो खाली मुसलमानों की चिरौरी और ढोंग मात्र है। अब निर्णय आपका है की इन को आप अमेरिका के नेताओ की तरह सेकुलर माने और चीन के नेताओ की तरह अपने देश के बारे में स्पष्ट राय वाले। या नहीं। क्योंकि सुपर पवार भी तो बनना है।

  • सबसे पहले मुझे कोई यह बात बताये की यह मानसून के लिए सोनिया जी और बड़े धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नेता अजमेर शरीफ पर ही क्यों चादर चढाते ? क्यों नही शिवजी पर गंगा जल या हर की पौडी पर आरती करा देते। क्यों एसा नही होता की भारत के कबिनेट मंत्री सावन के महीने में अपने हाथो से शंकर जी पर जल चढ़वाने के लिए जल देते और फोटो खिंचवाते जैसे की जियारत पर जाने वालो को प्रधानमंत्री जी, सोनिया जी और बाकि ओदेदार देते है और पूरी बत्तीसी का फोटो खिंचवाते है? मुझे एक बात और समझ नहीं आती की दो फर्लांग की ये चादरे भेजते फिर रहे है क्यों यह एक हाथ छोटी चुनरी माँ वैष्णव देवी पर चढाने को किसी को नहीं भेजते?

  • भाई तुम लोग और मीडिया मुशरफ या और किसी मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष के आने से उसके ताजमहल जाने और अजमेर जाने के लिए बड़ी हायतौबा मचाते हो। कभी ढाका जाओ तो ढाकेश्वरी देवी के दर्शन भी करलिया करो, पाकिस्तान जाते हिंगलाज देवी के भी दर्शन करलिया करो। या केवल वो बीजेपी वालो का ही काम है। तुम क्यूँ यह भगवानो को भी सुविधा के हिसाब से बाँट लेते हो

  • क्यों भारत देश और उसके राज्ये मंत्री छुप छुप कर पूजा करते है? क्यों सामूहिक रूप से पूजा में शामिल नही होते?

  • क्यों पूजा अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए ही करते है? परन्तु राष्ट्र की बात आती है तो तुंरत सेकुलर हो जाते है? क्या इसका मतलब मैं यह न निकालू की जब अपने स्वार्थ की बात आती है तो सही, और सच्चा भगवन का रास्ता परन्तु जब राष्ट्र की बात आती है तो झूटी धरमनिर्पेक्षता। यह झूटी नौटंकी क्यूँ? यह दोहरा चरित्र क्यों? यह दोरंगा व्यहवार क्यों? जब अपनी बेटी और बेटे की शादी करनी हो तो गौत्र और जन्मपत्री क्यों? परन्तु राष्ट्र की जन्मपत्री की बात करू तो खिल्ली क्यों उडाई जाती है? जब इन नेताओं को अपने घर में सेम्लेंगिक पसंद नही तो देश में पसंद क्यो? जब व्यक्तिगत त्याग नही कर सकते तो सामूहिक त्याग की अपेक्षा क्यों?

  • जब सोनिया जी दशहरे में राम लीला मैदान में रावन पर तीर छोड़ती है और प्रधानमंत्री रामनवमी पर बधाई देता है तब फ़िर राम मन्दिर और राम सेतु पर राम को क्यों नाकारा जाता है यह आधा अधुरा राम क्यों? क्यों वो लालकिले के रामलीला मैदान में जोश से भरे राम भक्त और रामलीला कमिटी की विचित्र राम भक्त इन से प्रशन का उत्तर नही मांगते? क्यों वो पत्रकार प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के रामनवमी की बधाई संदेश लिखते सोचते नही की किस राम के जनम की बधाई छाप रहे हो जिस राम को न वो मानते और न उनकी सरकार उसके अस्तित्व को स्वीकारती।

  • होली पर किस जनता को रंग लगाते हो? प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति क्यों विकलांगो और बच्चो के साथ होली मनाते है? क्यों उनपर होली के दिन रंग लगा कर बधाई देते है? जब इतिहास परुष राम को नही मानते तो वैदिक देवता विष्णु को कैसे मान सकते हो? तब किस प्रहेलाद की जीने और होलिका के मरने की खुशी में होलिका दहन करते हो?

  • दीवाली पर यदि हम लक्ष्मी पूजन करते है तो बता दू यह एक तांत्रिक अनुष्ठान है जो दुनिया के सभी हिंदू करते है। कोर्पोरेट वर्ल्ड के वो धुरंधर भी करते है जो सेंसेक्स के जगमग सितारे है। क्योंकि अमावस की रात वो एक बहुत ही शुभ समय होता है लक्ष्मी पूजन का तो फ़िर बाकि हिंदू विधि और अनुष्ठान को हिकारत भरी नजर से क्यों देखा जाता है?

  • देश की गौरावशाली सेना के सैनिक क्यों दुश्मन से लड़ते हर हर महादेव, जये बजरंगबली और भारत माता का नारा लगा कर उसके हलक में से प्राण खींचते है? क्यों नही सरकार उन्हें कोई अल्फा वन या राजीव गाँधी और मोहन दस करम चंद गाँधी का नारा लगवा लेती . राष्ट्रपिता तो बहुत बड़ी चीज होता है तो क्यों सरकार सैनिको और पुलिस के लिए एक सर्कुलर निकलवा देती (जो की अब तो २०७ सीटे आगई हैं और भी आसान है) की कल से सभी सैनिक किसी भी युद्घ से पहले हुंकार भरते हुए जवाहर लाल नेहरु, राजीव गाँधी या महात्मा गाँधी की जय बोलेंगे। नहीं करोगे तुम क्योंकि तुम्हे अपनी जान प्यारी है और देश को बेवकूफ बनाने के लिए १०० करोड़ हिन्दू है ही । जब तक यह हैं तुम अपनी दोरंगी अफलातूनी जोकरी करते रहोगे।

मुझे समझ नहीं आता हिन्दू लोग इन नेताओ से कुछ कहेते क्यों नहीं? क्या उन्होंने वास्तव में दब्बू और बेवकूफ बनने का निश्चय कर लिया या फिर इस हिन्दुस्थान के अन्दर ही कोई और दुनिया ढूंड ली है।

  • जो सरकार कुम्भ के मेले पर करोड़ खर्च करने का बजट बनाने का स्वांग करती है। जो हिन्दुस्थान की मीडिया और एडवरटाईसमंट कंपनिया कुम्भ के मेले से करोडो कमाती है। जो सोनिया गाँधी और नेता अपने मोक्ष के लिए गंगा में अपने पाप धोकर आते है। वो इसके पीछे की वैदिकता को क्यों नहीं स्वीकार करते। जब गंगा में नहाने से मोक्ष होता है तो फिर जिसकी जटाओ से गंगा निकली है वो शिव भी होता है। और शिव है तो उसकी काशी भी होती है। तो फिर उस पर मंदिर क्यों नहीं होता?

  • मित्रो, गला फट गया हज, अमरनाथ, सब्सिडी, मदरसों की दोरंगी नीति के खिलाफ बोलते परन्तु इन नेताओ से कोई पूछे जिस अमेरिका की तुम बीन बजाते रहते हो उसकी सारी नीतिया क्यों नहीं मानते? जो प्रोफेशनल और कंपनी डारेक्टर भारत सरकार पर हर अमेरिकी नीति का अनुसरण करने का दबाव बनाते है वो इस सरकार को संसद सत्र अमेरिका स्टाइल में वैदिक मंत्रो से क्यों नहीं करने को कहते? अमेरिका तो पराये हिन्दू धर्मं को अपनाने के लिए उत्सुक हैं और हम अपने धरम को अपनाने की नक़ल भी नहीं कर पर रहे।

  • ओ कोर्पोरेट के धन्ना सेठो, तिरुपति पर करोडो चढाने वालो, वैष्णो देवी पर लंगर करवाने वालो, सावन में शिव भक्तो को भंडारे करवाने वालो, अपने कार्यालय में गणेश जी की मूर्ति रखने वालो। जब तुम सब कुछ मानते हो तो उसको राष्टीय स्तर पर, सामूहिकता में क्यों नहीं स्वीकारते? क्यों इस प्रकार का स्वांग करते हो? क्यों नहीं ऑफिस में राम राम कह सकते? क्यों देश के सेकुलर नेता अपनी सीट बचाने के लिए देवी देवताओ के चक्कर लगाते है और जीतने के बाद उसी राम को नकारते है जिसके की चरणों में अभी अभी लोटे लोटे फिर रहे थे । यह किस प्रकार की भीरुता और ढकोसला है। जब तुम सभी व्यक्तिगत तौर पर भगवान् को मानते हो। जिसके की तुम्हारे हाथो पर बंधी वो डोरी चुगली करती है। अपने ऊपर आते हर दुख से बचने के लिए भगवान् के हर जगह माथा टेकते हो। तो फिर २६ जनवरी के या १५ अगस्त के दिन लाल किले से जय श्री राम और हर हर महादेव का नारा क्यों नहीं? एसा क्या डर है जिसकी हमे जानकारी नहीं जो तुम्हे अपने हिन्दू संस्कार को सामूहिक रूप से प्रर्दशित करने से रोकता है? वो कौन सी शक्ति है जो तुम्हे झूठा जीवन जीने के लिए प्ररित करती है?

  • ए़सी क्या बात है की जिस लालू यादव को सपने में भगवान् शंकर आते तो है और बताया भी जाता है परन्तु जब काशी में मंदिर की बात आती है तो हलक में सहारा मरुस्थल का सुखा पड़ जाता है। वो मुलायम जो अखाडे में बजरंगबली की शपथ खाता हैं राम मंदिर के नाम पर दस्तावर हो जाता है।

  • मित्रो वो कौन सी शक्ति है जो १०० करोड़ वोट की परवाह न करने से रोकती है? परन्तु १० करोड़ के लिए शीर्ष शासन। ए़सी कौनसी शक्ति है जो आई आई टी और कैट की परीक्षा देते तो हर भगवान् के चक्कर लगा लेंगे परन्तु मंदिर की बात आते ही राम सेवको को हिकारत की निगहाओ से देखेंगे। एसा क्यां हैं उन अभिनेताओ और अभिनेत्रियों में जो शुक्रवार को पिक्चर रिलीस होने से पहले सिद्दि विनायक की चोखट पर जाएँगी और इन वैदिक अरध्यो के समाज में समानजनक स्थिति को तुंरत राजनीती कह कर पल्ला झाड़ लेंगे। जब फैक्ट्री या कंपनी की नीव के वक्त पूजा हो सकती तो राष्ट्र के लिए पूजा क्यों नहीं?

  • बड़ा प्रशन इस दोहरे चरित्र को जीने के पीछे कारण जानने का है। की वो कौनसे कारण हैं जो सच को सच बोलने से रोकता है। भगवान् को भगवान् कहने से रोकता है। १०० करोड़ हिन्दुओ के देश में अपने अरध्यो के नाम से संसद, लालकिले या इंडिया गेट पर एक ध्वनि में सामूहिक रूप से श्रद्धा और भक्ति से "जय श्री राम" और "हर हर महादेव" को कहने से रोकता है। जब सरहद पर सैनिक हर हर महादेव और जय श्री राम के नारे लगा सकते है तो मैं गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर क्यों नहीं? कौन मुझे अपनी सच्ची भक्ति राष्ट्र के लिए करने से रोकता है? जब मैं अपनी भलाई के लिए अपने परिवार के साथ अपने ग्रहप्रवेश हवन या यज्ञ से कर सकता हूँ अपना और अपने बच्चो का जन्मदिन सुबह मंदिर जा कर या घर हवन कर कर मनाता हूँ (इन सभी सेकुलर नेताओ की तरेह) तो इन ही नेताओ के साथ देश का जन्मदिन क्यों नहीं मना सकता? इन की "न" के स्वांग के पीछे क्या कारण है?


और जब मैं यह नहीं कर सकता तो फिर मैं इस देश को अपना समझने का स्वांग ही करूँगा। जैसा की सभी कर रहे है। और शायद इसीलिए इस देश में लोग देश की अस्मिता की कीमत पर देश को ही दाव पर लगाने से नहीं हिचकते। जब लोग अपनी आत्मा को अलग कर के देश से प्यार का स्वांग करेंगे तो देश का यह ही हाल होगा जो पिछले 60 वर्षो से होता आ रहा है। और सरकार जबरदस्ती झूठा देशभक्ति का पाठ पढ़ा रही है। यदि यह न होता तो सरकार अभी तक परम पूजनीय प्रात: स्मरणय , महान देश भक्त वीर सावरकर के नाम पर एक छोटे से पुल के नामकरण पर करोड़ हिन्दुओ को अपमानित न करती। मुझे नहीं पता फिर कैसे देश के लोगो में देशप्रेम की हूक उठेगी। अब तो स्वांग बंद करो।

गृहमंत्री जी मैं भी बहुत शर्मिंदा हूँ !!!!!!!!!!!!!!!!!!

आज कल लगता है शर्मिंदा होने का मौसम चल पड़ा पहले अपने आदरनिये प्रधान मंत्री जी १९८४ के सिख नरसंहार पर शर्मिंदा हुए। फ़िर सोनिया जी बाबरी ढांचे के विध्वंस पर शर्मिंदा हुई, फ़िर राहुल बाबा कलावती की हालत पर शर्मिंदा हुए और अपने पिता से १० कदम आगे जाकर १५ पैसे ही गरीब की झोली में जाने की बात कह पुराना टोटका अजमाया। आंध्र में कांग्रेस के एमपी बैंक मेनेजर को थप्पड़ मारकर शर्मिंदा हुआ। और अभी हाल में ही अपने आदरनिये ग्रहमंत्री श्री चिदंबरम जी कंधमाल की घटनाओ पर शर्मिंदा हुए। मैंने सोचा जब सभी शर्मिंदा हो रहे है मैं भी कुछ शर्मिंदा हो जाओ कुछ क्योंकि यह वो बाते हैं जिन पर मैं ही शर्मिंदा हो सकता हूँ। यह लोग शर्मिंदा नही होंगे। परन्तु चाहए जो हो इनकी सेलेक्टिविटी पर तो फ़िदा हुआ ही जा सकता है।

  • जी, ग्रहमंत्री जी मैं शर्मिंदा हूँ इन १० लाख कश्मीरी ब्राह्मणों पर जो दिल्ली के टेंटों में मानसून का इंतजार कर रहे है।
  • मैं शर्मिंदा हूँ एक बुढे सन्यासी स्वामी लक्ष्मानन्द सरस्वती जी की बर्बर और क्रूर हत्या पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन ६० हिंदू कारसेवको के माँ, बेहें, बेटी और उनके बच्चो के सामने जिनको यह बतला दिया गया की तुम्हारे माँ बाप अपने आप ट्रेन बंद कर कर आग लगा कर मर गए। मैं शर्मिंदा हूँ की ६ साल से एक महान सेकुलर सरकार ने उन कातिलो को अभी तक नही पकड़ा।
  • मैं शर्मिंदा हूँ भागलपुर, मलियाने, मेरठ, मुंबई, और देश भर के तमाम दंगा पीड़ित लोगो के सामने की कंधमाल जैसी किस्मत नही की आप से भी कोई माफ़ी मांगे।
  • मैं शर्मिंदा हूँ मीडिया की उस साजिश से जिसमे गैर कांग्रेसी राज मैं हुई हर बात को पतंगड़ बनाया जाए।
  • मैं बहुत शर्मिंदा हूँ श्री लंका के २०,००० तमिल हिन्दुओ की क्रूर हत्या।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कांग्रेस जनित भोपाल गैस कांड की पीडितो की न सुनवाई होने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कोशी बाद पीडितो को बजट में एक रुपया न देने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ आधे हिन्दुस्थान पर गाँधी परिवार के लेबल चस्पाने से और एक, मात्र, एक पुल का नाम परम श्रध्ये प्रात: स्मरणये पूजनिये वीर सावरकर जी के नाम पर न रख पाने के लिए। हिन्दुस्थान तो छोड़ ही दो दूर फ्रांस देश के अनुरोध पर की हमारे यहाँ सावरकर जी की मूर्ति लगे, भारत सरकार अनुमति दे और उसके अनुमति न देने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ सावरकर जी की तपोस्थली अंदमान में उनके नाम की पट्टिका हटाने के छुटभैया टाइप नेता मणिशंकर आययर के आदेश से।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन लाखो माताओ और बहेनो से जो अपने बेटे और भाई इस्लामिक आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके है।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन लाखो लोगो से जो अपने रिश्तेदार पिछले कांग्रेस राज में उसके इस्लामिक आतंकवाद की प्रेमनीति के ऊपर कुर्बान कर चुके।
  • मैं शर्मिंदा हूँ मोहन लाल शर्मा के बीवी और बच्चो के सामने जिनको अपने बाप की शहादत को धर्मनिरपेक्षता की वोटो की तरजू पर झूलते देखा।
  • मैं शर्मिंदा हूँ गुजरात के ५ करोड़ लोगो के सामने जिनको गुजोका कानून नहीं दे पाए उनकी दुष्टों से और आतंकवादियो से रक्षा के लिए।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन हिन्दू और देशभक्त असमी भाई और बहेनो से जो न चाहकर भी अपनी असिमिता इस्लामिक गुंडों से नहीं बचा पा रहे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद कांग्रेसी सरकार वोटो के लिए बंगलादेशी मुसलमानों को नहीं निकलने दे रही।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन देशभक्त सैनिको के माता पिता और बच्चो के सामने जिन्होंने अफजल गुरु को फँसी न देने पर कांग्रेस सरकार के मुहं पर पुरस्कार और मैडल फैंक मारे।
  • मैं शर्मिंदा हूँ मुंबई में मरने वाली आम जनता के रिश्तेदारों के सामने जो कसाब को रोज हंसते हुए देखते है।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कांग्रेस राज के आपातकाल से जिस में आज भी उन लाखो लोगो का जिनके बारे मैं आज भी पता नहीं।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कांग्रेस की बेशर्म महाराष्ट्र सरकार की नपुंसक व्यवहार से जिस में एक ही देश के दुसरे राज्ये से आये बिहारी बच्चो के पीटने पर वोटो की गिनती करती है।
  • मैं शर्मिंदा हूँ अम्बिका सोनी के परमोशन पर जिस राम के नाम को नकारने पर कबिनेट में उच्च स्थान दिया हो।
  • मैं शर्मिंदा हूँ पाकिस्तान में मुसलमानों द्वारा हिन्दुओ और सिखों के जजीय लेने की भारत सरकार की कार्यवाही न करने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ देश मैं १५ साल से दिल्ली में कांग्रेसी सरकार की नाक के नीच २०,००० बच्चो के लापता होने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कांग्रेस की घोर सत्ता प्राप्ति की निर्ल्लज और भोंडी उत्कंठा और झारखण्ड के आदिवासियो को राजभवन द्वारा एक प्रकार से लोकतंत्र में बंधक बनाने पर।

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देखा कांग्रेस राज अभी कुछ लोग फिर से हिंदू होने पर शर्मिंदा हो रहे है परन्तु एक ही साँस में देशवासी मर्द और औरत का बीच में न होने पर (लोंडा) शर्मिंदा नहीं है। यह कैसी माया वाकई ये तो दो और दो पांच बनाते हैं।

परन्तु आज तो मुझे न्यायालय के आदेश पर भी शर्मिंदा होना पड़ रहा है जिसने धरती पर एक नए युग का सूत्रपात किया है जिसे स्वयम ब्रह्मा भी बनाना भूल गया था।

परन्तु मेरे शर्मिंदा होने से क्या होगा। जब तक देश एक विदेशी के शासन और उसकी चाहतो को फलीभूत होते देख रहा है।

Wednesday, July 8, 2009

चीन का नरेंद्र मोदी कौन ???????????????????????

पता नही क्यों अभी तक लोग इस उत्तर से रूबरू नही हुए की चीन में निरही, बेचारे, मासूम और निर्दोष मुसलमान का नरसंहार कर किसने दिया ? चीनी मीडिया के हिसाब से 156 लोग मारे गये। ये 156 लोग वो हैं जिसे चीन का मीडिया बताना चाहता है। अब जब चीन अपने ही मुह से इतने कह रहा है तो असली में कितने होंगे समझने के लिए ज़्यादा सर नही खपाना पड़ेगा।
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अब प्रश्न यह उठता है की भारत का आधुनिक, लोकतंत्र पसंद मानवाधिकारो का एकमेव रक्षक भारतीय मीडीया अपने अंतराष्ट्रिए संगरक्षको के साथ अभी तक अपनी चिरप्रचित शैली में एक दूसरा नरेंद्र मोदी चीन में क्यो अभी तक नही खोज पाया? सवाल यह नही की चीन अपनी रक्षा करता है की नही परंतु घोर आश्चर्या का विषय मेरे लिए मीडिया का अपनी चिरप्रचित शैली में फोकस करना अभी तक क्यों नही है।
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चीन अब भारत तो है नही जो अपने लोगो की रक्षा ना कर पाए और एसा भी नही की लोकतंत्र के धंधे के सोल डिसट्रिब्युटर से डरता हो। और न ही अभी तक उसने फ्रेंचाईसी ली है की जो किसी की धौंस में आए। मुद्दे की बात यह भी नही की हमारे अपने वामपंथी दोस्त भी चीन की इस देशभक्ति पर अपने होठ को सिले क्यों हुए है। क्यों नहीं अभी तक कोई टिपण्णी की है।
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अब दूसरा पहेलु इस बात का है की चीन ने गलत क्या किया है? चीन ने कुछ भी गलत नहीं किया है। उसके सामने प्रशन यह है की पहेले देश के ९०% हान लोगो की रक्षा करे या उन लोगो की जो चीन से अलगाव रखते हुए दुसरे देश की मांग रख रहे है। चीन इस प्रशन से घबरह भी नहीं रहा है। उसने तुंरत दोनों स्तर पर उत्तर देदिया जहाँ एक तरफ उसने अपने सैन्ये बलों को पूरी छुट दे दी वहीं दूसरी और उसके अपने हान समुदाय के लोग पिल पड़े इन अलगाववादियो पर।
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तो बात अब मुस्लिमो की तो फिर से ये राजनीती के शिकार ही होंगे। पहेले अमरीका ने रूस के खिलाफ इन मुसलमानों का इस्तेमाल किया। फिर इन्ही को दुनिया भर में बदनाम किया तब चीन चुप्पी लेकर बैठा रहा था। अब अमेरिका ने पाला बदल कर अस्सलावालेकुम (ओबामा से) करके फिर वहीँ पहुँच गया। अब सुरक्षित जगह से चीन पर मानवाधिकारो के नाम पर वार करेगा। चलो जो हो सो हो।
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भारत के सन्दर्भ में यह बात इसलिए बता रहा हूँ की न चीन गलत हैं न अमेरिका और ना ही इस्लामिक शक्तिया। इस में दोस्तों, हम भारत वाले ही गलत है। वो कैसे ? देखो अमेरिका को दुनिया की थानेदारी करनी है और वो जब सर्वशक्तिमान है और अपनी अर्थव्यवस्था चलानी है तो इसमें बिलकुल भी गलत नहीं है। दुनिया के बाजार पर अपने देशवासियो का पेट पालना है । दूसरी और चीन है, उसे समग्र चीन एक रखना है तो अलगाव बिलकुल ही गलत है उसके लिए। तो वो भी अपने देश और उसके वासियो की रक्षा कर रहा है। और हान समुदय को पूरी छुट दे रखी है जो की बिलकुल भी गलत नहीं। तीसरी तरफ इस्लामिक शक्तिया है जो निश्चित रूप से अपना विस्तार करती रहेती है। उसको अरब, अफ्रीका के बाद दक्षिण पूर्वी एशिया में बिना एक पैसा खर्च करे बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देश मिल गए। यूरोप और अमेरिका में इसलाम अपनाने की होड़ मची ही हुई है। आप देखलो अभी माइकल जैकसन को वो भी मुस्लमान बनगया था। उसके विशाल फैन उसकी नक़ल तो निश्चित रूप से करेंगे है। एक स्पेन की असफलता पिछले १५०० वर्षो में लगी एक मात्र विफलता है। अब बारी चीन पर इस्लामिक शक्तियों की है।
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तो रूस को मिटटी में मिलाने के बाद और अमेरिका में अपना अस्सलावालेकुम बोलने वाला राष्ट्रपति बैठने के बाद स्वाभाविक ही जीत के जोश में उसने चीन पर भी अटैक कर दिया।अटैक कर दिया से मेरा तात्पर्य पिछले हफ्ते हुए हान और मुस्लिम समुदाय के बीच दंगो से है। अब दुनिया में दो बराबर की शक्तियों में टक्कर है।
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मुझे हिन्दू होने के नाते ना तो कोई ख़ुशी है और ना ही कोई रूचि। क्योंकि हम हिन्दू तो एक गहरी चीरनिंद्रा में सोये हुए हैं। और पूरी तरहे से इस्लामिक शक्ति के हाथो पराजित है। इसलिए सवाल ही पैदा नहीं होता की हम कोई रोल निभाए।
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अब सोचो की जिस प्रकार से अपने हान समुदाय के लोगो को हाथ में डंडे, चाकू, रोड लेते मुस्लिमो पर अटैक करते देखा है यदि कहीं हिंदुस्तान में कोई हिन्दू कर देता स्वयं को बचाने के उदेश्य से तो उसका मीडिया खाल में अभी तक भुस भर चुकी होती। और वो हिटलर की लाइन में खडा हुआ अपनी जान सांसत में पा कहीं पर अपने दिन गिन रहा होता। परन्तु मानवाधिकारों और सेमेंगिकता की डीलरशिप लिए हुए वामपंथी अभी कोई मुद्रा अख्तियार ही नहीं कर रहे।
मैं आज लोगो से पूछता हूँ की क्या चीन इन मुस्लिम आक्रंताओ को देश तोड़ने दे या अपने देश को चीन एकजुट रखे? दूसरा क्या देश में रहेते ९०% हान समुदाय की रक्षा करे या मुस्लिम गुंडों के समक्ष आत्मसर्पण कर दे?
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हर देशवासी का कर्तव्य है की देश को हर हाल में एकजुट रखे और देश की विघटनकारी ताकतों को परास्त करे।उस में गलत क्या है। हमारी तरह नही की बिना कुछ भी जाने कश्मीर में से सेना की वापसी शुरू कर दे। दूसरा लोकतंत्र या सरकार इसी शर्त पर चलती है की वहां पर सर्वप्रथम देश के बहुसंख्यक का विश्वाश जीता जाये और उनकी रक्षा की जाये। यह लोकतंत्र का मूलभूत सिदान्त है। तभी सरकार का इकबाल अक्षुण रह सकता है। देश की भौगोलिक लकीरे समुदाय और धरम के नाम पर ही खींची गई थी और किसी हिन्दू ने नहीं खींची थी। दुनिया के दो सबसे बड़े पंथो इसलाम और इसईओ ने ही खींची थी। हिन्दुओ को तो जो टुकडो के रूप में देदिया उसे ही अपना देश समझ कर जिंदगी बसर कर रहा है। इसमें चाहे बात कश्मीर की हो या तिब्बत या बात हो हिंदुस्तान में पाकिस्तान और बांग्लादेश के भगाए हिन्दू की। इसलिए प्रशन ही नहीं उठता की कोई इनकी बात करे।
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"हिन्दू घटा देश बँटा" नारे में क्या गलत है? चीन ने भी मान लिया की जहाँ हान समुदाय नहीं वहां चीनी शासन नहीं और गलत भी क्या है। अब लोगो को दुःख इसी बात का है की ना तो चीन में कोई वोट बैंक है और ना चीन किसी पाकिस्तान से त्रस्त, ना ही अमरीका की दादागिरी को मानता और ना ही उसके पास नपुंसक और सेम्लेंगिक टाइप नेताओ की जमात। जो करता है डंके की चोट पर करता है जैसे रूस ने चेचेनिया में किया, अमरीका ने इराक में और फ्रांस ने मुस्लिमो की दादागिरी को ख़तम करके वोही वो इन गुंडों से निपटाने के लिए कर रहा है। क्योंक सवाल देश का है और उसमे रहते १४० करोड़ लोगो का। जिनकी प्राण, अस्मिता की रक्षा चीन सरकार के ऊपर है और यह जिम्मेदारी उन मुट्ठी भर गुंडों के तुष्टिकरण से ज्यादा बड़ी है। हमारी तरह चीन सरकार और वहां की लोग नापुंसको की जमात नहीं जो कुछ लोगो की गुंडागर्दी से दब जायेगी और समर्पण कर देगी। वो उनको धरती में गाड कर पार्क भी बनवा दे तो कोई आश्चर्य नहीं जबकि सभी वो तथ्य जानते है की उसने अपने ही हान और चीनी लोगो को थेईमन चौक पर टैंको के नीचे जिन्दा ही कुचल दिया था और सारी दुनिया ने देखा था। इन मानवाधिकारो के थोक विक्रेताओ ने भी। अब देश के १४० करोड़ लोगो की खुशहाली के लिए यह कोई बड़ी कुर्बानी तो नहीं? क्योंकि आप भी तो अपने सम्पूर्ण शारीर को बचाने के लिए सडा अंग काट कर ही तो फेंक देते हो। यह पटर पटर और झूटी बोलने की विकृत आजादी से तो अच्छा ही हैं। इसमें तो कोई नरेंद्र मोदी नहीं ढूंडता। क्षमा करे वो लोग जो नरेंद्र मोदी और चीन सरकार के मेरे इस लेख से तुलना करने का दुहसहस करे। बात है दो प्रकार के विचारो की और बात है देश को बचाने की मानसिकता और बहुसंख्यकों के अधिकार और उनको अनावश्यक रूप से पड़ने वाली मानवाधिकारो की विकृत मानसिकता, दोयम दर्जे की भोंडी मीडिया और ढोंगी वामपंथियो की है। जो आज खामोश है। निर्णय आपका हैं की पटर पटर और खोखली बाते करनी है या कृष्ण की तरह निर्णय। फिर चाहे जो हो। वसुधेव कुटम्बकम परन्तु सत्यमेव ज्येयेत ।

Sunday, July 5, 2009

नेपाल राजा! हिन्दू! भारत और सेम्लेंगिकता!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

अब यह मजाक नहीं तो क्या है की विश्व के १२० करोड़ हिन्दुओ के एक मात्र राजा (सिम्बोलिक ही सही) श्री ज्ञानेंद्र जी को नेपाल के राजपाट से पदच्युत कर नेपाल को भी लोकतंत्र का झुनझुना दे दिया गया। किसी ने नहीं पूछा की इस राजा का कसूर क्या था? बस दुनिया को बता यह दिया गया की वो नेपाली जनता की नहीं सुनता, और किसी ने यह बता दिया की वो भारत के लिए खतरा है, तो दुसरे किसी ने यह बता दिया की वो और उसका बेटा नेपाली जनता का शोषण करता है। हलाकि इन सभी बातो का सबूत कोई भी नहीं परन्तु आधुनिक युग के नए धंधे 'लोकतंत्र' का डीलर नेपाल को भी बना दिया गया। ठीक भी है क्यों वो इस नए नशे "लोकतंत्र" से मेहेरुम हो।
अच्छा हमारे यहाँ तो नशा स्वयं सुप्रीम कोर्ट के न्याय के देवता ही बाँट रहे है। हम भारतवासी "सेम्लेंगिकता" के  नशे को आत्मसात करने में पीछे न रह जाये।
उसके लिए हमारी मनीनिये अदालत ने हमे आदेश भी दे दिया की आधुनिकता की इस रेस में पीछे नहीं रहेना और ऊपर से जवाहर लाल नेहेरू का १९४६ का प्रवचन भी उस आदेश में घोल दिया जिस से की कोई जस्टिफिकेशन भी देना न पड़ जाये।
हम हिन्दू कहाँ कुछ बोलते है सर झुका कर हर बात तो मानते ही है, अब अदालत की भी मान लेंगे। हिन्दुओ ने तो पिछले ८०० सालो के इतिहास में कभी आज्ञा की अवहेलना की ही नहीं उसने तो तुर्को, मुगलों, अंग्रेजो की आज्ञा का पालन किया है. यहाँ तो अपने ही लोग अदालती हुकम बजाने को कह रहे है। हमे कभी खुजरह्हो को  कामशास्त्र के नज़रबट्टू से देखने को कहेते है, तो कभी हमे ही हिन्दुस्म की वामपंथी किताबो से हिन्दू धर्म को हज़म करने का दुसाहस कराते है। परन्तु जिस प्रकार हम ८०० साल से कुछ नहीं बोले, बस आज्ञा का पालन ही करते जा रहे है ।अभी भी उसी मुद्रा में खड़े तमाशा देख रहे है बिना इसके पता करे की अगली आने वाली पीढी दोयम दर्जे की होगी इस "सेम्लिन्गिकता" से। पर किसको परवाह है ?
परन्तु यह क्या हुआ इस सेम्लिंगिकता के अदालती निर्णय से सत्ता के ठेकेदारों की चूल्हे हिल गई की चर्च और इसलाम दोनों ने इसे अपने खिलाफ साजिश बता दिया। अब सत्ता के दुकानदारो की सांसे हलक से पसीने पसीने होकर निकल रहे है। चलिए देखते है क्या होता है?
परन्तु इतना बताता दूँ की जो लोकतंत्र, आधुनिकता और प्रगतिशीलता का गन्धर्व राग छेड़े है उसका हिन्दुओ के शासन तंत्र की दो महत्वपूर्ण पुस्तक मनुसमृति और चाणक्य रचित अर्थशास्त्र में भी इस कुकृत्य पर दंड का प्रावधान है। हम हिन्दू इस अप्रकर्तिक, घृणित, अनैतिक और घोर आपत्तिजनक कुकृत्ये के सदैव खिलाफ है। आज आपने जो आदेश मर्द - मर्द और औरत - औरत के बीच मान्य किए है अदालत जी। क्या पता की जिन  लोगो के लिए आपने यह कृत्य किया है कल इनकी "काम" इन्द्रिया पेडो के साथ भी यौन सम्बन्ध बनाना चाहे और परसों को दीवारों और पत्थरों के साथ तब अदालत कब तक और कहाँ तक इनका साथ देगी क्योंकि इसका तो कोई अंत ही नहीं। तो क्या दुनिया की सारी चिंताए छोड़ कर बस इन मानसिक विकृत पापियो का किस्सा ही डीसकस करते रहे।
मित्रो हम बात कर रहे थे नेपाल राजा और भारत की प्रजा की। मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाह रह हूँ की राजा का चरित्र क्या तो और क्या होना चाहिए। क्योंक इस राजा के दुषचरित्र का तो कोई सबूत है भी नहीं परन्तु लोकतंत्र के ध्वजवाहक श्री बिल क्लींटन और श्री जवाहर लाल नेहेरू जो दुनिया के दो बड़े लोकतंत्र (भारत और अमेरिका)चलाने का लाइसेंस लिये थाई। कितने बड़े चरित्रवान थे. और एक राजा ज्ञानेंद्र को हटाना था तो पूरी हिन्दू राज संस्था को हमेशा हमेशा के लिए निर्वासित क्यूँ कर दिया ? फिर मैं कहे दू की मेरी "व्यक्ति" में रूचि नहीं, मेरा आक्रोश विश्व में एकमात्र हिन्दू सत्ता का हमेशा हमेशा के लिए जबर्दस्तरी हटाने पर है और दुर्भाग्य से भारत की कथित लोकतान्त्रिक, सदैव प्रगतिबाधक, हीनता से ग्रसित, लोकलाज रहित, देश की मिटटी से दूर, गूड पोंगापंथी मेरे वामपंथी मित्र उस कुत्सित रणनीति के वाहक थे।
हाँ दोष उनका भी है जिन्होंने नेपाल की हिन्दू जनता को भारत के बीच "बहादुर" नामक उपनाम से रोपित किया। आने वाला समय हिन्दुओ को इस बात के लिए हमेशा रुलाएगा की एक शक्तिशाली कौम को दोयम दर्जे के लोगो ने हिन्दुओ को नख और दंतवहिन करने का पाप किया है.  हिन्दुओ के लिए बहुत ही भरी पड़ेगा। इन ही लोगो ने अपनी सेम्लेंगिक टाइप हंसोड़ता के लिया हमारे अपने गुरु गोबिंद सिंह जैसे हिंदुत्व के पुरुधा की संतानों हमारे अपने सिख भईयो और बहेनो को अलग करने का भी दुसहास किया है। 12 बजे की चुटकले इन्ही हिन्दुओ ने सुना सुना कर सुख प्राप्त किया है।इन बहादुर दलितों को भी अलग कर हम हिन्दुओ को एक घनघोर अंधकार में धकेला जा रहा है और हम हैं की अपनी ही निर्लाजता और नंगई पर भोंडी हंसी हंस रहे है। इसी षड्यंत्र के तहेत तुम्हारी ही बहु, बेहेन, बेटी को टैलेंट शो के नाम पर सरे आम टीवी पर भोंडा नाच नचाया जा रहा है और हम इसे प्रगति के नाम पर हाँ में हाँ मिलाकर सामूहिक निर्लाजता से अधीर होकर देख रहे है। याद रखना अपनी बहनों, बेटियो को इस तरह नाचते देखने का दंड षड्यंत्र के दुसरे हिस्से में इनको पोर्न स्टार के रूप में पेश 
करके मिलेगा। 
नेपाल देश को भी एक षड्यंत्र के तहत इसी प्रकार की अफीम चटाई गई है और उसको भी लोकतंत्रता के नाम पर फुँड़ता का स्वांग भरने के लिया प्ररित किया जा रहा है। मेरे भारत देश के हिन्दुओ को एक कुत्सित साजिश के तहेत नेपाल के हिन्दुओ के समीप ही नहीं जाने दिया गया। मैं नही बात करता बुद्ध और महान हिन्दू ऋषि गुरु पदम्संभव द्वारा तांत्रिक महायान बोध पंथ की जिसमे भूटानी समाज बना है.  न ही मैं उस फूनान हिन्दू राज्य जो मेकंगंगा के किनारे कम्बोडिया में था। न ही उस शिव भक्त खमेर राजवंश की जिसने विश्व की सबसे बड़ी धरोहर अंगकर वोट मंदिर की कम्बोडिया में स्थापना की। और न ही थाईलैंड के महान राजा तक्षीन के आयोध्या राज्ये की। बात तो अपने सबसे समीप नेपाल के गरीब और धरम रक्षक हिन्दुओ की है। जिनको  की हम जान ही नहीं पाए. सही कहूँ तो जानने ही नहीं दिया गया। हमें तो बस कहा गया और उनकी बेचारो की हंसी बहादुर चोकीदार कहकर उडाई गई बिना यह जाने की इस से भारतीये हिन्दुओ को कितना नुकसान हो सकता है।
अरे हिन्दुओ यह ही वो नेपाल है जिसमे तुम्हारे ऋषि तपस्या करते थे। जहाँ भगवन शंकर अपने अघौड़ रूप में विराजते है। यह शिव की वो भूमि हैं जहाँ पर साक्षात् भगवान् पशुपति नाथ बसते है। और तो और शंकराचार्य जी ने दक्षिण भारत के ही किसी एक पुरुहोइत को यहाँ का पुजारी नियुक्त रहेने की व्यवस्था रखी थी। और आज न वो पुरोहित है और न आम भारतीये हिन्दुओ के अन्दर बुदि, जो नेपाल में विराजे साक्षात् शिव के दर्शन करने को आतुर हो। पशुपति नाथ वो विरला स्थान हैं जहाँ पर आदि शिव के दर्शन होते है। वो दिव्ये स्थान जहाँ पर चिता पर मृत मानव शारीर जल कर काठमांडू की वायु में शिव का दर्शन कराता हैं तो दूसरी और वो शम्भू को आवाज लगाता (माओवादियो को मुह चिडाता) आधुनिक वैदिक हिन्दू। वो पशुपतिनाथ की बागमती जो किसी षड़यंत्र के तहेत आखरी सांसे गिन रही है। अपनी गंगा की तो सुध किसी ने ले ही ली चाहए पर्यावरण के नाम पर ही सही। परन्तु उस बागमती नदी , जिसको की उतने पानी का हजारवा हिस्सा भी नहीं जितना की आपके दिल्ली के सोनिया विहार प्लांट में  है। परन्तु कुछ नहीं वहां पर तो वो १०-१२ साल के ओजस्वी हिन्दू बालक वैदिक शास्त्रों की पढाई पढ़ते और बोलते तो लगता की मुहं से फूल बरस रहे हो। वो अघौड़ संत जिनको की आपके पैसे की परवाह नहीं. जिस धन से वो भी आसमान में अट्टहास करती ईमारत अपने आश्रम के लिए  बनाये। बस लालच हैं तो इस बात का की वो शम्भू के मंदिर के कपाट कब खुलेंगे और कब अपने पशुपतिनाथ के दर्शन होंगे। तंत्र और मन्त्र के एक से एक धुरंधर बिखरे पड़े है परन्तु न किसी की इच्छा और न किसी का स्वांग बस एक ही आवाज जय शम्भू और शम्भू और शम्भू। यह हिन्दू, उस चेतना से की शिव अब मिला और कब मिला, न परवाह इस बात की की माओवादियो ने शंकराचार्य द्वारा स्थापित पुजारी परम्परा का पुजारी अपना बोरिया बिस्तर वापस हिन्दुस्थान के लिया बांध चूका, न परवाह इस बात की की भगवन विष्णु का अवतार नेपाल नरेश अपने वंशजो की साथ सिंगापूर पठा दिया गया है।
वो शिवरात्रि का दिन जिस दिन आपको इतनी लम्बी लाइन में लगना होगा की एक छोर तो पता होगा की पशुपतिनाथ पर है परन्तु दूसरा ढूंडने के लिए काठमांडू ही पार करना पड़ जायगा। इसीको भक्ति भावः कहेते है। इसी को तो हिन्दू, परमात्मा से साक्षात्कार कहेता है। और इन्ही हिन्दू राज संस्था के हत्यारों ने विष्णु का अवतार राजा और शिव की नगरी काठमांडू की हिन्दू परम्परा के अविरल अदभुत संगम को सृष्ठी से अलग करने का महापाप किया है।
मैं पूछता हूँ की यह हिन्दू नेपाली राजा क्या उन अय्याश इस्लामिक शेख और खालिफाओ से भी क्रूर था जिनके के हरम में दस दस बारह - बारह साल की असंख्य लड़किया होती है। या उनसे भी क्रूर था जो अपनी सत्ता बचाने के लिए लाखो सर कटवा दिया करते है। या उस लोकतंत्र से भी योग्य नहीं जिसमे धर्मपत्नी और जवान बच्ची की होते भी व्हाइट हाउस से अपदस्थ नहीं किया गया। या क्रूरता उस रॉबर्ट मुगाबे से भी ज्यादा थी जहाँ एक अमेरिकन डॉलर १०० करोड़ जिम्बावे डॉलर के बराबर होगया हो और सैकडो रोज मर रहे हो पर जब भी सत्ता से चिपका है । क्या उसका चरित्र इंग्लेंड के युवराज चार्ल्स से भी गया गुजरा था। या मिया मुशरफ से भी ज्यादा बड़ा दुश्मन था जिसने की भारत को हजार घाव देते रहेने और एक और कारगिल युद करने का संकल्प लिया था। जिसके लिए आज भी भारत का मीडिया कानक्लेव में बुलाने के लिए पलक पावडे बिछाती हो। कम से कम इतना तो नहीं था और यदि तुमको नेपाली राजा में कोई कमी लगी भी थी तो पूरी की पूरी हिन्दू राजसत्ता को ही क्यों समाप्त करने दिया गया? क्या कोई भी हिन्दू राजा नहीं बन साकता था? क्या एक छोटी सी हिन्दू ख़ुशी भी बर्दास्त नहीं ?
क्या मुझे कोई जवाब देगा की किस नेपाली और किस हिन्दू ने नेपाली राज संस्था हटाई है? अरे आज नेपाल में न धर्मगुरु है न राजा है। और नेपाली गरीब जनता जिसके अन्दर हिन्दू धरम की जड़े इस प्रकार से है जैसे की दूध में मक्खन हो। और भारत का लोकतंत्र उसको राष्ट्रपिता कहेता है जिसने की तुर्की के खलीफा के लिए असहयोग आन्दोलन चलाया था। जिसमे की निरही हिन्दू जनता को बिना किसी उसके हित के इसलाम की जड़ो को ही मजबूत किया गया था। अब आज के हिन्दू को आप पूछ कर देख लो नेपाल के राजा को हिकारत भरी दृष्टि से देखेगा और बिना तथ्य के जाने उसे पोलपोट (कम्बोडिया में नरसंहार का दोषी) श्रेणी में डाल देगा।
यह सब मीडिया का करा धरा है एक विदेशी सद्यन्त्र के तहत.

 दोस्तों समय आगया हिन्दुओ को अपने अच्छे और बुरे सोचने का, नहीं तो वो समय दूर नहीं जब हिन्दू अपने आपको अजायबघर के किसी कोने में खडा पायेगा। अपने पर गर्व करना सीखो और अपनी जड़ो की तरफ लौटो, उनको पहचानो और पाओगे की सारी समस्या का हल इसी मानवता की धरोहर हिन्दू जाति में है। मेरा एसा विश्वास है की  बिना हिन्दू के समझे कोई भी इसकी सहयेता नहीं कर सकता। हिन्दू को समझना होगा, यह कोई प्राग - इतिहास की बात नहीं परन्तु तुम हिन्दू समझने को तैयार नहीं, तुम्हें इन लोगों ने एसा इतिहास पढाया और समझाया की तुम जो विश्व के बहुत बड़े भूभाग के स्वामी थे उसे आज के बचे खुचे भारत में ही समेट दिया और उसमे भी तुमेह अलाप्संख्यक बनाया जा रहा है।
तुम भूल जाओ खेमेर वंश को, भूल जाओ तक्शिन को, भूल जाओ अपनी मेकंगंगा को, भूल जाओ जावा और सुमात्रा को, याद मत करो उस परम्परा और गौरव को जो तुम्हारी शिराओ में बिजली का संचार करती हो, भूल जाओ उस गाथा को जिसने जापान और कोरिया तक में अधिपत्य किया था, भूल जाओ इंडोंएशिया की उस अवधारणा की जिसने उसको अपनी वायुसेना का "गरुड़" नाम रखने को प्रेरित किया, भूल जाओ थाईलैंड की स्वर्णभूमि को जो तुम्हे तुम्हारी हिन्दू परम्पराओ की दुहाई देती है, भूल जाओ अपने भूटानी भईयो को जिसको के तुम्हारे गुरु पदम्संभव ने हिन्दू तंत्र का उच्कोटी का श्रेष्टतम ज्ञान देकर एक भव्य महायान बोध हिन्दू पंथ दिया हो, भूल जाओ अपनी अधिष्टात्री ढाकेश्वरी देवी को, भूल जाओ अपने पूर्वजो के चीन के साथ घनिष्ठ संबंधो को। और याद रखो चार या पांच दशक के इतिहास को और मरे हुए साँप की भांति उसे ही गले से लटका कर संसार भर में बनो हंसी का पात्र। कौन रोकता है नेपाल की हिन्दू विरासत को नेस्तनाबूद करने से और अपने बच्चो को सेम्लेंगिक बनाने से। कोई नहीं रोकता झूटी और मक्कारी हंसी हंसने से।
कोई नहीं याद रखना चाहेगा की तुम ही मानवता के ध्वजवाहक हो। परन्तु परम्परा का बोझ कौन ढोना चाहेगा? उसके लिए तो वीर्यवान, तेजस्वी, सौम्य, प्रचंड, अदम्य और अभिलाषी हिन्दू युवक चाहिय और हमे धकेला जा रहा है एक "नव हिजडा संस्कृति" की ओर। और उसपर भी ठप्पा "प्रगतिशीलता" का लगा दिया गया।
देखो स्वयं एक गलता  और सड़ता देश, देखो एक नपुंसक पीढ़ी का प्रादुर्भाव. क्या यह ही नियति है? जिम्मेदार आप स्वयं है क्यूंकि धर्म आपका देश आपका तो गति भी आपकी ही है।