Sunday, October 11, 2009

हिंदुस्तान हिजडो की फौज ??? !!!!!!!!


बहुत ही मजबूरी में इस शब्द का इस्तेमाल करना पड़ा बहुत सोचा की कोई और शब्द मिल जाये परन्तु अब हिजडे है तो क्या किया जाय. कई कारण है इस शब्द के इस्तेमाल के परन्तु दुःख इस बात का है की कहीं वास्तव में हम
हिजडो के सरताज देश बन कर अपने ऊपर गर्व ही न करने लगजाये.


  • मुझे गुस्सा और दुःख इस बात पर आता है दिल्ली जैसे शहर में लूट मार होने पर या बलात्कार या कुछ भी गलत होने पर यह मर्द लोग मीडिया के आगे रोने क्यों लग जाते है. और वो भी किस मीडिया के जिसने की हिजडो की फौज बनाने की सुपारी ली हुई है. मुझे कुछ दिन पहले रांची के एक इंस्पेक्टर के बेटे का बयान सोचने पर मजबूर करता है की हमारा समाज कितना नपुंसक है. वो १० साल का लड़का अपने बाप की माओवादियो द्वारा सर कलम करने के दुःख की अभिव्यक्ति कर रहा था की ओ माओवादियो जिस तरह से तुमने मेरे बाप को मारा है मैं भी तुम्हे मारूंगा. मुझे नहीं पता उसके बाद क्या हुआ परन्तु आंसू मेरे आँख में झलक गए की अब दिन यह आगया की एक दस साल का बच्चा भी इस समाज की क्रूरता से ताव खा गया. यह उस झारखण्ड का हाल है जिसमे सोनिया गाँधी की कांग्रेस और लालू की भड़वो ने झारखण्ड में भ्रष्टाचार का नग्न नृत्य किया है. जहाँ का मुस्लिम राज्यपाल भ्रष्टाचार के जोहोड (तालाब) में ठट्टा लगा कर गया है. उस झारखण्ड में कोई माई का लाल मानवाधिकार का रखवाला या इस देशभक्ति का ढोंग रचने वाला वहा पहुँच कर उस बच्चे को कोई सांत्वना देकर आया हो. अरे हिजडो अपनी ही दिल्ली में तुमने उस मोहन शर्मा इंस्पेक्टर के बच्चो का हाल चाल न जाना. तो झारखण्ड क्या जाओगे.

  • हरियाणा को नम्बर बनाने वाले ओ लम्बरदारो अपनी झक सफ़ेद पगडियो पर एंठा मत दो कई हजार आदमी इस दिल्ली के नीचे गुडगाव के हीरोहोंडा में बर्बरता से पिटे थे पर है कोई मीडिया में शेर का बच्चा जो आज चुनाव के समय उस पीडा को दोराहे. नहीं कोई नहीं करेगा वो पीटने वाले भी नहीं क्योंकि नोटों ने उनका और मीडिया दोनों का मुह बंद कर रखा है. और अपनी मर्दांगनी पीटने वाले कांग्रेस्सियो ने भी १० जनपथ पर गिरवी रख रखी है. क्यों देश के मजदूरों का ठेका लेने वाले कोमुनिस्ट चुप है. क्यों कारत एंड कंपनी चुप है कहाँ छुप गये ए बी वर्धन. कोई नहीं जो वोटो के मैदान में चुपके से भी विरोध दिखाय सीमा पर दुश्मन के सामने बन्दूक तो क्या दिखाओगे.

  • वो चीन रोज थोडी थोडी पैंट नीचे उतार रहा है और देश के नौजवान सेम्लेंगिगता पर भाषण पिला रहा है. ओ सेम्लिंगिकता के पेरोकारो कैसे चीन का मुकाबला करोगे. या उसके लिए कोई बोबी डौल दूंढ रखी है. तुम दिल्ली में हुए छोटे से अत्याचार पर तो एन डी टीवी के पास रोने आजाते हो चीन के अत्याचार पर क्या कर रहे हो. हरियाणा के नेताओ के दोस्तों सफ़ेद पहेने कपड़ो पर मत जाओ. कुछ एक दिन के है सब जमीन बेच कर नेता हुए है और १० साल बाद वो ही होगा जो अंदमान निकोबार के आदिवासियो का हुआ है. फिर देखते है किसे नंबर वन हरियाणा बनाया जायेगा. अरे भाई खेती की बात करो. हरियाणा की मट्टी की बात करो. उस दूध और दही की बाते करो जिसमें की हरियाणा नंबर वन था. आज दीवाली पर हरियाणा में ही कई लाख टन मावा नकली और यूरिया का दूध मिलता है. और तुम हो की बावले पिल्लै के तरह हरियाणा नंबर वन बता रहे हो.

  • महाराष्ट्र छत्रपति शिवाजी की धरती पर बोलीवुड की हिजडे कह रहे है की कांग्रेस को वोट दो. अरे क्यूँ तो मीडिया में बैठा पत्रकार तुंरत शिवसेना से पूछता है की आपको जनता वोट क्यों दे. अरे मैं बताता हूँ इसलिय वोट दे की १० साल में दलालों ने झारखण्ड की ही तरह महाराष्ट्र को भिखारी बना दिया. हिंदुत्व की आड़ में शिव सेना में छिपे कोंकण के बहरूपिया ने हिंदुत्व के साथ दगा की है. उस बूढे बाल ठाकरे की जवानी की पूंजी लूटकर कांग्रेस के हाथो में रख डी. अरे येही तो शिवाजी के साथ अफजल खान ने किया था. आज वो भतीजा भी अलग होगया जिसको अपने चाचा की बुढापे की लाठी बनाना था. अरे भतीजे जी इतनी उम्र पड़ी है फिर कभी अपनी अकड़ दिखा लेते अभी अपने अपने झंडे को किसी के कहेने पर सेकुलर रंग देदिया और करने चाचा की नक़ल अरे उस चाचा का हिंदुत्व का नारा तो अपने उठा कर (किसी) के कहने पर ताक पर रख दिया. अरे कुछ तो सब्र करते अब तो अनिल और मुकेश भी साथ हो रहे है. उस कांग्रेस के कहेने पर महराष्ट्र का बंटाधार मत करो जिसने हिंदुत्व की रहा पर पुरे भारतवर्ष को रहा दिखाई है.

  • आज केंद्र में कितने मंत्री है जो देश का परतिनिधित्व करते है. मुझे सिर्फ एक उत्तर देदो इटली से आई एक स्त्री, ४० साल हिन्दुस्तान से बहार वर्ल्ड बैंक में काम करने वाला एक प्रधानमंत्री, देश से बहार शादी करे (हलाकि व्यक्तिगत मामला हो सकता है) और वर्षो सयुंक्त राष्ट्र में नौकरी करने वाला एक विदेश मंत्री जो देश पर कम टिऊटर पर ज्यादा चेह्कता हो एक ही बार देश में आया पहेली ही बार राजनीती में आया, पहेली ही बार में सांसद का टिकेट मिलगया वो भी १८० साल पुराणी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस से, पहेली ही बार में सांसद बन गया (जैसे की अमिताभ की तरह हो) पहेली ही बार में विदेश मंत्रालय जैसा बड़ा और गंभीर मंत्रालय में मत्री बन गया. और हर बहुत जरुरी राष्ट्र से जुडी बातो पर गैर जरुरी बयाना देता हो. आपको आश्चर्य नहीं होता मुझे भी नहीं क्योंकि हम हिजडे होगे है और देश की चिंता हमे करनी भी नहीं. एक घटना का जिक्र भी करना चाहूँगा अभी हाल में चीन में पता चला की वाहं पर शेर की हडियों का बहुतायत में भोजन और औषदी के रूप में प्रयोग होता तो चीनी लोग शेरो को इतना कमजोर कर देते है की वो बिल्ली भी अपने सामने देख कर डर जाता है जैसे की हम कसाब और अफजल को देख कर. दोस्तों यह तो हिजडे बनने की तरफ शुरुवात है आगे आगे देखना आपके पुत्र लड़कियो के सामने भी जाने से शर्मा जायेंगे. आप आजकल देखते नहीं अभी धारावाहिकों पिक्चरों में बोबी डौल नामक एक चरित्र शामिल हो ही गया. अमिताभ के बिग बोस जो कलर टीवी से आ रहा है एक चरित्र एसा ही है. धीरे धीरे ये मीडिया और बोलीवुड मर्द को नामर्द (हिजडा) और स्त्री को सड़क पर नंगा कर रहा है. आप अभी भी इस गंभीर संकट को नहीं समझे जो एक षड़यंत्र के तहत मीडिया को मोहरा बना कर हमारे खिलाफ चला जा रहा है. इस का उद्धरण भी देता हूँ जिस से आपकी आंखे खुले, देखो आपका बेटा अब गाय से ही डर जाता है, दिवाली पर पटाखों से डर जाता है, लड़कियां गणित और विज्ञानं में ध्यान नहीं दे रही आईटम सोंग में ध्यान दे रही है. अरे छोडो यार आगे बोला तो बुरा मान जायोगे. अपने धरमेंदर, सन्नी द्योअल जैसे मर्दानगी के आइकोन भी शाहरुख़ जैसे हिजडे कलाकार के सामने धक्खे खा रहे है.


  • अच्छा दोस्तों अरुणाचल का तो क्या जिक्र करू वहा तो अपने राष्ट्रवादी रिजुजी बीजेपी के एकमात्र संसद ने भी कांग्रेस की शरण पाई पता नहीं क्यों. वहो तो दल बदल हो ही गया. पर महाराष्ट्र में बूढे शेर का ध्यान रखना न रखना अब आपके हाथ में है हरियाणा में तो पैसे का ही इतना बड़ा दाव लगा हैं की हिन्दू की बात करना ही पाप है टाटा सफारी और स्कार्पियो के जाने के बाद सिर्फ मुह पर से धुल ही पहुंची जा सकती है तब तक नेता लोग चुनाव का ढोंग करते रहे अपने बच्चो को हमारे जैसे हिजडो के ऊपर थोपते रहे और हमे तो मीडिया ने माया सभ्यता के कलांडर से ही डर दिए गाय बिना जाने की इस कलयुग की आयु ४० हजार वर्ष है और अभी ५००० ही हुए है. अभी विष्णु के दशवे अवतार कल्कि ने आना है. अंत तो उनका होना है जिन्होंने अपनी कुरान में इसका जिक्र किया है.


बाकी क्या महंगाई तो है ही नहीं सो इस दीवाली पर खूब खीर पूरी खाओ और हाँ त्याग की मूर्ति को उप्रोलिखित सभी कृत्यों के लिया आप दीपावली की शुभकामनाये देंगे या क्रिसमस का इंतजार करेंगे?

Thursday, August 6, 2009

हे हिन्दू! तो जाग चूका बाकि जाग रहे है!!!!!!!!!!!!!

हिन्दू! तू ही मानव हे बाकि बनने है!!!!!!!!!!!!!
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तो दोस्तों अपने आस पास की समस्याओ पर गौर फरमाओ तो देखो गे की कुछ एक समस्या ए़सी है जिनकी जड़ में हिंदू विरोध ही है। जैसे की समस्या ग्लोबल वार्मिंग की ही लेलो। हिंदू सनातन काल से पेड़, नदी, सरोवर, और असंख्य प्राकर्तिक चीजो की पूजा करता आ रहा है। परन्तु उसकी हंसी उडाई जाती रही है. मैं आज दावे और गर्व के साथ कहेता हूँ की दुनिया के जितने भी समुदाये है यह जान ले की जान बचानी है तो हिन्दू धर्म को समझो. और एक बात मैं उन नाटकशाला के कलाबाजो को भी बता देना चाहता हूँ जो हर दम हिन्दू के विरोध में अपनी उर्जा का विनाश करते रहते है की हिन्दू ही एक मात्र धरम है बाकि सभी पंथ है. सुप्रीम कोर्ट की जो वियाख्या हिन्दू धर्म के बारे में है वो ही उचित है। बाकी सभी पंथो (इसलाम, क्रिश्चेन आदि ) को हिन्दू पद्वति अपनानी चाहिए और अपने जो भी पंथ की पूजा उपासना है उसे आप अपनाते रहो तभी मानवता बची रहेगी अन्यथा आप समझे की मानवता का अंत आ चूका है.मेरा आग्रह उन सभी विभिन्न पंथो के अनुयियो और पंथ गुरुओ से है की सभी विश्व में हिन्दू पद्वति पनाते हुए अपने अपने पंथ की पूजा विधाओ और परम्पराओ का पालन करे. और इसको हिन्दू धर्म की संकीर्ण व्याखा से न जोड़े.
  • अब आप देखिये हिंदुस्तान में ही कितने ही पंथ रहेते है परन्तु वो सभी हिन्दू धर्म के वृहद वृक्ष के नीचे बड़े प्रेम और उदार तरीके से रह रहे है। अब आप सोचो की यदि विश्व में इसलाम और क्रिश्चन जो की दो मुख्य पंथ है भी हिंदुत्व पद्वति अपना ले तो देखिय विश्व में कितना बड़ा मानवता का विकास होगा। और मित्रो आज से ५००० वर्ष एअसे ही संसार था भी।देखो दोस्तों कुछ एक काल खंड में कुछ एक समुदायों पर बड़ा भरी धन आगया और उस धन से उन लोगो ने बड़े ही क्रूर तरीके से अपनी स्वार्थ और संकीर्ण मानसिकता से एक पंथ विशेष को ही जब्रदास्त्री थोपा है और थोपे जा रहे है. अभी कुछ एक शताब्दियो से क्रिश्चन पंथ पर थोडा धन आगया तो उसने पुरे विश्व का स्वरूप ही बदल दिया. फिर पेट्रोल और अन्य तैलिये उत्पादों से इस्लाम पर पैसा आगया तो उसने भी अपने मध्यकालीन तरीके से अपना विस्तार शुरू कर दिया और जब दोनों ही पंथो के पास सामान पैसा आगया तो एक होड़ शुरू होगई. दोनों ही पंथो ने हिन्दू पद्धति त्याग दी और अपने पंथो को धर्म का दर्जा देदिया. और दुर्भाग्य से सभी शिक्षा (अंग्रेजी और आधुनिक) पर अमूमन क्रिश्चन पंथ का ही कब्जा है तो जिस चश्मे से उसने देखा और दुनिया को बताया तो सारी दुनिया ने पैसे के और बहुबल की वजह से उसे स्वीकार किया और माना है. और इधर हिन्दू धर्म के संस्कृत और अन्य भाषाओ में लिखे ग्रंथो को न समझने के और भारत - हिन्दू के कमजोर होने से उसमे किसीने रूचि भी नहीं ली फिर तो सभी ने पश्चिमी सिदान्त को माना. हिन्दू धर्म को पिछड़ा मान उसी रूप में व्याख्या शुरू कर दी. आप इस बात को कुछ इस प्रकार से समझे की आज से २0-३० साल पहले सभी लोगो अमरीकी बाजारवाद और रुसी समाजवाद दोनों एक बराबर थे और कुछ एक देश एअसा मानते थे तो कुछ एक वैसा परन्तु यह कोई नहीं कहेता था की यह गलत है और वो सही सब की आर्थिक प्रगति के पेरामीटर पर उस सिदान्त को अच्छा और बुरा माना जाता था.

  • और दोनों ही एक दुसरे को गलत ठहराने में लगे रहेते थे. परन्तु आज जब अमेरिका एक छत्र विश्व पर काबिज है तो अब रुसी अर्थशास्त्र पर लोग हंसते है और उसकी खिल्ली भी उडाई जाती है. मेरा कहना है की जिसके हाथ में लठ होता है बात उसी की ठीक है भाई, बड़ी मछली छोटी को निगलती ही है, शेर हिरन का शिकार करता ही है। सो कुछ इसी प्रकार का हिन्दू धर्म के साथ भी हो रहा है.

  • आज जब मैं बड़े बड़े वाम विचारो के घोषित विद्वानों को नदी, तालाब बचाने के लिए प्रेरणादायक भाषण देते और काम करते देखता हूँ तो बड़ी हंसी भी आती है और सुख का भी अनुभव होता है. यह बेचारे विद्वान् बस अपनी झेप ही मिटाते है और यमुना और गंगा की सफाई में जुटे रहते है. अरे हम हिन्दू उसको माँ मानते है और उसकी पवित्रता अक्षुण रखते है और आप उसकी पहेले हंसी उडाते रहे और अब प्राणों को संकट में देख जुट गए उसकी रक्षा में. चलो जो हो सो हो परन्तु आपको देर सबेर हम हिन्दुओ की पद्वति ही माननी ही पड़ेगी. और इस पर मुझे ख़ुशी नहीं की आप लोगो को हम हिन्दुओ की विद्वत्ता माननी ही पड़ी और न अंहकार ही है बस एक ही बात है की चलो इस बहाने ही सही परन्तु शुरुवात तो हुई। धीरे धीरे आप लोग हमारी सनातन संस्कृति और विचारो को मानोगे ही।

  • अभी आपको हमारी भाषा संस्कृत की विज्ञानीकता भी स्वीकार करनी है और फिर अभी सेकुलर भाइओ ने ध्यान और योग तो अपना ही लिया है। दोस्तों यह तो शुरुवात है. हिन्दू धर्म और बाकी पंथो में अंतर इतना ही है की यह पंथ पैसे और ताकत के बल पर अपनी अस्पष्ट सोच को बाकि बचे हिन्दू धर्मावलंबियो पर थोपना चाहते थे.

  • हिन्दू स्वेछा से सभी चीजो का पालन करता है चाहे वो नदियो की पूजा हो या पहाडो की चाहे वो शाकाहार हो या शांति का जीवन सब के पीछे अध्यात्मिक सोच है और आत्मा का परमात्मा से मिलाने की नियति है। परन्तु अन्य पंथो को अभी शाकाहार को भी मानना बाकी है और आप देखना अभी आयुर्वेद पद्वति भी आप अपनाएंगे। क्योंकि वो प्राकृतिक है और उचित भी.

  • क्या आप सोचते है चीन के लोग इसी प्रकार से ही रहेंगे, नहीं गलत! जब उनका भी आर्थिक रूप से मन भर जायेगा वो भी दलाई लामा की सत्ता स्वीकार करलेंगे.

  • क्योंकि अंत में तो सभी को शांति चाहिए. आप नहीं देखते पैसे से भरे अमरीकी लोग नेपाल और हिंदुस्तान के आश्रमों में पड़े हुए है वो पागलो की तरह शांति की खोज कर रहे है. यदि माइकल जैकसन इसलाम नहीं स्वीकारता तो वो भी आज किसी आश्रम से हिन्दू जीवन पद्वति सीखकर अपने को चाहे तो रिचर्ड गैर की तरह नहीं तो कैट विंसेट की तरह शांति से जीवन बीता रहा होता. क्योंकि माइकल जैकसन भी अंत में "क्या करू? " का शिकार होगया. हिन्दू जीवन पद्वति ही मनुष्य को आर्थिक चमौत्कर्ष के बाद बताती है की अब क्या आपको करना चाहिए।

  • आज मुझे एक कहानी भी याद आती है. कहानी लियो टोलसटोए एक रुसी विद्वान की लिखी है. एक बार कुछ एक पादरियो का दल अपने इसाई धर्म के प्रचार प्रसार के लिए अफ्रीका के देशो के लिए रवाना हुआ. उसका मानना था की इसाईओ की आलावा बाकी सभी लोग अनपढ है और न ही उनको ईश्वर का ज्ञान और इन पादरियो का ही कर्तव्य है उन बाकि लोगो को ईश्वर प्राप्ति का ज्ञान देना. इस तरह वो एक अफ्रीका देश पहुँच गए. वहां के आदिवासी लोगो ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया और सोचा की बड़े ही विद्वान लोग आये है. पादरियो को इतना मान मिलने के बाद उन्होंने अपने धर्म के बारे में बताना शुरू कर दिया. और लगे बाइबल का गुण गान करने. और बताने लगे की इस प्रकार इस बाइबल से प्राथना याद करके आप लोग भी हमारी तरह से ईश्वर को पा सकते हो. अब बेचारे आदिवासियो ने बाइबल रटनी शुरू कर दी. कुछ समय बिताने के बाद जब पादरियो ने देखा की अब यह लोग बाइबल पढ़ सकते है और प्रार्थना इन को याद होगई तो सोचा यह तो ईश्वर प्राप्ति का साधन जान गए अब किसी दुसरे देश में अपना प्रचार किया जाये और उनको बाइबल का ज्ञान बांटा जाये. ऐसा सोच कर वो लोग उन आदिवासियो से विदाई लेने लगे. आदिवासियो ने उन विद्वानों का धन्यवाद किया और उनको बड़े मान सम्मान के साथ विदा करने लगे. पादरी लोग अपने समुंदरी जहाज से अगले देश की यात्रा करने के लिए निकल्गाये किसी अन्य देश की ओर यह मान की उनका यहाँ आना सफल होगया और एक देश और अब बाइबल के रस्ते पर चलेगा. अभी पादरी लोग समुन्द्र में कुछ ही दूर चले थे की उनको कुछ एक पानी पर चलती परछाई नजर आई वो पादरी लोग घबराने लग गए की यह क्या हुआ. तभी वो परछाई और पास आने लगी तो देखा यह तो वो ही आदिवासी है जिनको वो बाइबल की प्रार्थना सीखा कर आय है. वो आदिवासी उनके पास हांफते - हांफते उनको प्रणाम करते है. पादरी लोग बड़े आश्चर्य से उनको देखते हुए की यह इतने लोग पानी पर धरती की ही तरह दौड़ते, बिना किसी सहयता के उनके पास आ कैसे गए. अपने सांसो पर काबू करते आदिवासी पादरियो से अनुरोध करते है की आप विद्वान लोग जो बाइबल की प्रार्थना उनको सीखा कर आय है वो तो यह भूल गय उनको वो प्रार्थना दुबारा सीखा दी जाय. अब पादरी अपने सूखे गले में तरावट लाते हुए बड़े आश्चर्य से कहेते है " अरे आप लोग वो बाद में सीखना पहेले यह बताओ की तुम बिना सहारे के धरती के सामान इस समुन्द्र के पानी पर चल कैसे रहे हो" आदिवासी बोलते है यह तो बड़ा आसान है आपके हमारे देश आने से पहेले हम जिस प्रकार आसमान की तरफ मुह कर कर बात करते थे हमने वैसे ही आसमान की तरफ मुह किया और बोले की हे आसमान! वो विद्वान लोग आय थे हमे कुछ अच्छी प्रार्थनाए सीखा कर गए थे और हम अनपढ लोग भूल गए. हम वो सीखना चाहते है परन्तु हमारे पास न ही कोई नौका है और न ही कोई साधन और अभी वो पादरी लोग ज्यादा दूर भी नहीं गए होंगे. बस ऐसा कह कर हम समुन्द्र के तरफ दौड़ने लगे और देखते क्यां है की हम समुन्द्र के पानी पर चलने लगे. और आप लोगो के पास आगये. बस अब क्या था पादरी लोग उनके आगे हाथ जोड़ते है की आप लोग महान हो आप को जो प्राप्त करने के लिए हम प्रार्थनाए सीखा कर आय है आप तो उस से भी बहुत अधिक आगे हो. प्रभु आप लोगो को यह सिखने की जरुरत नहीं है। आप लोग तो इतने सादे और भले लोग हो और आप ने तो हम से पहेले ही परमात्मा के सामान शक्ति को पा रखा है। आप जाइए और अपने पहली वाली पूजा ही कीजिय और हमे भी सीखाइए. और इस प्रकार उन पादरियो का घमंड भी चूर चूर हो जाता है की परमात्मा पाने का तरीका उनको ही आता है.

  • तो मित्रो हमारा भी यह ही हाल है हर प्रगति और आधुनिकता हिन्दुओ को आती है परन्तु इन थोथे और अल्पज्ञानी लोगो को हमे ही समझने में समय लग रहा है। जो बहुत गहराई में गय है उनको मालूम है की अल्बर्ट अंसटाईन जो की बहुत बड़ा वैज्ञानिक था को सारा ज्ञान भारतीये ऋषियो की पुस्तकों से ही मिला था. अब हर कोई तो वो पादरी नहीं जो अपनी भूल स्वीकार करेगा परन्तु एक दिन आयेगा जब इनलोगों को उन पादरियो की तरह अपनी गलती का अह्साहस होगा. तब तक आप अपने रास्ते और मैं अपने.

Monday, August 3, 2009

हाँ मैं शर्मिंदा हिंदू हूँ ! हाँ हूँ !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

हे देवी साध्वी प्रज्ञा! यदि सात सागरों के समुद्र का जल भी मुझ पर डाल दिया जाए तो भी मेरी शर्मिंदगी कम नही हो पायेगी। मुझे बचपन से सिखाया गया है नारियेस्तु पूजयंते तत्र देवता रमन्ते। परन्तु हे देवी! तुझ साध्वी को मांस खिलाया गया । तुझे अश्लील चीजे दिखाई गई। और हम निर्लाजो की तरह अख़बार पढ़ते रहे। हम शारदा, सरस्वती और लक्ष्मी की उपासक भी बने रहे।
  • यह उस भारत हिंदू भूमि पर हुआ जहाँ नारी के अपमान पर महाभारत हो गया। हम उस देश की परम्परा और धार्मिकता पर ढोंग करते है जिसके सामने तुझ पर झूठा आरोप लगा दिया गया। आज जब भारत सरकार की वैधानिक अदालत ने तुझ पर से राजनीती की चाशनी में डूबे आरोप को झूठा ठहराया तो हम हिंदू जो कंद मूल और फल खाकर वो भी पेड़ से अपने आप टूट कर गिरने वाले को यह धरती भी छोटी पड़ रही है उसमें समाने की लिए। अब न तो हम में माँ सीता की तरह सात्विकता है की जो धरती हमारे लिए फट जाये और उसमे हम समाजाये और न ही हम में कोई नेतिकता है जिस के जोर पर आसमान फट जाय। आखिर कितना गंभीर आरोप था जो कुछ एक राजनेतिक, घोर वजनी, तिरछे मुख के भांड लोगो की हिन्दुओ को आतंकवाद की गाली देकर देश को लुटने की पात्रता हांसिल की है। क्या मिल गया? कितने लोगो के राक्षसी पेट भर गय इस आरोप से। मुझे दुःख इस बात का नही की आप पर आरोप लगा और न ही खुशी इस बात की की मनानिये अदालत ने आप को एक बड़े आरोप से मुक्त कर दिया।

  • मुझे शर्मिंदगी अपने पर है की मेरी माँ, बहेन को एक विदूषक राजनैतिक व्यक्ति की क्षुद्र असुरी वोट के लोभ मात्र के लिए खंडित माँ भारती के अंचल में भी अपमानित किया गया। और जो इस हिंदुस्तान में नारी सम्मान और मानव अधिकारों की रक्षा का स्वांग भरते है उन्होंने अपनी आँखों में गुलाब जल डाल कर मुह में फैविकोल का घोल डाल कर घोर चुप्पी डाल बैठे। नहीं मालूम की आपको निर्लाजता की सीमा से भी कोसो दूर जाकर अपमानित और पीड़ित किया गया। पर देवी क्या करू भारत को न तो महाराणा प्रताप और राणा सांगा की पूर्वजो का पता और न उनकी पीडा का इनको तो पता है उस समय के भडवे राजवंशो की वर्तमान संतानों का जो आज बड़े ही वैभव से हिंदुस्तान में रह रहे है। इसलिए देवी में दुखी हूँ की हिन्दू की बेटी किस आरोप में और निजी और राजनेतिक आरोप में जेल में पड़ी रही और हम बहार सेंसेक्स और इकोनोमी में विचरते रहे। नहीं मालूम की मेरी माँ शारदा की नंगी और आपतिजनक तस्वीर बनाने वाले को मेरे भारत का मंत्री उस राक्षश ऍम ऍफ़ हुसैन को भारत रत्न देने की मांग कर रहा है। कांग्रेस की थिंक टैंक कहे जाने वाले विदूषक राजीव शुक्ल उस राक्षश को हिंदुस्तान में ससम्मान लेन के लिए संसद में कोहराम मचाय हुए है। मेरे राम का धरती पर न होने का प्रमाणपत्र बाँटने वाली अम्बिका सोनी को प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ने प्रोमोट करते हुए उनको बड़ा मंत्रालय दे दिया। और कमाल तो सबसे बड़ा मेरी देश की जनता ने किया देवी की भारत हिन्दू देव भूमि पर हिन्दुओ को धिक्कारित करने और राम को गाली देने वालो की सरकार बना दी और देखो होंसले इतने बुलंद है की देश में माँ सरस्वती की घोर आपत्तिजनक तस्वीर बनाने वाले भांड को भारत रत्न भी कभी भी दिया जा सकता है। अरे आस्ट्रेलिया सरकार ने एक भारतीये मुस्लमान को आतंकवादी घटना के शक में पकड़ लिया था प्रधानमंत्री सारी रात नहीं सोया था और जब तक वो भारत नहीं आगया हिंदुस्तान की मीडिया के पेट में दर्द होता राह और हे देवी जब वो आया हिंदुस्तान की सरजमीं पर तो हिंदुस्तान में दीवाली मनाई गई। हिंदुस्तान में हिन्दू नाम को गाली बनाने वाले और उसको आतंकवादी घोषित करने वाले आज गेहूं, चावल और चीनी की दलाली में अपना घर भर रहे है। देखो तो सही आपकी एक मोटर साईकल से आपको पुरे आतंकवाद का पुरोधा बता दिया गया। गौरवान्वित करने वाली भारत की सेना के कर्नल पुरोहित को अपराधी घोषित कर दिया। देवी इन पर मत जाओ इन होने तो मुंबई हमले के अपराधी कसाब को भी हिन्दू ही घोषित कर दिया था। हम हिन्दू इस देश में अपनी ही बेटी और बहेन पर होने वाले क्रूर अत्याचार पर सिर्फ अख़बार पढ़कर ऑफिस के लिए तैयार हो सकते है। देखो कल राखी है आपके आरोप मुक्त होने पर भी कितने हिन्दू भाई आपके पास राखी बंधवाने आते है। कोई नहीं आयेगा क्योंकि हिन्दू की फितरत (गुलाम मानसिकता के कारण)ही ऐसी है। कहीं किसी मुस्लमान की बेटी के साथ हो जाता तो हिंदुस्तान का तख्त पलट दिया जाता। देखा नहीं एक बटाला हाउस में पकडे गए आजमगड़ के मुस्लमान के लिए अभी तक उलेमा रेल चलाई जा रही है। जंतर मंतर पर आज भी आन्दोलन हो रहे है। इसको कहेते है होंसला। मुस्लमान अपने इसी होंसले से एक और राष्ट्र मांग सकता है और हम हिजडो की तरह फिर से शांति की कामना के लिया स्वीकार कर के फिर अगली दोहराने के लिए तैयार हो जायंगे।


  • हिन्दुओ को तो एक इमरान हाश्मी ने ही धक्किया दिया है। एक मकान न मिलने से उसने १०० करोड़ हिन्दुओ को अपमानित करदिया। उस यह भी नही मालूम की हिंदुस्तान के १०० करोड़ लोगो ने ही खान लोगो की बोलीवुड में बादशाहत स्वीकार की हुई है उसे नही मालूम की १० साल एक मुसलमान ही इस देश के क्रिकेट का कप्तान रहा है। खैर हिन्दुओ और हिंदुस्तान की बदकिस्मती तो है ही की अपना खून भी पिला दिया तो बदले में अहसान फरामोशी के आलावा क्या ददिया। हाँ खुजली से पीड़ित महेश भट्ट को भी सोचना चाहिया हर हिंदू और राष्ट्र विरोधी बात पर क्यों मुखर हो जाता है बिना सच को जाने। मानिए की कही न कही महेश भट्ट हिंदू होकर मुसलमानों और अन्य धर्मो में सम्बन्ध बनाने की कुंठा से पीड़ित है और उस अपराधबोध के चलते हमेश धर्म विरोधी कार्यवाही के सिरमौर रहा है बिना यह जाने की सच क्या है। महेश भट्ट जी कोई बात नही जवानी के जोश में बहुत से लोग आपकी तरह ही करते है फ़िर आपकी ही तरह अपराधबोध में झुलसते हुए उलजलूल हरकत करते है फ़िर इमरान को तो आपकी सरकार ने केस कर दिया आपका क्या?


मित्रो इस धरा ने नारी का अपमान किया है और इस साध्वी के अपमान से मैं तो अपराधबोध से ग्रस्त हूँ। अब देखना यह है की साध्वी को जबकि अदालत ने उसको राहत दे दी है को मुख्य धारा में भी कोई लाता है की नही। कल राखी है, है कोई जो साध्वी के पास जाय और राखी बन्धवाय। वो भारतीय गौरवन्वित सेना के कर्नल पुरोहित है देखना है कितनी बहेने उसको राखी भेजती है। धर्म को निभाने के लिए किसी का इंतजार नहीं करना पड़ता। अंत में विजय हमारी होगी क्योंकि धर्म हमारे साथ है और धर्म जिसके साथ है सत्य उसके साथ है और सत्य जहाँ है नैतिकता वही पर है। हिन्दू जैसे धर्म पर आतंकवाद का ठप्पा लगाने वालो को इस जहाँ में ठौर नहीं मिलेगा।

Thursday, July 30, 2009

भारत का आउटसोर्स्ड प्रधानमंत्री और उसकी निर्लाजता !!!!!!!!!!!!!!!

सवर्प्रथम बड़े आदर और सम्मान के साथ मैं आदरनिये प्रधानमंत्री सरदार श्री मनमोहनसिंह जी से उनकी देश को विगत में की गई सेवा और उनकी अद्व्भुत कार्यशैली के लिए साधुवाद देना चाहूँगा।

  • श्री मनमोहन सिंह जी बड़े विन्रम, सौम्य, सरल, निष्ठावान, कुशाग्र, विद्वान, वफादार (किस के पता नही), इमानदार, स्पष्ट, नेक, साफ़ छवि वाले, बेदाग, समर्पित, अध्ययनशील, विकास उन्मुखी, प्रगतिशील, आधुनिक, खुले विचारो के, धार्मिक, अराजनैतिक वियक्ति है। बस पिछले १० - १२ सालो में मैंने इतना ही इस महान शक्सियत के बारे में सुना है। कभी नही सुना की देशभक्त भी है की नही, कभी नही सुना की जिस आम आदमी का कचूमर निकाल दिया उसके प्रति भी कुछ सोच है की नही।

बस बड़े ही डरावने तरीके से कही परदे के पीछे से एक हाथ हिलाते हुए आते है और पता नही फ़िर कहाँ आझोल हो जाते है। यह उस लोकतान्त्रिक और आधुनिक युग की बात कर रहा हूँ जब की आपको यह भी पता होगा की अमिताभ के पोते का नाम क्या होगा या धोनी की गिर्ल्फ्रैंड कौन है परन्तु है कोई माई का लाल जो बता दे की १२० करोड़ लोगो के देश के प्रधानमंत्री के घर के कौन सदस्य है। खैर मेरा आज का मुद्दा यह है ही नही। यह तो इस शख्स की रहस्यमय और अबूझ शक्सियत के बारे में हमारी उत्कंठा है।

  • ऐसे कई मुद्दे है जो मनमोहन सिंह जी के वियाक्तित्व को सुलझा सकते है जैसे की एक मुद्दा परमाणु समझोते से सम्बंधित है आप याद करे की श्री मनमोहन सिंह जी ने समझौता करते हुए एक बार भी यह तर्क नही दिया की देश के हित में है की नही बहुत से तर्क दिए कोमुनिस्ट को रूडीवादी और अंधी अमरीकी विरोध के बारे में, यह भी बताया गया की अब भारत अंधेरे से मुक्त हो जाएगा, यह भी की अब हम प्रगति करेंगे परन्तु हौले से भी यह नही बताया गया की किस कीमत पर। क्या भारत कोई राष्ट्र है भी की नही या अन्धो की जमात भर ही है जिनको परमाणु समझोते के बल्बों की सुर्ख रौशनी से अपनी आंखे चौन्ध्वानी भर है। नही बताया गया की प्रधानमंत्री की राष्ट्र की निष्ठां से कोई सरोकार है भी की नही। परन्तु प्रधानमंत्री की घोर वियाक्तिवादी और एकपक्षीय (अमरीकी) सोच इस ५००० साल के भारत राष्ट्र की प्रतिब्द्ताओ पर भारी पड़ने की निर्लाजता तो की ही है।

  • आज तक सरदार मनमोहन सिंह यह नही बता पाए की रौशनी के लट्टू इस समझोते से चलने के आलावा भारत की प्रतिष्ट के कितने लट्टू फियूज किए है। हमे बताया जाए की मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री है या अमेरिका के हिंदुस्तान में लट्टू मंत्री?

  • दूसरा हमे मनमोहन सिंह जी ये बताये की पाकिस्तान सम्बन्धी नीति पर फन्ने खा बनने का फितूर कहाँ सवार हुआ? न तो पाकिस्तान पर निर्णय करने की आपकी नैतिकता है, न आप हिंदुस्तान के चुने हुए सांसद है (लोगो द्वारा) , न आप बहुमत के प्रधान मंत्री है, न आपका कोई जनाधार है , न आप कोई राजनैतिक व्यक्ति है, आप तो एक परिवार विशेष द्वारा चुने हुए एक मनोनीत व्यक्ति मात्र है। फ़िर किस इकबाल पर आप और किस नैतिकता पर आप पाकिस्तान जैसे गंभीर विषय पर अपने अल्प ज्ञान का परचम लहराए। मैं फ़िर कहेता हु की आप व्यक्ति बहुत अच्छे हो सकते हो परन्तु प्रधानमन्त्री के नाते तो आप बुहुत ही कुरूप और निकृष्ट हो।

मैं आज आप को एक कहानी भी सुनाता हु, जरा ध्यान से सुनना फ़िर जाकर अइना देखना की खड़े कहाँ है। टीवी चैनलों के सिंह इस किंग वाले गाने से आप मत भरमा जाना। नही तो आपमें और बारहा मन की धोबन देखने वाले मेलो के बच्चो में कोई अन्तर मुझे नही दीखता है।

राजा विक्रमादित्य के समय में एक द्वारपाल था। एक दिन महाराज के पास आकर राजा को बताता ही की राजा आप कल शिकार पर अकेले मत जाना नहीं तो वहा पर आपको विश्राम करते समय वृक्ष के नीच एक बहुत विषैला सर्प दंस मार देगा जिस से आपकी मृत्यु हो जायेगी। राजा कहेते है ठीक है एसा नहीं होगा में अपने साथ तुम्हारे कहेने से कुछ सैनिक भी लेता जाऊंगा. परन्तु उस जंगल में पिछले कई वर्षो से जाता हूँ। मुझे नहीं लगता की वहा पर किसी विषेले सर्प का वास है. अगले दिन राजा जंगल जाता है. उसको आराम करने की आवश्यकता होती है. परन्तु अपने सैनिको को पेहेरेदार की बात याद कर अपनी सुरक्षा के जिम्मेदारी छोड़ कर सो जाता है. फिर स्वपन के हिसाब से सर्प आता है परन्तु जैसे ही फन फैलाकर राजा को डसता है तभी चौकस सैनिक उसको मार गिराते है. राजा की जान बच जाती है. राजा तुंरत महल वापस आकार उस पेहेरेदार को बुलावा भेजता है. और उस से पूछा की आप तो बिलकुल सही थे परन्तु आप बताये की आपको पता कैसे चला इस घटना का. तो पेहेरेदार राजा को बताता है की जिस समय मेरा रात के पहेरा होता है मुझे उस समय नींद आती है और उस समय में मैं जो स्वपन देखता हूँ वो निश्चित रूप से सच होते है. राजा सुन कर उसे कल दरबार में आने के लिए कहेता है. पेहेरेदार सोचता है अब राजा को मेरी कीमत का पता चला है. अगले दिन वो राजदरबार में पहुचता है राजा उसे इनाम देता है और अपनी नौकरी से इस्तीफा देने के लिए कहेता है. सभी लोग यह सुन कर आश्चर्यचकित होजाते है. तभी राजा कहेता है हे पेहेरेदार तुमने हमारी जान बचाई इस के लिए हम तुम्हारे आभारी है उसके लिए हमने आपको अपने व्यक्तिगत कोष में से इनाम देदिया है परन्तु आप ने अपनी नौकरी के वक्त अपने कर्त्तव्य का पालन न कर कर सोकर दंड का कार्य किया है. इसलिए आपको पद मुक्त किया जाता है. आपका जो काम रात को राज्य की रक्षा करना था वो आप करने में असमर्थ रहे और किसी भी वक्त दुर्घटना के समय आपका सोते रहेना राज्ये पर आक्रमण के समय हार का कारण बन सकता है. हो सकता है आप व्यक्तिगत रूप से मुझे अच्छे लगते हो और मेरी जान भी बचाई है परन्तु आपने अपनी पहरेदारी की पात्रता से अन्याय किया है इसलिय उस से आपका पदमुक्त होना ही शासन के लिए सही होगा.

  • तो मित्रो इस कहानी के जरिए मीडिया में बैठे भोपूओ को मैं बता देना चाहता हूँ की हो सकता है मैं सरदार मनमोहन सिंह के व्यक्तिगत गुणों से प्रभावित हु और वो अच्छे भी हो परन्तु जरुरी नहीं की उनके यह गुण उनकी प्रधानमंत्री की पात्रता के उपयुक्त ही हो. इसलिए जो आपने प्रधानमंत्री काल के दौरान अपने कार्य के नमूने दिए है उनसे आपकी प्रधानमंत्री की पात्रता पर गंभीर प्रशनचिंह लगते है. उचित होगा आप आपने कार्य से इस्तीफा देकर आपने अध्भुत गुणों से कोई रिलेशनशिप फर्म चलाये प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं. परन्तु आप न राजा हरिश्चंद्र है जो स्वम सिंहासन छोडेंगे और न वो कांग्रेसी विशेष परिवार राजा विक्रमादित्य है जो आपको पदमुक्त करेगा. और न हम ही मगध की प्रजा जो लोकतंत्र की ताकत को समझ सके.

  • चलिए अब बात करते है आपके तथकथित गुणों के बारे में एक एक करके सब से पहेले प्रशन आता है आपके अर्थशास्त्री होने के लाभ का. तो बता दू वो दावा भी एक दम झूठा है. हमे आपके अर्थशास्त्री होने का एक भी लाभ नहीं मिला। क्योंकि यदि कांग्रेस दावा करती है की नरेगा उसकी देन है तो कतई भी आप उसको लागु करने के पक्ष में नहीं थे. दूसरा आज जो महंगाई है वो आपके गुणों की चाट है जिसको आपका आम आदमी अपनी खाली उंगलियों से चटखारे ले ले कर चाट रहा है. संसेक्स आप के प्रधानमंत्री काल में पाताल में चला गया है. होम लोन मिल नहीं रहे है.

  • प्रगतिशील भी आप कभी नहीं थे और न आप चाहते होना। आप ढोंगी है और दम्बी है जिसने अटल सरकार की स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क निर्माण को ही ठेंगा दिखादिया। उसी सरकार की देन गावों को शहरो से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना का आपने गला घोंट दिया। इसलिए न तो आप हमारी प्रगति ही चाहते और न ही आप प्रगतिशील है.

  • तीसरा आप सभ्य और सोम्य भी नहीं है यदि होते तो रूस में पीछे राष्ट्रपति जरदारी से मिलते वक्त शिष्टता बरतते. आपने व्यक्तिगत संबंधो के प्रोटोकाल को तोडा बड़ी ही असभ्यता से व्यक्तिगत बातो को आपने मीडिया को बड़े उचे स्वर में कहा जिसको कोई भी सोम्य और सभ्य नहीं कहेगा. इसलिए यह दावा भी आपके बारे में खोखला है.

  • चोथा लोग आपको वफादार कहेते है जोकि बिलकुल ही गलत है. आप सबसे पहेल प्रणव मुखर्जी के निचे काम करते थे. आज आप उनसे चिड़ते है. फिर नार्सिम्म्हा राव ने गुमनामी के अँधेरे से निकाल कर वितमंत्री बनाया. वो बेचारा जिन्दा रहेते आपके सहयोग से महरूम रहा. मरने के बाद उसके नाम से एक स्मारक दिल्ली में नहीं बन सका. उसके बच्चे आप से मिलने को आज भी तड़फते है. पर मजाल है जो आप कभी उनसे मिलने का समय दिया हो. तो इसकी क्या गारंटी है की कल अमरीका की गोद में बैठ कर आप सोनिया गाँधी और कांग्रेस को उसकी औकात नहीं दिखा देंगे. अरे औकात तो आपने साढे चार साल आपकी पालकी ढोने वाले कोमुनिस्ट को भी दिखा दी. तो सहभ आप इस्तिमाल करो और फैंको की नीति के दक्ष खिलाडी है. इसलिए ये गुण भी आपका परचित मात्र एक ढकोसला भर है।

  • अब आता है आपके विनम्रता के भावः की बात तो मैं बता दू वो भी एक दम गलत है. आप न कभी विनम्र थे और न है। आप को याद दिला दूँ की आपकी पहेली बार सरकार बनाने के तुंरत बाद आपने अपने संसद भवन के कमरे में प्रतिनिधि मंडल लाये अडवाणी जी के मुहं पर सरे आम कागज फैंके थे. और अभी हाल फिलाल आपने चुनावो के समय अडवाणी जी पर आरोप लगाते हुए अपनी असभ्यता का परिचय दिया था. जब अडवाणी जी ने शिष्टाचार वश हाथ जोड़े थे और आपने उनका अभिवादन भी स्वीकार नहीं किया था. इसलिए आप की विनम्रता का वो असली और नंगा सच था.

  • रही बात आपके स्पष्ट व्यक्ति होने की बात तो संसद में अभी चलते आपके बयान से पता चल जाती है की आप कितने स्पष्ट है। आप की घोर अस्पष्टता के कारण ही आपकी कांग्रेस पार्टी, आपके संरक्षक गाँधीपरिवार, भारतीये संसद, विदेशमंत्रालय और विपक्ष में अनिश्चता का माहोल है. तो आप ही बता दे की आप कितने स्पष्ट है. और फिर इस घोर अनिश्चिता का कारण आपकी स्पष्टता की ही विफलता नहीं है.

  • खैर अब बात आती है आपकी विद्वता की तो आपने जो साँझा बयान पाकिस्तान के साथ अभी दिया है और उस लिखित बयान में जो त्रुटी जिसका की आपके शंकर मेनन जी दावा करते है। तो अपने समझ के बहार है की एक घोषित रूप से हिंदुस्तान का विद्वान जो की उसके प्रधानमंत्री की पात्रता का मुख्य स्तम्भ है और जो रिजर्व बैंक का गवर्नर रहा है और सयुंक्त राष्ट्र की मोटी पेंशन लेता है. उसकी ड्राफ्टिंग में भी त्रुटी है वो भी अंग्रेजी में. तो भाई इसका मतलब आपने इंग्लॅण्ड की ऑक्सफोर्ड पर भी कालक मल दी. जब आप क्लर्की का काम भी नहीं कर पा रहे हो तो कहाँ की विद्वता. और जिसके पीछे हिंदुस्तान संसारभर में हंसी का पात्र बने उस की विद्वता पर फिर हम क्यों खिल्ली उडवाय.

  • हाँ इन सब गुणों में आप खुले विचारो के तो है वो मैंने स्वीकार कर लिया। आप की ही सरकार में सेम्लेगिकता का विचार इस भारत को मिला है जिस से पता चलता है. की वाकई इस गुण की पात्रता तो आप में है ही. जिस से मैं तो कम से कम सहमत हूँ ही.

  • अब में कुछ आपके चाटुकारों पर भी आता हूँ जो आपके सिख होने की वजह से काफी दम भरते है। जो सिख भाई है उनको बता दू की हिन्दुओ के रक्षक परम पूजनिय प्रात समरनीय आदरनिये श्री गुरु गोबिंद सिंह जी जिनकी एक सिंह दहाड़ से मुसलमानों के अंतडियो में पानी सूख जाता था. या वो महाराजा रंजित सिंह जो पंजाब का शेर था. क्या सिख भाई देखते है की श्री मनमोहन सिंह जी उस परम्परा के वाहक है. यह में उन ही पर छोड़ता हु. मुझे कोई शक शुबहा नहीं की वो भी रंजित सिंह जैसा ही हिंद शासक पसंद करेंगे।

अंत में प्रधानमंत्री जी अनुरोध करूँगा की आपकी नोबल पुरस्कार की चाहत पर इस ५००० वर्ष के राष्ट्र को बलि न चढाया जाय. और कांग्रेस से अनुरोध करूँगा की भारत सुपर पावर बनेगा जब चीन के नेताओ से राष्ट्र प्रतिबधता सीखोगे. किसी राष्ट्र पर रीड विहीन राष्ट्राध्यक्ष थोप कर और उसकी कलाबजिया देखकर नहीं. निर्णय आपका है तब तक सिंह (परन्तु जंगल का नहीं) इस किंग.

Wednesday, July 29, 2009

भारत में कौन है सबसे शक्तिशाली?????????????

इस प्रशन को यदि युधिष्ठर से पूछे यक्ष पर्श्नों में भी शामिल कर लिया जाए तो प्रशन शीघ्र नही मिलने वाला। और इस प्रशन को शीर्षक बानाने का उदेश्ये भी पिछले कुछ दशको के भारतीये और वैश्विक इतिहास के गेहेरे परन्तु भयंकर अश्चार्जनक खूंखार समुन्द्र में गोता लगाना भी है।
मुझे यह एक बात बहुत ज्यादा कचोटती भी और दिग्भ्रमित भी करती है की हिंदुस्तान की वो कौनसी शक्ति है जो हिंदुस्तान से जुड़े इन अतिमहत्वपूर्ण चीजो का निर्धारण करती है. और कौन मेरे इन कुछ एक घोर आश्चर्यजनक तथ्यों के उत्तर दे सकता है।
  • हिंदुस्तान की संसद को पता नही की भारत की विदेशनीति क्या है?
  • हिंदुस्तान की सरकार को पता नही की विदेश नीति के नाम पर किसका बंटाधार किया जा रहा है?
  • हिंदुस्तान के विदेश मंत्री को पता नही की उसके मंत्रालय में क्या हो रहा है।
  • वो क्या मिश्र देश में अदभुत शेक (जूस) का रसपान होगया की हिंदुस्तान का प्रधान मंत्री एक महीने पहेले जरदारी के सामने राजा रंजित सिंह की दहाड़ से विसरित हो कर अनारकली के घुंघुरू की भांति रसिकता का श्रृगांर करके हिंदुस्तान की नाक को अरब के घोडो के नीचे रुन्दवा आया।
और इस भारत की विदेश नीति को विध्वंस नीति को कौन बना रहा है। उसको सामने लाया जाए और सम्मानित किया जाए की भारत को इस कद्र बेचोगे तो तुम हो ही परन्तु रद्दी के भाव क्यों?
  • दूसरा मेरा प्रशन था की क्यों भारत सरकार ने प्रियंका वढेरा और उसका वढेरा परिवारू, राहुल गाँधी को ताउम्र के लिए सुरक्षा से छूट दे रखी? अब इस प्रशन को मेरे गाँधी परिवार से कोई इर्ष्या को न माना जाए। बल्कि एक बहुत ही गंभीर बात है की एसा क्या है जो इनको अति अति विशिष्ट व्यक्ति का तमगा दे कर संविधान में संशोधन तक की हद तक चले गए। यह कोई छोटी बात नही है की की भारत जैसे देश इनको उस अति विशिष्ट और वो भी ताउम्र के लिया इन को खासुल खास बनाया गया है। मैं सोचता हूँ जहाँ शंकराचार्य भी अपने २००० वर्ष पुराने ध्वज को चेक कराते है। जहाँ पूर्व राष्ट्रपति के जूते खुलवा लिए जाते है वहां एसा क्या अलाद्दीन के चिराग का तेल है की इनको अपने एलिजाअबेत ब्रिटिश महारानी की समान विशेष अधिकार देकर हिंदुस्तान के नागरिको का राज परिवार अघोषित रूप से बना दिया। वो गायत्री देवी भी आज स्वर्ग चली गई जो इन ही की दादी इंदरा जी के राज परिवार के विशेषा अधिकार ख़त्म करने के विरूद्व लडाई करती रही। परन्तु अब कुछ कुछ वैसे ही अधिकार उसके पोते और पोतीया एन्जोये कर रही है।

  • तीसरा प्रश्न मेरा दो प्रतिशत कोट पैंट और टाई पहेने ९८ प्रतिशत धोती वाले लोगो पर रौब गाठने पर है। यह टाई पहने जो अंग्रेजी के हर वाक्य के पीछे न (जैसे वी आर गोइंग न ) जैसे अद्भुत वाक्य विन्यास करते नजर आते है। मैं दावे के साथ कहेता हूँ जिस अंग्रेजियत पर भारत के ये दो प्रतिशत लोग अकड़ते फिरते है इन में से ९८ % लोग अंग्रेजी में एअसे है जैसे तरबुजो के बीच आलू बुखारे. अंग्रेजी का एक वाक्य बिना (न) के सहारे पूरा नहीं कर सकते. मित्रो अभी विदेश में था मैं तो एअसे ही कुछ हिन्दुस्तानी अंग्रेजो से पाला पड़ा तो मुझे हँसे बिना न रहा गया। अंग्रेजी एअसे बोलते जैसे की अब यह वाक्य न समझ आया तो अपना बल प्रयोग भी करेंगे और जिस (न) का मैंने ऊपर जिक्र किया उसका इस्तेमाल तो वाक्यों में एअसे करते है जैसे मुहं में टुकडा देकर उसको ठूंस कर हलक में उतरने का प्रयास करते हो. चलो थोडा से मैंने इसी बात पर ज्यादा जोर दे दिया परन्तु उदेश्य यह बताने का है की यह १०० करोड़ लोगो के दो प्रतिशत और उसमे भी ९८ % अंग्रेजी भाषा में अल्प अंग्रेज भाषी (हर अन्ग्रेजी वाक्य के पीछे 'न' पर जोर देने वाले) मीडिया और हिंदुस्तान की नीतियो के करता धरता है.

  • चौथा प्रशन मुझे हिंदी मीडिया के सभी मुर्धन्यो और पत्रकारों से पूछना है जो की संसार के सबसे बड़े, सबसे ज्यादा बिकने वाले और सबसे अधिक विस्तृत किसी भी भाषा के अखबारों से ज्यादा यह हिंदी के अखबार मुख्य धारा की राजनेतिक खबरे क्यों नहीं छापते। अंग्रजी अख़बार ही सारे स्टिंग ओपरेशन करता है। अंग्रेजी अखबार ही सरकार की आलोचना करता है। सारे विवादित और प्रमुख पत्रकार और मुख्य लोग अंग्रेजी अख़बार में ही लिखते है और हिंदी के अखबार हमे कभी मुख्य समाचार दिल्ली में हुई चार हत्या, भोपाल में हुई सड़क दुर्घटना, और पटना में हुई बारिश की ही खबर पढाता रहता है। खैर टीवी की तो मैं बात ही नहीं करना चाहता। और उसी दिन अंग्रेजी के अख़बार भारत सरकार की सभी नीति निर्धारण और सरकार की संसद में हुई या केबनेट में हुई मुख्य बातो पर कई पन्ने छाप देता है। अब दोबारा यह ही प्रशन उठता है की यह अंग्रेजी मीडिया ही देश की गंभीर मुद्दे पर चर्चा क्यों करता है क्यों ९८% हिन्दुस्तानियो के अखबार के पाठक गंभीर बातो को जानने से वंचित रहे। इस बात के लिए सारे हिंदी मीडिया पर मेरी तरफ से थू थू है। यह हिंदी मीडिया के लोग अपने प्रोफेशन से खिलवाड़ और देश के साथ देशद्रोह कर रहे है। आप उदहारण के तौर पर आज ही के अख़बार देख लो अंग्रेजी अखबारों में विपक्ष के मुख्य बिंदु है और हिंदी अखबारों में प्रधानमंत्री का ओपचारिक भाषण और विपक्ष के यशवंत सिन्हा की अति महत्वपूर्ण बाते अंदर के किसी पन्ने के कोने में है. क्योंकि हिंदुस्तान के लोकतंत्र की ताकत का दम भरने वाले यह अख़बार वाले बड़ी चालाकी से उसी लोकतंत्र के रक्षक और वोटरों को महत्वपूर्ण नीतियो की जानकारी न देने का महापाप करते है और उनसे वोट डलवाते प्याज के मुद्दे पर, खरबुजो के बीजो पर, सड़क के स्पीड ब्रेकरों पर, नालियो के बंद होने पर, रोडवेज की बसों के किराये बढ़ने पर और मित्रो बाद में हमे ही और विदेशियो को भी बताते है की इस बार हिंदुस्तान के वोटरों ने बड़े जज्बे और जागरूकता से प्रधानमंत्री की विनवेश नीति/ विदेश नीति/ और वगैरह वगैरह पर स्पष्ट बहुमत दिया. अरे भइये उस वोटर को तो पता ही नहीं की किस चिडिया की नीति के बात कर रहे हो. और उसको तो आपने अँधेरे में रखा उसको तो अपने इंडिया गेट की बारिश से भीगती युगल जोडियो और कार्टून कोने में ही व्यस्त रखा और अब अपने स्वार्थ के लिए उसका मन चाह विश्लेषण कर रहे हो मतलब की गधे की गलती और धोभी की धुनाई.

  • तो भाई सबसे ताक़तवर वोटर तो नहीं है वो तो २ % चाटुकार है जिसने हिंदुस्तान के लोगो को मुर्ख बनाने की तनखाह लेनी है। एअसे ही अपने स्वार्थो के लिए इ वी एम् मशीनों को बना दिया। भारत के वैज्ञानिको का कमाल, विदेशो में ख्याति प्राप्त मशीन और न जाने क्या क्या भारत के आदमियो को भरमा दिया. क्योंकि अब उसको गौरवशाली मशीन और भारत के गौरव से जोड़ दिया अब उसपर तो प्रशन लग ही नहीं सकता यदि लगा तो भारत के गौरव से खिलवाड़ है।

  • इस तेरहे से भारतीय लोकतंत्र का आम भारतीये को मुखोटा पहेना दिया। अब उसकी आड़ में कुछ भी कर लो जो की आज कल भारत सरकार कर रही है. ऊपर से तुर्रा यह की भारत के जागरूक मतदाता ने इस (नीति ढकोसले) को भारी मतों और भरोसे से जीताया है. अरे शिखंडी टाइप नौटंकी बंद करो और भारत के लोगो को कबूतरी लीला मत करवाओ. जो करना है करो परन्तु इस भारत ने न तो सरदार मनमोहन सिंह को चुना और न उसके बलूचिस्तान की प्रेम कथा की नाटक मंचन प्रस्तुति को.

  • इस के आगे इन शिखंडियो ने संविधान के साथ भी यह ही किया है अपने आप और अपनी कलंदरी कलाओ के लिए ४२ संसोधन कर लिए परन्तु कांग्रेस के आलावा उसमे कोई और पार्टी कुछ करे तो अम्बेडकरवादी दलितों को सामने कर देते है की महान विचारक, चिन्तक और दलित चेतना के पुरोधा के मानसिक विचार जो उन्होंने भारत के संविधान के रूप में कागज के रूप में उकेरकर किताब की शकल में हमारे ऊपर ठोक दिए को कांग्रेस के आलावा कोई भी बदलने की गुस्ताखी नहीं कर सकता।

  • अब मित्रो ऊपर की सभी बातो के बाद मुझे बता दो की इस देश में सर्वशक्तिमान है कौन? अरे तुम तो भेड़ हो और गडरिया तुम्हे हांक रहा है.और गले में मारा सांप लटकाए घूम रहे हो की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का लंगूर तुम ही हो.भाई मना नहीं करता की तुम नहीं हो परन्तु देखो तो और खास तौर पर क्षत्रिये और हिंदी भाषी अख़बार वाले की संसद में क्यों अंग्रेजी अखबार की प्रतिया ही लहराई जाती है? क्यों तुमको इतना सम्मान भी नहीं मिलता? इसका जवाब भी मित्र तुम ही हो क्योंकि तुम हिंदुस्तान की असली ताकत और उसके लोगो को समाचार और सुचना न देकर उसको अँधेरे में रखने का महापाप कर रहे हो. और यह अंग्रेजी के २% लोग ही देश के सर्शक्तिमान है और इनके ही नेता प्रियंका और राहुल है इसलिये वो भी विशेष अधिकार के पात्र है.

  • बाकि मेरे और आपके जैसे है जो इंडिया टीवी पर "एअ सी पी अर्जुन" और चटकारे लेकर "वारदात" देख रहे है और देश के २% लोग भविष्य की भारत की विदेश नीति का सौदा कर रहे है. और बाद में हम लोग ही भारी बहुमत से उसको वोट देकर मोहर लगायेंगे अब यह इतर बात है की हम मोहर तो अपने मोहल्ले में सड़क चौडी करने और नगर का सौन्दर्यकरण न होने पर उतेजित होकर वोट देने गए थे. और रातो रात इन ही पत्रकार मोहदय ने हमे देशी की विदेश नीति पर वोट देने वाला जागरूक वोटर करार देकर इतिहास के पन्नो पर महान घोषित कर दिया. और हमे पता भी नहीं की हम इतने बड़े जागरूक है की विदेशो के लोग हमारी जागरूकता पर शोध कर रहे है. इसी को ही तो कहेते है की माँ मर गई अँधेरे में और धी (बेटी) का नाम लालटेन .

  • देखा नहीं अपने अभी कांग्रेस को सत्ता में लाने का हमारे सभी मीडिया भाइओ ने क्या वियाख्या दी है के भारत के नागरिको ने साम्प्रदायिक बीजेपी को नकार दिया. और इटली की महान नेता और दिव्ये गुणों से ओतप्रोत, मानवता और त्याग की प्रतिमूर्ति और उनके टोपीधारी देशभक्त संघठन कांग्रेस को भरी बहुमत देकर सरकार बनाने (देश बिगाड़ने) का अवसर दिया. अब यह अलग बात की जो ११६ सीट बीजेपी ने जीती है उसके सभी मतदाता एका एक साम्पर्दायिक होगए. सुन रहे है चुनाव आयोग वाले की नहीं।
    धन्य हो प्रभु ९८% लोगो की भावनाओ को अभिवियक्ति देने के लिया। इतिहास आपके कारनामो को याद रखेगा. और देश के इन सर्वशक्तिमान लोग को भी.

Sunday, July 26, 2009

एक बहुत ही गंभीर प्रशन ?????????????

आज सब कुछ एसे घटित हो रहा है जैसे संजय धृतराष्ट्र को सब कुछ सच सच बता रहा है और धृतराष्ट्र बस संजय आगे चलो के आलावा कुछ भी नही बोल रहा है। आज हम कुछ कुछ धृतराष्ट्र के समान ही व्यवहार कर रहे है। हिंदू राष्ट्र के बारे में कल्पना तो बहुत ही दूर की बात है अब तो अपनी असिमिता बचानी ही भारी हो गई है।

आज समय आगया कुछ कडियो को जोड़ कर देखने का ताकि कुछ तो हिंदुस्तान के लोग अपनी झुकी आंखे ऊपर उठा कर द्रौपदी चीरहरण को रोकने का साहस करे। एक सज्जन थे जसवंत सिंह जी जिन्होंने राव सरकार में एक भेदिया होने की बात कही थी और परमाणु परिक्षण इसी के सूचना लीक करने पर बाद में रोक दिए गए। दूसरा हवाला डोभाल साहब की किताब से मिलता है। इन घटनाओ के बाद भारत में आकास्मक सप्रंग की सरकार बन गई। फ़िर सारे जनमत के खिलाफ होने के बावजूद अमरीका से परमाणु करार होगया। और लाखो किसानो की आत्महत्या, शेयर बाजार की औंधे मुह गिरे होने, लाखो बेरोजगारों , लाखो नौकरियो के छुटने, महंगाई के आसमान छूने और पिछली सरकार के घोर नैतिक पतन होने, आम जनता के एक व्यापक दिखने वाले विरोध के बावजूद कांग्रेस पहेले से भी अधिक बहुमत से सरकार बनने में कामयाब हो गई। उस बीच मीडिया ने चुनाव में सभी म्हेत्व्पूर्ण घटनाओं और चर्चाओं पर से ध्यान हटाकर वरुण गाँधी पर ही फोकस कर दिया इसमे एक नही सभी चैनल थे। कांग्रेस ने इस से पहेले विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद चुनाव आयोग में चावला साह्भ को फिट किया। और भी बहुत से समवैधानिक पदों पर कांग्रेस ने जनमत विरोधी और परम्परा विरोधी कृत्य किए। प्रधानमंत्री के एक राज्यसभा उमीदवार को लोकसभा में चुनाव में न उतारकर एक गैर लोकसभाई व्यक्ति को नहेरु के बराबर इतिहास में दूसरी बार प्रधानमंत्री बनवा दिया। सबसे बड़ा और घनघोर आश्चर्य मुझे उस समय के कांग्रेसी लोगो पर था जो चुनाव में कांग्रेस की वापसी की बात कुछ एसे कहे रहे थे जैसे की सूरज पूर्व से निकलता है तो अगली सरकार कांग्रेस की ही बनेगी। और भी बड़ा अचरज नम्बर दो स्थान रखने वाले सरकार में मंत्री प्रणव मुखर्जी का बिहार में लालू को अगली सरकार में न रखने का खुले आम निर्णय सुनना एक बहुत ही बड़े गुप्त रहस्ये को खोलता है। मीडिया का बाद में बीजेपी का बैंड बजाना भी इसी साजिश का एक हिस्सा है। कुरैशी जो की चुनाव आयोग के मेंबर है अकेले ही लन्दन में बैठे बैठे ही भारत में आम चुनावो की तारीखों की घोषणा कर देते है। और अब तो इलेक्ट्रोनिक मशीन का चुनाव में किसी एक विशेष दल को जिताने का आरोप इन सभी कडियो को आपस में जोड़ कर एक बड़ी तस्वीर बनाता नजर आता है।

अब आते है आज के हिंदुस्तान की बदलती तस्वीर पर पहेली बात बिना किसी बात के भारत पर बलूचिस्तान शरारत का आरोप पाकिस्तान के साँझा बयान पर स्थापित कर दिया गया है। हिंदुस्तान को जी ८ में मुह की खानी पड़ी। हिंदुस्तान को इसी पाकिस्तान से मुंबई के अपराधियों को सजा दिलाये बिना बात शुरू कर दी है।

मित्रो पश्चिमी देश हिंदुस्तान मैं २०० साल शासन कर के और ८०० साल की गुलामी से त्रस्त हिन्दुओ को नही झुका पाए। नही जान पाए की यह हिंदुस्तान इतना गरीब असहाए होते हुए भी अपने पर अभिमान क्यो करता है। कहेते है यूनान मिश्र रोमन सब मिट गए जहाँ से परन्तु हस्ती हिन्दुओ की नही मिटती जहां से। क्योंकि हिन्दुओ में नैतिकता थी और उसी नैतिकता की थाती पर वो अभीमान करता था। उसकी बहु बेटी नाचती जरुर थी पुरातन काल से क्योंकि संगीत और नृत्य हिन्दुओ की शोभा थी परन्तु उसे आईटम गर्ल बना कर उसने नही नचाया था। आज हिन्दुओ की नैतिकता उनसे छिनी जा रही है। कभी सेम्लिंगिकता के नाम पर तो कभी स्टार प्लस के सच के नाम पर। अरे हिंदुस्तान में जो बातें कभी घर से बहार नही आई वो आज सरे आम टीवी पर दिखाई और बोली जा रही है। और कैसे कैसे कुतर्क दिए जा रहे है ओ चार पैसे के राजीव खंडेलवाल (इस शो का एंकर) क्या बताना चाहता है हमे तू स्टार प्लस के चार पैसे में बीके हुए भाड़े के हमे बाताना चाहता है क्या तू की सच बोलना और बुलवाना तुझे आता है। इतना ही सच का पुजारी है तो क्यों नही अपनी जनम की पुरी कहानी हिंदुस्तान को बता देता एक एक क्षण के साथ। फिर देखते है की सच कैसे सामने आता है। आज हिंदुस्तान में जो रिश्तो की गरिमा थी उसको तार तार किया जा रहा है और हम सब टीवी पर पालतू पिल्लै की तरह देख रहे है। आज शब्दों से आपकी इज्जत उतारी जा रही है कल हाथो से उतारी जायेगी। धीरे धीरे तुम्हे नंगा किया जा रहा है। नही याद तो करो याद जब इसी स्टार प्लस पर बे वॉच दिखाया गया था तो कितना बवाल हुआ था परन्तु अब तो बे वॉच एक आम बात हो गई अब तो बे वॉच छोड़ो अपनी हिन्दी फिल्मो में गे वॉच कर लो। कुछ कुतर्की जिन्हें गोबर में भी विटामिन ढूंडने में महारथ है वो कहे भी सकते की देखो आप विरोध कर रहे थे अब तो सब नोर्मल है। भाई नोर्मल तो है परन्तु नंगा होने में एक दम से अंतर्वस्त्र नही गिरता पहेले पगड़ी गिरती है जो की गिर चुकी फ़िर कमीज़ उतरती है वो भी उतर गई अब पैंट उतर रही है अभी नही संभले तो फ़िर इसी का नंबर है। और बिगाड़ने का क्या है बिगडेगा तो नंगा होने भी कुछ नही बस बात तो समझने की है। की इन्सान ही बना रहेना चाहते हो या जानवर। कुत्ते बिल्ली भी नंगे ही घूमते है परन्तु हम नही। इस क्यों को जानने और समझने वाला इन्सान ही है और उसी नंगाई को गले लगना चाहते हो तो कुत्तो को आप पर फक्र होगा परन्तु इंसानों को नही। अब हर कुतर्क का उत्तर तो मेरे भी पास नही।

हाँ जहा तक मेरी बात है मुझे कोई भी ओब्जेक्शन नही है परन्तु इसको एक रणनीति के तहेत हिंदुस्तान को अनैतिक बनने की चतुराई पर क्रोध है। क्योंकि राम, रामायण, मन्दिर, वेद, देश छीन ही लिया ले देकर परिवार नामक इकाई थी जिसको १००० वर्षो से गुलामी में भी नही गवई परन्तु ये टीवी के भेडिये उसी पर नजर टिकाये है। हाँ इस बार आक्रमण अपनों से ही है। आजकल टीवी में छोटे शहरों के लड़के लड़किया है। इस बार इस वार से बचना मुश्किल है क्योंकि वार कमर के निचे है। यह कम पढ़े लिखे पैसे और नाम के लालच में बिल्कुल भदेस भाषा में टीवी पर बैठ कर नंगाई पर भाषण झाड़ रहे है। और हमे बता रहे है प्रगतिशीलता क्या है ओ दस दस पैसे में अपनी बेचने वालो याद रखो तुम्हारा इस्तेमाल हो रहा है। तुम्हे नही पता की लोहे की कुल्हाडी में लगा लकड़ी का दस्ता न होता तो लकड़ी के कटने का रास्ता न होता।

और याद रखो नही सुधरे तो फ़िर डंडे के आगे नंगे और भूत दोनों ही भागते है। संभल जाओ नही तो इस बार देश माफ़ नही करने वाला।

अंत में मित्रो ऊपर की दोनों लाल और नीली घटनाओं को जोडो तो पता चले गा की एक में नीति बन रही है और दूसरी में परिणाम है। अब देखना यह है कीयह नीति हिन्दुओ और उसके देश को कितना अनैतिक बनाएगी. इस अनैतिकता का दाम क्या है? और लाभ क्या है? परन्तु जितना सरल लगता है और उतना है नही क्योंकि यह पुरी एक नसल को ही ख़तम कर देगी।

और फ़िर कहेते रहेना की किसी एक समय में एक हिन्दू होता था. जैसे की तिब्बती अपने बच्चो को कहेते है की किसी एक समय उनका एक देश तिब्बत होता था. आज बता दू हिन्दू की नैतिकता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है जो उसे आज तक जिन्दा रखे है. और अब निशाना उसीको बनाया जा रहा है. देखना यह है की हिन्दू फिर से एक घनघोर संकट से कैसे बहार निकलता है. मित्रो याद रखना हम कर्म के लिए धर्म का धागा नहीं छोड़ते. और धर्म नैतिकता है.

Thursday, July 9, 2009

क्यों अजमेर पर ही चादर जाती है? शिव पर किसी का गंगा जल क्यों नही?

मैं आज बात करना चाहता हूँ उस ढोंग की जिसको हमारा कोरपोरेट वर्ल्ड का हिंदू तबका भी करता है। क्योंकि सबसे ज्यादा गाफिल यह ही तबका है। सन्दर्भ और भी महत्वपूर्ण तब बन जाता है जब आम हिंदू इन को अपना नायक बनाना चाहता हो। और सही भी है, भाई आर्थिक प्रगति का युग है यदि हिंदू, धीरू भाई अम्बानी और श्री लक्ष्मी मित्तल को अपना आदर्श बना भी लेते है तो ग़लत क्या है? यह लोग तो अब प्रतिक बन ही गए है। परन्तु गहरई से विश्लेषण करने से पता चलता है की मुद्दा आर्थिक रूप से संपन्न और तथाकथित एलिट क्लास के सबसे ज्यादा भ्रम से जुडा है। और आज मैं उनको ही बतलाना चाहता हूँ की क्यों भारत असली में सेकुलर नही है और जिसको तथाकथित सेक्लुरिसम कहा जाता है वो खाली मुसलमानों की चिरौरी और ढोंग मात्र है। अब निर्णय आपका है की इन को आप अमेरिका के नेताओ की तरह सेकुलर माने और चीन के नेताओ की तरह अपने देश के बारे में स्पष्ट राय वाले। या नहीं। क्योंकि सुपर पवार भी तो बनना है।

  • सबसे पहले मुझे कोई यह बात बताये की यह मानसून के लिए सोनिया जी और बड़े धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नेता अजमेर शरीफ पर ही क्यों चादर चढाते ? क्यों नही शिवजी पर गंगा जल या हर की पौडी पर आरती करा देते। क्यों एसा नही होता की भारत के कबिनेट मंत्री सावन के महीने में अपने हाथो से शंकर जी पर जल चढ़वाने के लिए जल देते और फोटो खिंचवाते जैसे की जियारत पर जाने वालो को प्रधानमंत्री जी, सोनिया जी और बाकि ओदेदार देते है और पूरी बत्तीसी का फोटो खिंचवाते है? मुझे एक बात और समझ नहीं आती की दो फर्लांग की ये चादरे भेजते फिर रहे है क्यों यह एक हाथ छोटी चुनरी माँ वैष्णव देवी पर चढाने को किसी को नहीं भेजते?

  • भाई तुम लोग और मीडिया मुशरफ या और किसी मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष के आने से उसके ताजमहल जाने और अजमेर जाने के लिए बड़ी हायतौबा मचाते हो। कभी ढाका जाओ तो ढाकेश्वरी देवी के दर्शन भी करलिया करो, पाकिस्तान जाते हिंगलाज देवी के भी दर्शन करलिया करो। या केवल वो बीजेपी वालो का ही काम है। तुम क्यूँ यह भगवानो को भी सुविधा के हिसाब से बाँट लेते हो

  • क्यों भारत देश और उसके राज्ये मंत्री छुप छुप कर पूजा करते है? क्यों सामूहिक रूप से पूजा में शामिल नही होते?

  • क्यों पूजा अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए ही करते है? परन्तु राष्ट्र की बात आती है तो तुंरत सेकुलर हो जाते है? क्या इसका मतलब मैं यह न निकालू की जब अपने स्वार्थ की बात आती है तो सही, और सच्चा भगवन का रास्ता परन्तु जब राष्ट्र की बात आती है तो झूटी धरमनिर्पेक्षता। यह झूटी नौटंकी क्यूँ? यह दोहरा चरित्र क्यों? यह दोरंगा व्यहवार क्यों? जब अपनी बेटी और बेटे की शादी करनी हो तो गौत्र और जन्मपत्री क्यों? परन्तु राष्ट्र की जन्मपत्री की बात करू तो खिल्ली क्यों उडाई जाती है? जब इन नेताओं को अपने घर में सेम्लेंगिक पसंद नही तो देश में पसंद क्यो? जब व्यक्तिगत त्याग नही कर सकते तो सामूहिक त्याग की अपेक्षा क्यों?

  • जब सोनिया जी दशहरे में राम लीला मैदान में रावन पर तीर छोड़ती है और प्रधानमंत्री रामनवमी पर बधाई देता है तब फ़िर राम मन्दिर और राम सेतु पर राम को क्यों नाकारा जाता है यह आधा अधुरा राम क्यों? क्यों वो लालकिले के रामलीला मैदान में जोश से भरे राम भक्त और रामलीला कमिटी की विचित्र राम भक्त इन से प्रशन का उत्तर नही मांगते? क्यों वो पत्रकार प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के रामनवमी की बधाई संदेश लिखते सोचते नही की किस राम के जनम की बधाई छाप रहे हो जिस राम को न वो मानते और न उनकी सरकार उसके अस्तित्व को स्वीकारती।

  • होली पर किस जनता को रंग लगाते हो? प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति क्यों विकलांगो और बच्चो के साथ होली मनाते है? क्यों उनपर होली के दिन रंग लगा कर बधाई देते है? जब इतिहास परुष राम को नही मानते तो वैदिक देवता विष्णु को कैसे मान सकते हो? तब किस प्रहेलाद की जीने और होलिका के मरने की खुशी में होलिका दहन करते हो?

  • दीवाली पर यदि हम लक्ष्मी पूजन करते है तो बता दू यह एक तांत्रिक अनुष्ठान है जो दुनिया के सभी हिंदू करते है। कोर्पोरेट वर्ल्ड के वो धुरंधर भी करते है जो सेंसेक्स के जगमग सितारे है। क्योंकि अमावस की रात वो एक बहुत ही शुभ समय होता है लक्ष्मी पूजन का तो फ़िर बाकि हिंदू विधि और अनुष्ठान को हिकारत भरी नजर से क्यों देखा जाता है?

  • देश की गौरावशाली सेना के सैनिक क्यों दुश्मन से लड़ते हर हर महादेव, जये बजरंगबली और भारत माता का नारा लगा कर उसके हलक में से प्राण खींचते है? क्यों नही सरकार उन्हें कोई अल्फा वन या राजीव गाँधी और मोहन दस करम चंद गाँधी का नारा लगवा लेती . राष्ट्रपिता तो बहुत बड़ी चीज होता है तो क्यों सरकार सैनिको और पुलिस के लिए एक सर्कुलर निकलवा देती (जो की अब तो २०७ सीटे आगई हैं और भी आसान है) की कल से सभी सैनिक किसी भी युद्घ से पहले हुंकार भरते हुए जवाहर लाल नेहरु, राजीव गाँधी या महात्मा गाँधी की जय बोलेंगे। नहीं करोगे तुम क्योंकि तुम्हे अपनी जान प्यारी है और देश को बेवकूफ बनाने के लिए १०० करोड़ हिन्दू है ही । जब तक यह हैं तुम अपनी दोरंगी अफलातूनी जोकरी करते रहोगे।

मुझे समझ नहीं आता हिन्दू लोग इन नेताओ से कुछ कहेते क्यों नहीं? क्या उन्होंने वास्तव में दब्बू और बेवकूफ बनने का निश्चय कर लिया या फिर इस हिन्दुस्थान के अन्दर ही कोई और दुनिया ढूंड ली है।

  • जो सरकार कुम्भ के मेले पर करोड़ खर्च करने का बजट बनाने का स्वांग करती है। जो हिन्दुस्थान की मीडिया और एडवरटाईसमंट कंपनिया कुम्भ के मेले से करोडो कमाती है। जो सोनिया गाँधी और नेता अपने मोक्ष के लिए गंगा में अपने पाप धोकर आते है। वो इसके पीछे की वैदिकता को क्यों नहीं स्वीकार करते। जब गंगा में नहाने से मोक्ष होता है तो फिर जिसकी जटाओ से गंगा निकली है वो शिव भी होता है। और शिव है तो उसकी काशी भी होती है। तो फिर उस पर मंदिर क्यों नहीं होता?

  • मित्रो, गला फट गया हज, अमरनाथ, सब्सिडी, मदरसों की दोरंगी नीति के खिलाफ बोलते परन्तु इन नेताओ से कोई पूछे जिस अमेरिका की तुम बीन बजाते रहते हो उसकी सारी नीतिया क्यों नहीं मानते? जो प्रोफेशनल और कंपनी डारेक्टर भारत सरकार पर हर अमेरिकी नीति का अनुसरण करने का दबाव बनाते है वो इस सरकार को संसद सत्र अमेरिका स्टाइल में वैदिक मंत्रो से क्यों नहीं करने को कहते? अमेरिका तो पराये हिन्दू धर्मं को अपनाने के लिए उत्सुक हैं और हम अपने धरम को अपनाने की नक़ल भी नहीं कर पर रहे।

  • ओ कोर्पोरेट के धन्ना सेठो, तिरुपति पर करोडो चढाने वालो, वैष्णो देवी पर लंगर करवाने वालो, सावन में शिव भक्तो को भंडारे करवाने वालो, अपने कार्यालय में गणेश जी की मूर्ति रखने वालो। जब तुम सब कुछ मानते हो तो उसको राष्टीय स्तर पर, सामूहिकता में क्यों नहीं स्वीकारते? क्यों इस प्रकार का स्वांग करते हो? क्यों नहीं ऑफिस में राम राम कह सकते? क्यों देश के सेकुलर नेता अपनी सीट बचाने के लिए देवी देवताओ के चक्कर लगाते है और जीतने के बाद उसी राम को नकारते है जिसके की चरणों में अभी अभी लोटे लोटे फिर रहे थे । यह किस प्रकार की भीरुता और ढकोसला है। जब तुम सभी व्यक्तिगत तौर पर भगवान् को मानते हो। जिसके की तुम्हारे हाथो पर बंधी वो डोरी चुगली करती है। अपने ऊपर आते हर दुख से बचने के लिए भगवान् के हर जगह माथा टेकते हो। तो फिर २६ जनवरी के या १५ अगस्त के दिन लाल किले से जय श्री राम और हर हर महादेव का नारा क्यों नहीं? एसा क्या डर है जिसकी हमे जानकारी नहीं जो तुम्हे अपने हिन्दू संस्कार को सामूहिक रूप से प्रर्दशित करने से रोकता है? वो कौन सी शक्ति है जो तुम्हे झूठा जीवन जीने के लिए प्ररित करती है?

  • ए़सी क्या बात है की जिस लालू यादव को सपने में भगवान् शंकर आते तो है और बताया भी जाता है परन्तु जब काशी में मंदिर की बात आती है तो हलक में सहारा मरुस्थल का सुखा पड़ जाता है। वो मुलायम जो अखाडे में बजरंगबली की शपथ खाता हैं राम मंदिर के नाम पर दस्तावर हो जाता है।

  • मित्रो वो कौन सी शक्ति है जो १०० करोड़ वोट की परवाह न करने से रोकती है? परन्तु १० करोड़ के लिए शीर्ष शासन। ए़सी कौनसी शक्ति है जो आई आई टी और कैट की परीक्षा देते तो हर भगवान् के चक्कर लगा लेंगे परन्तु मंदिर की बात आते ही राम सेवको को हिकारत की निगहाओ से देखेंगे। एसा क्यां हैं उन अभिनेताओ और अभिनेत्रियों में जो शुक्रवार को पिक्चर रिलीस होने से पहले सिद्दि विनायक की चोखट पर जाएँगी और इन वैदिक अरध्यो के समाज में समानजनक स्थिति को तुंरत राजनीती कह कर पल्ला झाड़ लेंगे। जब फैक्ट्री या कंपनी की नीव के वक्त पूजा हो सकती तो राष्ट्र के लिए पूजा क्यों नहीं?

  • बड़ा प्रशन इस दोहरे चरित्र को जीने के पीछे कारण जानने का है। की वो कौनसे कारण हैं जो सच को सच बोलने से रोकता है। भगवान् को भगवान् कहने से रोकता है। १०० करोड़ हिन्दुओ के देश में अपने अरध्यो के नाम से संसद, लालकिले या इंडिया गेट पर एक ध्वनि में सामूहिक रूप से श्रद्धा और भक्ति से "जय श्री राम" और "हर हर महादेव" को कहने से रोकता है। जब सरहद पर सैनिक हर हर महादेव और जय श्री राम के नारे लगा सकते है तो मैं गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर क्यों नहीं? कौन मुझे अपनी सच्ची भक्ति राष्ट्र के लिए करने से रोकता है? जब मैं अपनी भलाई के लिए अपने परिवार के साथ अपने ग्रहप्रवेश हवन या यज्ञ से कर सकता हूँ अपना और अपने बच्चो का जन्मदिन सुबह मंदिर जा कर या घर हवन कर कर मनाता हूँ (इन सभी सेकुलर नेताओ की तरेह) तो इन ही नेताओ के साथ देश का जन्मदिन क्यों नहीं मना सकता? इन की "न" के स्वांग के पीछे क्या कारण है?


और जब मैं यह नहीं कर सकता तो फिर मैं इस देश को अपना समझने का स्वांग ही करूँगा। जैसा की सभी कर रहे है। और शायद इसीलिए इस देश में लोग देश की अस्मिता की कीमत पर देश को ही दाव पर लगाने से नहीं हिचकते। जब लोग अपनी आत्मा को अलग कर के देश से प्यार का स्वांग करेंगे तो देश का यह ही हाल होगा जो पिछले 60 वर्षो से होता आ रहा है। और सरकार जबरदस्ती झूठा देशभक्ति का पाठ पढ़ा रही है। यदि यह न होता तो सरकार अभी तक परम पूजनीय प्रात: स्मरणय , महान देश भक्त वीर सावरकर के नाम पर एक छोटे से पुल के नामकरण पर करोड़ हिन्दुओ को अपमानित न करती। मुझे नहीं पता फिर कैसे देश के लोगो में देशप्रेम की हूक उठेगी। अब तो स्वांग बंद करो।

गृहमंत्री जी मैं भी बहुत शर्मिंदा हूँ !!!!!!!!!!!!!!!!!!

आज कल लगता है शर्मिंदा होने का मौसम चल पड़ा पहले अपने आदरनिये प्रधान मंत्री जी १९८४ के सिख नरसंहार पर शर्मिंदा हुए। फ़िर सोनिया जी बाबरी ढांचे के विध्वंस पर शर्मिंदा हुई, फ़िर राहुल बाबा कलावती की हालत पर शर्मिंदा हुए और अपने पिता से १० कदम आगे जाकर १५ पैसे ही गरीब की झोली में जाने की बात कह पुराना टोटका अजमाया। आंध्र में कांग्रेस के एमपी बैंक मेनेजर को थप्पड़ मारकर शर्मिंदा हुआ। और अभी हाल में ही अपने आदरनिये ग्रहमंत्री श्री चिदंबरम जी कंधमाल की घटनाओ पर शर्मिंदा हुए। मैंने सोचा जब सभी शर्मिंदा हो रहे है मैं भी कुछ शर्मिंदा हो जाओ कुछ क्योंकि यह वो बाते हैं जिन पर मैं ही शर्मिंदा हो सकता हूँ। यह लोग शर्मिंदा नही होंगे। परन्तु चाहए जो हो इनकी सेलेक्टिविटी पर तो फ़िदा हुआ ही जा सकता है।

  • जी, ग्रहमंत्री जी मैं शर्मिंदा हूँ इन १० लाख कश्मीरी ब्राह्मणों पर जो दिल्ली के टेंटों में मानसून का इंतजार कर रहे है।
  • मैं शर्मिंदा हूँ एक बुढे सन्यासी स्वामी लक्ष्मानन्द सरस्वती जी की बर्बर और क्रूर हत्या पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन ६० हिंदू कारसेवको के माँ, बेहें, बेटी और उनके बच्चो के सामने जिनको यह बतला दिया गया की तुम्हारे माँ बाप अपने आप ट्रेन बंद कर कर आग लगा कर मर गए। मैं शर्मिंदा हूँ की ६ साल से एक महान सेकुलर सरकार ने उन कातिलो को अभी तक नही पकड़ा।
  • मैं शर्मिंदा हूँ भागलपुर, मलियाने, मेरठ, मुंबई, और देश भर के तमाम दंगा पीड़ित लोगो के सामने की कंधमाल जैसी किस्मत नही की आप से भी कोई माफ़ी मांगे।
  • मैं शर्मिंदा हूँ मीडिया की उस साजिश से जिसमे गैर कांग्रेसी राज मैं हुई हर बात को पतंगड़ बनाया जाए।
  • मैं बहुत शर्मिंदा हूँ श्री लंका के २०,००० तमिल हिन्दुओ की क्रूर हत्या।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कांग्रेस जनित भोपाल गैस कांड की पीडितो की न सुनवाई होने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कोशी बाद पीडितो को बजट में एक रुपया न देने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ आधे हिन्दुस्थान पर गाँधी परिवार के लेबल चस्पाने से और एक, मात्र, एक पुल का नाम परम श्रध्ये प्रात: स्मरणये पूजनिये वीर सावरकर जी के नाम पर न रख पाने के लिए। हिन्दुस्थान तो छोड़ ही दो दूर फ्रांस देश के अनुरोध पर की हमारे यहाँ सावरकर जी की मूर्ति लगे, भारत सरकार अनुमति दे और उसके अनुमति न देने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ सावरकर जी की तपोस्थली अंदमान में उनके नाम की पट्टिका हटाने के छुटभैया टाइप नेता मणिशंकर आययर के आदेश से।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन लाखो माताओ और बहेनो से जो अपने बेटे और भाई इस्लामिक आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके है।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन लाखो लोगो से जो अपने रिश्तेदार पिछले कांग्रेस राज में उसके इस्लामिक आतंकवाद की प्रेमनीति के ऊपर कुर्बान कर चुके।
  • मैं शर्मिंदा हूँ मोहन लाल शर्मा के बीवी और बच्चो के सामने जिनको अपने बाप की शहादत को धर्मनिरपेक्षता की वोटो की तरजू पर झूलते देखा।
  • मैं शर्मिंदा हूँ गुजरात के ५ करोड़ लोगो के सामने जिनको गुजोका कानून नहीं दे पाए उनकी दुष्टों से और आतंकवादियो से रक्षा के लिए।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन हिन्दू और देशभक्त असमी भाई और बहेनो से जो न चाहकर भी अपनी असिमिता इस्लामिक गुंडों से नहीं बचा पा रहे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद कांग्रेसी सरकार वोटो के लिए बंगलादेशी मुसलमानों को नहीं निकलने दे रही।
  • मैं शर्मिंदा हूँ उन देशभक्त सैनिको के माता पिता और बच्चो के सामने जिन्होंने अफजल गुरु को फँसी न देने पर कांग्रेस सरकार के मुहं पर पुरस्कार और मैडल फैंक मारे।
  • मैं शर्मिंदा हूँ मुंबई में मरने वाली आम जनता के रिश्तेदारों के सामने जो कसाब को रोज हंसते हुए देखते है।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कांग्रेस राज के आपातकाल से जिस में आज भी उन लाखो लोगो का जिनके बारे मैं आज भी पता नहीं।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कांग्रेस की बेशर्म महाराष्ट्र सरकार की नपुंसक व्यवहार से जिस में एक ही देश के दुसरे राज्ये से आये बिहारी बच्चो के पीटने पर वोटो की गिनती करती है।
  • मैं शर्मिंदा हूँ अम्बिका सोनी के परमोशन पर जिस राम के नाम को नकारने पर कबिनेट में उच्च स्थान दिया हो।
  • मैं शर्मिंदा हूँ पाकिस्तान में मुसलमानों द्वारा हिन्दुओ और सिखों के जजीय लेने की भारत सरकार की कार्यवाही न करने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ देश मैं १५ साल से दिल्ली में कांग्रेसी सरकार की नाक के नीच २०,००० बच्चो के लापता होने पर।
  • मैं शर्मिंदा हूँ कांग्रेस की घोर सत्ता प्राप्ति की निर्ल्लज और भोंडी उत्कंठा और झारखण्ड के आदिवासियो को राजभवन द्वारा एक प्रकार से लोकतंत्र में बंधक बनाने पर।

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देखा कांग्रेस राज अभी कुछ लोग फिर से हिंदू होने पर शर्मिंदा हो रहे है परन्तु एक ही साँस में देशवासी मर्द और औरत का बीच में न होने पर (लोंडा) शर्मिंदा नहीं है। यह कैसी माया वाकई ये तो दो और दो पांच बनाते हैं।

परन्तु आज तो मुझे न्यायालय के आदेश पर भी शर्मिंदा होना पड़ रहा है जिसने धरती पर एक नए युग का सूत्रपात किया है जिसे स्वयम ब्रह्मा भी बनाना भूल गया था।

परन्तु मेरे शर्मिंदा होने से क्या होगा। जब तक देश एक विदेशी के शासन और उसकी चाहतो को फलीभूत होते देख रहा है।

Wednesday, July 8, 2009

चीन का नरेंद्र मोदी कौन ???????????????????????

पता नही क्यों अभी तक लोग इस उत्तर से रूबरू नही हुए की चीन में निरही, बेचारे, मासूम और निर्दोष मुसलमान का नरसंहार कर किसने दिया ? चीनी मीडिया के हिसाब से 156 लोग मारे गये। ये 156 लोग वो हैं जिसे चीन का मीडिया बताना चाहता है। अब जब चीन अपने ही मुह से इतने कह रहा है तो असली में कितने होंगे समझने के लिए ज़्यादा सर नही खपाना पड़ेगा।
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अब प्रश्न यह उठता है की भारत का आधुनिक, लोकतंत्र पसंद मानवाधिकारो का एकमेव रक्षक भारतीय मीडीया अपने अंतराष्ट्रिए संगरक्षको के साथ अभी तक अपनी चिरप्रचित शैली में एक दूसरा नरेंद्र मोदी चीन में क्यो अभी तक नही खोज पाया? सवाल यह नही की चीन अपनी रक्षा करता है की नही परंतु घोर आश्चर्या का विषय मेरे लिए मीडिया का अपनी चिरप्रचित शैली में फोकस करना अभी तक क्यों नही है।
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चीन अब भारत तो है नही जो अपने लोगो की रक्षा ना कर पाए और एसा भी नही की लोकतंत्र के धंधे के सोल डिसट्रिब्युटर से डरता हो। और न ही अभी तक उसने फ्रेंचाईसी ली है की जो किसी की धौंस में आए। मुद्दे की बात यह भी नही की हमारे अपने वामपंथी दोस्त भी चीन की इस देशभक्ति पर अपने होठ को सिले क्यों हुए है। क्यों नहीं अभी तक कोई टिपण्णी की है।
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अब दूसरा पहेलु इस बात का है की चीन ने गलत क्या किया है? चीन ने कुछ भी गलत नहीं किया है। उसके सामने प्रशन यह है की पहेले देश के ९०% हान लोगो की रक्षा करे या उन लोगो की जो चीन से अलगाव रखते हुए दुसरे देश की मांग रख रहे है। चीन इस प्रशन से घबरह भी नहीं रहा है। उसने तुंरत दोनों स्तर पर उत्तर देदिया जहाँ एक तरफ उसने अपने सैन्ये बलों को पूरी छुट दे दी वहीं दूसरी और उसके अपने हान समुदाय के लोग पिल पड़े इन अलगाववादियो पर।
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तो बात अब मुस्लिमो की तो फिर से ये राजनीती के शिकार ही होंगे। पहेले अमरीका ने रूस के खिलाफ इन मुसलमानों का इस्तेमाल किया। फिर इन्ही को दुनिया भर में बदनाम किया तब चीन चुप्पी लेकर बैठा रहा था। अब अमेरिका ने पाला बदल कर अस्सलावालेकुम (ओबामा से) करके फिर वहीँ पहुँच गया। अब सुरक्षित जगह से चीन पर मानवाधिकारो के नाम पर वार करेगा। चलो जो हो सो हो।
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भारत के सन्दर्भ में यह बात इसलिए बता रहा हूँ की न चीन गलत हैं न अमेरिका और ना ही इस्लामिक शक्तिया। इस में दोस्तों, हम भारत वाले ही गलत है। वो कैसे ? देखो अमेरिका को दुनिया की थानेदारी करनी है और वो जब सर्वशक्तिमान है और अपनी अर्थव्यवस्था चलानी है तो इसमें बिलकुल भी गलत नहीं है। दुनिया के बाजार पर अपने देशवासियो का पेट पालना है । दूसरी और चीन है, उसे समग्र चीन एक रखना है तो अलगाव बिलकुल ही गलत है उसके लिए। तो वो भी अपने देश और उसके वासियो की रक्षा कर रहा है। और हान समुदय को पूरी छुट दे रखी है जो की बिलकुल भी गलत नहीं। तीसरी तरफ इस्लामिक शक्तिया है जो निश्चित रूप से अपना विस्तार करती रहेती है। उसको अरब, अफ्रीका के बाद दक्षिण पूर्वी एशिया में बिना एक पैसा खर्च करे बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देश मिल गए। यूरोप और अमेरिका में इसलाम अपनाने की होड़ मची ही हुई है। आप देखलो अभी माइकल जैकसन को वो भी मुस्लमान बनगया था। उसके विशाल फैन उसकी नक़ल तो निश्चित रूप से करेंगे है। एक स्पेन की असफलता पिछले १५०० वर्षो में लगी एक मात्र विफलता है। अब बारी चीन पर इस्लामिक शक्तियों की है।
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तो रूस को मिटटी में मिलाने के बाद और अमेरिका में अपना अस्सलावालेकुम बोलने वाला राष्ट्रपति बैठने के बाद स्वाभाविक ही जीत के जोश में उसने चीन पर भी अटैक कर दिया।अटैक कर दिया से मेरा तात्पर्य पिछले हफ्ते हुए हान और मुस्लिम समुदाय के बीच दंगो से है। अब दुनिया में दो बराबर की शक्तियों में टक्कर है।
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मुझे हिन्दू होने के नाते ना तो कोई ख़ुशी है और ना ही कोई रूचि। क्योंकि हम हिन्दू तो एक गहरी चीरनिंद्रा में सोये हुए हैं। और पूरी तरहे से इस्लामिक शक्ति के हाथो पराजित है। इसलिए सवाल ही पैदा नहीं होता की हम कोई रोल निभाए।
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अब सोचो की जिस प्रकार से अपने हान समुदाय के लोगो को हाथ में डंडे, चाकू, रोड लेते मुस्लिमो पर अटैक करते देखा है यदि कहीं हिंदुस्तान में कोई हिन्दू कर देता स्वयं को बचाने के उदेश्य से तो उसका मीडिया खाल में अभी तक भुस भर चुकी होती। और वो हिटलर की लाइन में खडा हुआ अपनी जान सांसत में पा कहीं पर अपने दिन गिन रहा होता। परन्तु मानवाधिकारों और सेमेंगिकता की डीलरशिप लिए हुए वामपंथी अभी कोई मुद्रा अख्तियार ही नहीं कर रहे।
मैं आज लोगो से पूछता हूँ की क्या चीन इन मुस्लिम आक्रंताओ को देश तोड़ने दे या अपने देश को चीन एकजुट रखे? दूसरा क्या देश में रहेते ९०% हान समुदाय की रक्षा करे या मुस्लिम गुंडों के समक्ष आत्मसर्पण कर दे?
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हर देशवासी का कर्तव्य है की देश को हर हाल में एकजुट रखे और देश की विघटनकारी ताकतों को परास्त करे।उस में गलत क्या है। हमारी तरह नही की बिना कुछ भी जाने कश्मीर में से सेना की वापसी शुरू कर दे। दूसरा लोकतंत्र या सरकार इसी शर्त पर चलती है की वहां पर सर्वप्रथम देश के बहुसंख्यक का विश्वाश जीता जाये और उनकी रक्षा की जाये। यह लोकतंत्र का मूलभूत सिदान्त है। तभी सरकार का इकबाल अक्षुण रह सकता है। देश की भौगोलिक लकीरे समुदाय और धरम के नाम पर ही खींची गई थी और किसी हिन्दू ने नहीं खींची थी। दुनिया के दो सबसे बड़े पंथो इसलाम और इसईओ ने ही खींची थी। हिन्दुओ को तो जो टुकडो के रूप में देदिया उसे ही अपना देश समझ कर जिंदगी बसर कर रहा है। इसमें चाहे बात कश्मीर की हो या तिब्बत या बात हो हिंदुस्तान में पाकिस्तान और बांग्लादेश के भगाए हिन्दू की। इसलिए प्रशन ही नहीं उठता की कोई इनकी बात करे।
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"हिन्दू घटा देश बँटा" नारे में क्या गलत है? चीन ने भी मान लिया की जहाँ हान समुदाय नहीं वहां चीनी शासन नहीं और गलत भी क्या है। अब लोगो को दुःख इसी बात का है की ना तो चीन में कोई वोट बैंक है और ना चीन किसी पाकिस्तान से त्रस्त, ना ही अमरीका की दादागिरी को मानता और ना ही उसके पास नपुंसक और सेम्लेंगिक टाइप नेताओ की जमात। जो करता है डंके की चोट पर करता है जैसे रूस ने चेचेनिया में किया, अमरीका ने इराक में और फ्रांस ने मुस्लिमो की दादागिरी को ख़तम करके वोही वो इन गुंडों से निपटाने के लिए कर रहा है। क्योंक सवाल देश का है और उसमे रहते १४० करोड़ लोगो का। जिनकी प्राण, अस्मिता की रक्षा चीन सरकार के ऊपर है और यह जिम्मेदारी उन मुट्ठी भर गुंडों के तुष्टिकरण से ज्यादा बड़ी है। हमारी तरह चीन सरकार और वहां की लोग नापुंसको की जमात नहीं जो कुछ लोगो की गुंडागर्दी से दब जायेगी और समर्पण कर देगी। वो उनको धरती में गाड कर पार्क भी बनवा दे तो कोई आश्चर्य नहीं जबकि सभी वो तथ्य जानते है की उसने अपने ही हान और चीनी लोगो को थेईमन चौक पर टैंको के नीचे जिन्दा ही कुचल दिया था और सारी दुनिया ने देखा था। इन मानवाधिकारो के थोक विक्रेताओ ने भी। अब देश के १४० करोड़ लोगो की खुशहाली के लिए यह कोई बड़ी कुर्बानी तो नहीं? क्योंकि आप भी तो अपने सम्पूर्ण शारीर को बचाने के लिए सडा अंग काट कर ही तो फेंक देते हो। यह पटर पटर और झूटी बोलने की विकृत आजादी से तो अच्छा ही हैं। इसमें तो कोई नरेंद्र मोदी नहीं ढूंडता। क्षमा करे वो लोग जो नरेंद्र मोदी और चीन सरकार के मेरे इस लेख से तुलना करने का दुहसहस करे। बात है दो प्रकार के विचारो की और बात है देश को बचाने की मानसिकता और बहुसंख्यकों के अधिकार और उनको अनावश्यक रूप से पड़ने वाली मानवाधिकारो की विकृत मानसिकता, दोयम दर्जे की भोंडी मीडिया और ढोंगी वामपंथियो की है। जो आज खामोश है। निर्णय आपका हैं की पटर पटर और खोखली बाते करनी है या कृष्ण की तरह निर्णय। फिर चाहे जो हो। वसुधेव कुटम्बकम परन्तु सत्यमेव ज्येयेत ।

Sunday, July 5, 2009

नेपाल राजा! हिन्दू! भारत और सेम्लेंगिकता!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

अब यह मजाक नहीं तो क्या है की विश्व के १२० करोड़ हिन्दुओ के एक मात्र राजा (सिम्बोलिक ही सही) श्री ज्ञानेंद्र जी को पदच्युत कर लोकतंत्र का झुनझुना नेपाल को भी देदिया गया। किसी ने नहीं पूछा की राजा का कसूर क्या था। बस बता यह दिया गया की वो नेपाली जनता की नहीं सुनता, किसी ने यह बता दिया की वो भारत के लिए खतरा है, किसी ने यह बता दिया की वो और उसका बेटा नेपाली जनता का शोषण करता है। हलाकि इन सभी बातो का सबूत कोई भी नहीं परन्तु आधुनिक युग के नए धंधे 'लोकतंत्र' का डीलर उसे भी बना दिया। हाँ क्यों वो इस नए नशे से मेहेरुम हो। और जैसे की हम भारतवासी "सेम्लेंगिकता" का नशे को आत्मसात करने में पीछे न रह जाये।

उसके लिए हमारी मनीनिये अदालत ने हमे आदेश भी दे दिया की आधुनिकता की इस रेस में पीछे नहीं रहेना और ऊपर से जवाहर लाल नेहेरू का १९४६ का प्रवचन भी उस आदेश में घोल दिया जिस से की जस्टिफिकेशन भी देना न पड़ जाये।

हम कहाँ कुछ बोलते है हिन्दुओ ने तो पिछले ८०० सालो के इतिहास में कभी आज्ञा की अवहेलना की ही नहीं उसने तो तुर्को, मुगलों, अंग्रेजो की आज्ञा का पालन किया है यहाँ तो अपने ही लोग अदालती हुकम बजाने को कह रहे है। हमे कभी खुजरह्हो तो कभी कामशास्त्र के नज़रबट्टू से देखने को कहेते है तो कभी हमे ही हिन्दुस्म की वामपंथी किताबो से हज़म करने का दुसाहस करआते है। परन्तु जिस प्रकार हम ८०० साल से कुछ नहीं बस आज्ञा का पालन करते जा रहे है ।अभी भी उसी मुद्रा में खड़े तमाशा देख रहे है बिना इसके पता करे की अगली आने वाली पीढी दोयम दर्जे की हो सकती है। किसको परवाह है ।

परन्तु यह क्या हुआ सत्ता के ठेकेदारों की चूल्हे हिल गई की चर्च और इसलाम दोनों ने इस अपने खिलाफ साजिश बता दिया। अब सत्ता के दुकानदारो की सांसे हलक से पसीने पसीने होकर निकल रहे है। चलिए देखते है क्या होता है?

परन्तु इतना बताता जाऊँ की जो लोकतंत्र, आधुनिकता और प्रगतिशीलता का गन्धर्व राग छेड़े है की हिन्दुओ के शासन तंत्र की दो अतिमहत्वपूर्ण अवधरनओ की पुस्तक मनुसमृति और कोट्टलिए रचित अर्थशास्त्र में भी इस कुकृत्य पर दंड का प्रावधान है। हम हिन्दू इस अप्रकर्तिक, घृणित, अनेतिक और घोर आपत्तिजनक कुकृत्ये के सदैव खिलाफ है। आज आपने जो आदेश मर्द मर्द और औरत औरत के बीच मान्य किए है। क्या पता की कल इनकी काम इन्द्रिया पेडो के साथ कुछ करना चाहे और परसों को दीवारों और पत्थरों के साथ और अदालत कब तक और कहाँ तक इनका साथ देगी क्योंकि इसका तो कोई अंत ही नहीं। तो क्या दुनिया की सारी चिंताए छोड़ कर बस इन मानसिक विकृत पापियो का किसा ही डीसकस करते रहे।

मित्रो हम बात कर रहे थे नेपाल राजा और भारत की प्रजा की। मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाह रह हूँ की राजा का चरित्र क्या तो और क्या होना चाहिए था। क्योंक उसके दुषचरित्र का तो कोई सबूत है भी नहीं परन्तु लोकतंत्र के ध्वजवाहक श्री बिल क्लींटन और श्री जव्हार लाल नेहेरू को दो बड़े लोकतंत्र चलाने का लाइसेंस किन चरित्रवान लोगो ने दिया। और एक ज्ञानेंद्र को हटाना था इस ने तो पूरी हिन्दू राज संस्था को हमेशा हमेशा के लिए निर्वासित करदिया। फिर मैं कहे दू की मेरी व्यक्ति में रूचि नहीं, मेरा आक्रोश विश्व में एकमात्र हिन्दू सत्ता का हमेशा हमेशा के लिए जबर्दस्तरी हटाने का है और दुर्भाग्य से भारत की कथित लोकतान्त्रिक और सदैव प्रगतिबाधक हीनता से ग्रसित लोकलाज रहित देश की मिटटी से दूर गूड पोंगापंथी मेरे वामपंथी मित्र उस कुत्सित रणनीति के वाहक थे।

हाँ दोष उनका भी है जिन्होंने नेपाल की हिन्दू जनता को भारत के बीच "बहादुर" नामक उपनाम से रोपित किया। आने वाला समय हिन्दुओ को इस बात के लिए हमेशा से रुलाएगा की एक शक्तिशाली कौम को दोयम दर्जे के लोगो ने हिन्दुओ को नख और दंतवहिन करने का जो पाप किया है वो हिन्दुओ के लिए बहुत ही भरी पड़ेगा। इन ही लोगो ने अपनी सेम्लेंगिक टाइप हंसोड़ता के लिया हमारे अपने गुरु गोबिंद सिंह जैसे हिंदुत्व के पुरुधा की संतानों हमारे अपने सिख भईयो और बहेनो को अलग कर करने का भी दुसहास किया है। इन बहादुर दलितों को भी अलग कर कर हम हिन्दुओ को एक घनघोर अंधकार में धकेला जा रहा है और हम हैं की अपनी ही निर्लाजता और नंगई पर भोंडी हंसी हंस रहे है। इसी षड्यंत्र के तहेत तुम्हारी ही बहु, बेहेन, बेटी को टैलेंट शो के नाम पर सरे आम टीवी पर भोंडा नाच नचाया जा रहा है और हम इसे प्रगति के नाम पर हाँ में हाँ मिलाकर सामूहिक निर्लाजता से अधीर होकर देख रहे है।

नेपाल देश को भी इसी प्रकार की अफीम चटाई गई है और उसको भी लोकतंत्रता के नाम पर फुँड़ता का स्वांग भरने के लिया प्ररित किया जा रहा है। मेरे देश के हिन्दुओ को एक कुत्सित साजिश के तहेत नेपाल के हिन्दुओ के समीप ही नहीं जाने दिया गया। मैं नही बात करता बोध और महान हिन्दू ऋषि गुरु पदम्संभव द्वारा तांत्रिक महायान बोध पंथ की भूटानी समाज की स्थापना की। न ही मैं उस फूनान हिन्दू राज्य जो मेकंगंगा के किनारे कम्बोडिया में था। न ही उस शिव भक्त खमेर राजवंश की जिसने विश्व की सबसे बड़ी धरोहर अंगकर वोट मंदिर की स्थापना की। और न ही थाईलैंड के महान राजा तक्षीन के औथ्य राज्ये की। बात तो अपने सबसे समीप नेपाल के गरीब और धरम रक्षक हिन्दुओ की। जिसको की हम जान ही नहीं पाए सही कहूँ तो जानने ही नहीं दिया गया। बस कहा गया और उनकी बेचारो की हंसी बहादुर चोकीदार कहकर उडाई गई बिना यह जाने की इस से भारतीये हिन्दुओ को कितना नुकसान हो सकता है।

अरे हिन्दुओ यह ही वो नेपाल है जिसमे तुम्हारे ऋषि तपस्या करते थे। जहाँ भगवन शंकर अपने अघौड़ रूप में विराजते है। यह शिव की वो भूमि हैं जहाँ पर साक्षात् भगवान् पशुपति नाथ बसे है। और तो और शंकराचार्य जी ने दक्षिण भारत के ही किसी एक पुरुहोइत को यहाँ का पुजारी नियुक्त रहेने की व्यवस्था रखी थी। और आज न वो पुरोहित है और न आम हिन भारतीये हिन्दुओ के अन्दर बुदि, जो नेपाल में विराजे साक्षात् शिव को दर्शन करने को आतुर हो। पशुपति नाथ वो विरली जगह हैं जहाँ पर आदि भगवन शिव के दर्शन होते है। वो दिव्ये जगह जहाँ पर मृत्यु शैया पर मानव शारीर काठमांडू की वायु में मिलकर शिव का दर्शन कराता हैं तो दूसरी और वो शम्भू को आवाज लगाता माओवादियो को मुह चिडाता आधुनिक वैदिक हिन्दू जाति का एक सामान्ये मानव। वो पशुपतिनाथ की बागमती जो किसी षड़यंत्र के तहेत आखरी सांसे गिन रही है। अपनी गंगा की तो सुध किसी ने ले ही ली चाहए पर्यावरण के नाम पर ही सही। परन्तु उस बागमती, जिसको की उतने पानी का हजारवा हिस्सा भी नहीं जितना की आपके दिल्ली के सोनिया विहार प्लांट में होगा। परन्तु कुछ नहीं वहा पर तो वो १०-१२ साल के ओजस्वी हिन्दू बालक वैदिक शास्त्रों की पढाई पढ़ते और बोलते तो लगता की मुहं से फूल बरस रहे हो। वो अघौड़ संत जिनको की आपके पैसे की परवाह नहीं जिस से की वो भी आसमान में अट्टहास करती ईमारत अपने आश्रम की बनाये। बस लालच हैं तो इस बात का की वो शम्भू के मंदिर के कपाट कब खुलेंगे और कब अपने पशुपतिनाथ के दर्शन होंगे। तंत्र और मन्त्र के एक से एक धुरंधर बिखरे पड़े है परन्तु न किसी की इच्छा और न किसी का स्वांग बस एक ही आवाज जय शम्भू और शम्भू शम्भू। यह हिन्दू, उस चेतना से की शिव अब मिला और कब मिला, न परवाह इस बात की की माओवादियो ने शंकचार्य द्वारा हटा दिया गया पुजारी अपना बोरिया बिस्तर हिन्दुस्थान के लिया बांध चूका, न परवाह इस बात की की भगवन विष्णु का अवतार अपने वंशजो की साथ सिंगापूर पठा दिया गया है।

वो शिवरात्रि का दिन जिस दिन आपको इतनी लम्बी लाइन में लगना होगा की एक छोर तो पता होगा की पशुपतिनाथ पर है परन्तु दूसरा ढूंडने के लिए काठमांडू ही पार करना पड़ जायगा। और इसीको भक्ति भावः कहेते है। इसी को तो हिन्दू परमात्मा से साक्षात्कार कहेता है। और इन्ही हिन्दू राज संस्था के हत्यारों ने वो विष्णु का अवतार राजा और शिव की नगरी काठमांडू की की हिन्दू परम्परा के अविरल अदभुत संगम को सृष्ठी से अलग करने का महापाप किया है।

मैं पूछता हूँ की यह हिन्दू नेपाली राजा क्या उन अय्याश इस्लामिक शेख और खालिफाओ से भी क्रूर था जिनके के हरम में दस दस बारह बारह साल की असंख्य लड़किया होती है। या उनसे भी क्रूर था जो अपनी सत्ता बचाने के लिए लाखो सर कटवा दिया करते है। या उस लोकतंत्र से भी ज्यादा क्षमा मांगने योग्य नहीं जिसमे धर्मपत्नी और जवान बच्ची की होते भी व्हाइट हाउस से अपदस्त नहीं किया गया। या क्रूरता उस रॉबर्ट मुगाबे से भी ज्यादा थी जहाँ एक अमेरिकन डॉलर १०० करोड़ जिम्बावे डॉलर के बराबर होगया हो और सैकडो रोज मर रहे हो। जब भी सत्ता से चिपका है । क्या उसका चरित्र इंग्लेंड के युवराज चार्ल्स से भी गया गुजरा था। या मिया मुशरफ से भी ज्यादा बड़ा दुश्मन था जिसने की भारत को हजार घाव देते रहेने और एक कारगिल युद का संकल्प लिया था। जिसके लिए आज भी मीडिया कोंक्लाव में बुलाने के लिए पलक पावडे बिछाती हो। कम से कम इतना तो नहीं था और यदि तुमको उसमे कोई कमी लगी भी थी तो पूरी की पूरी हिन्दू राजसत्ता को ही क्यों समाप्त करने दिया गया? क्या कोई भी हिन्दू राजा नहीं बन नहीं साकता था? क्या एक छोटी सी हिन्दू ख़ुशी भी बर्दास्त नहीं ?

क्या मुझे कोई जवाब देगा की किस नेपाली और किस हिन्दू ने नेपाली राज संस्था हटाई है? अरे आज नेपाल में न धर्मगुरु है न राजा है। और नेपाली गरीब जनता जिसके अन्दर हिन्दू धरम की जड़े इस प्रकार से है जैसे की दूध में मक्खन हो। और भारत का लोकतंत्र उसको राष्ट्रपिता कहेता है जिसने की तुर्की के खलीफा के लिए असहयोग आन्दोलन चलाया था। जिसमे की निरही हिन्दू जनता को बिना किसी उसके हित के इसलाम की जड़ो को ही मजबूत किया गया था। अब आज के हिन्दू को आप पूछ कर देख लो नेपाल के राजा को हिकारत भरी दृष्टि से देखेगा और बिना तथ्य के जाने उसे पोलपोट (कम्बोडिया में नरसंहार का दोषी) श्रेणी में डाल देगा।

दोस्तों समय आगया हिन्दुओ को अपने अच्छे और बुरे सोचने का नहीं तो वो समय दूर नहीं जब हिन्दू अपने आपको अजायबघर के किसी कोने में खडा पायेगा। अपने पर गर्व करना सीखो और अपनी जड़ो की तरफ लौटो, उनको पहचानो और पाओगे की सारी समस्या का हल इसी मानवता की धरोहर हिन्दू जाति में है। मेरा एसा विश्वाश है बिना हिन्दू के समझे कोई भी इसकी सहयेता नहीं करेगा। हिन्दू को समझना होगा यह कोई प्राग - इतिहास की बात नहीं परन्तु तुम हिन्दू समझने को तैयार नहीं तुम्हें इनलोगों ने एअसा इतिहास पढाया और समझाया की तुम जो विश्व के बहुत बड़े भूभाग के स्वामी थे उसे आज के बचे खुचे भारत में ही अलाप्संख्यक बनाया जा रहा है।

तुम भूल जाओ खेमेर वंश को भूल जाओ तक्शिन को, भूल जाओ अपनी मेकंगंगा को, भूल जाओ जावा और सुमात्रा को याद मत करो उस परम्परा और गौरव को जो तुम्हारी शिराओ में बिजली का संचार करती हो, भूल जाओ उस गाथा को जिसने जापान और कोरिया तक में अधिपत्य किया था, भूल जाओ इंडोंएशिया की उस अवधारणा की जिसने उसको अपनी वायुसेना का "गरुड़" नाम रखने को प्रेरित किया हो, भूल जाओ थाईलैंड की स्वर्णभूमि को जो तुम्हे तुम्हारी हिन्दू परम्पराओ की दुहाई देती है, भूल जाओ अपने भूटानी भईयो को जिसको के तुम्हारे गुरु पदम्संभव ने हिन्दू तंत्र का उच्कोटी का श्रेष्टतम ज्ञान देकर एक भव्य महायान बोध हिन्दू पंथ की रचना की, भूल जाओ अपनी अधिष्टात्री ढाकेश्वरी देवी को, भूल जाओ अपने पूर्वजो के चीन के साथ घनिष्ठ संबंधो को। और याद रखो चार या पांच दशक के इतिहास को और मरे हुए साँप की भांति उसे ही गले से लटका कर संसार भर में बनो हंसी का पात्र। कौन रोकता है नेपाल की हिन्दू विरासत को नेस्तनाबूद करने से और अपने बच्चो को सेम्लेंगिक बनाने से। कोई नहीं रोकता झूटी और मक्कारी हंसी हंसने से।

कोई नहीं याद रखना चाहेगा की तुम ही मानवता के ध्वजवाहक हो। परन्तु परम्परा का बोझ कौन ढोना चाहेगा? उसके लिए तो वीर्यवान, तेजस्वी, सौम्य, प्रचंड, अदम्य और अभिलाषी हिन्दू युवक चाहिय और हमे धकेला जा रहा है एक "नव हिजडा संस्कृति" की ओर। और उसपर भी ठप्पा "प्रगतिशीलता" का लगा दिया गया।

Tuesday, June 30, 2009

श्री रामजन्मभूमि मुक्ति (६ दिस. १९९२) के बाद की वो अगली सुबह!!!!!!!!!!!!!!

सर्व प्रथम मक्का मदीना को प्रणाम, उसके बाद येरुशलम के सभी स्थलों को नमस्कार अब मैं अपनी बात की शुरुवात करता हूँआज हिन्दुओ की काली करतूतों की भांडा फोडती रिपोर्ट इस्लाम संगरक्षक हिंदुस्तान के प्रथम परिवार के प्रताप से बने भारत के आदरनिये प्रधानमंत्री को सौपी गईआज बहुत से प्रशन उठेंगे जब इस रिपोर्ट की बेला पर कांग्रेस (सत्ता प्राप्ति के बाद अधिक कांफिडेंट) को कुछ १७ साल पहेली बातें याद आगई तो क्यों मेरे मन में जो हूक उठी है उसे भी बयां किया जाए

याद आगई वो दिसम्बर की सुबह, वो दिसम्बर १९९२ की दुपहर भी मैं भी उस समय १० कक्षा का छात्र था और सारी घटनाय याद आरही हैमैं किसी भी राजनीती से अनिभिज्ञ थाउस सायं (६ दिसम्बर) एक बूढी और अंधी औरत बदहवास भागती मिलीमैंने पूछा माँ कहाँ जा रही हो तो बोली बेटा सुन नही रहे यह घंटो और घड़ीआलो की आवाजनही पता तुझे के रामजी आजाद हो गएमैं बोला क्या हुआ ? तो बोली दुष्टों की लीला समाप्त होगई मन्दिर जा कर प्रसाद चढा रही हूँऔर बदहवास वो किसी नजदीकी मन्दिर के तरफ दौड़ती चली गई

फ़िर मैंने भी शहर में देखा की जो जहाँ था वो वही से भगवान श्री राम की नारे लगा रहा थातो कोई शिवालय में घंटे और घडिया बजा रहा थालोग मन्दिर में दोपहर के दो बजे ही आरती कर रहे थे प्रसाद चढा रहे थेजिसे कुछ नही मिला वो चीनी या गुड चढा रहा थाऔर नही तो बनिया अपनी दुकान से सामान लुटा रहा थालोग एक दुसरे को बधाई दे रहे थेकुछ लोगो की आँखों में से अविरल आंसुओ की निर्मल धारा बह रही थीजो जहाँ खड़ा था वही से जय श्री राम और हर हर महादेव के नारे लगा रहा थापांडे पुजारी की इंतजार करे बिना मन्दिर के कपाट खुल गए थेमन्दिर के पुजारी अपनी धोती को समेटते हुए अग्रणी श्रदलुओ के बीच में अपने को छोटा मान रहे थे मानो कहे रहे हो की हम पीछे क्यों रहे गएबस में, रेल में बैठे हिंदू जये श्री राम के नारे लगा कर एक दुसरे को बधाई दे रहे थे

एक चीज निश्चित रूप से कहे सकता हूँ की यह उस शहर की बात है जिसको की आज के समय मुस्लिमो का उत्तर भारत में गढ़ कहा जाता हैउस शहर में दिसम्बर सायं तक किसी भी प्रकार का कोई भी संदेहे कोई भी घबराहट किसी प्रकार की कोई घटना नही थीमुझे इस प्रकार की शहर में खुशी देख कर ए़सा लगा की मानो मैं इतिहास की किताब में चला गयामुझे लगा की या तो देश की आजादी के समय इस प्रकार कुछ हुआ होगा या फ्रांस में क्रांति होने के बाद कुछ इस प्रकार से ही निश्चित रूप से घटा होगाएक ही समय में सभी लोग एक ही स्वर में जे घोष कर रहे थेवैसे मुझे शौक नही इस बात को कहेने का की उस समय हिंदू को किसी मुस्लिम के प्रति विद्वेष था और किसी मुस्लिम को हिन्दुओ की खुशी के ऊपर क्षोभ और हिन्दुओ की भावनाओ का वो जो जवार था उसमे मुझे लगा की मैं भी किसी इतिहास को अपने सामने बनते देख रहा हूँऔर आने वाली पीढी को बता सकता हु की एक बार हिंदू भी बिना किसी भेद भावः , मान अपमान के, समूह में आत्मीयता के भावः में बहेते हुए अपने को मिटटी और ब्रहम से एक साथ जुडा महेसुस कर रहा था

मुझे याद है वो ग्रहणी जो रोटी का बेलन उठाए सर के पल्लू का ध्यान रखते हुए मोहल्ले में चीनी बाँट रही थी, और वो छोटी सी गुडिया अपने बाप के कंधे पर बैठ कर मन्दिर का घड़ियाल बजा रही थी और उसका बाप मुह में शंख लगा कर असफल शंख बजाने की कोशिश कर रहा था

लोग कंधे से कंधे रगड़ते हुए मन्दिर की तरफ मुह करके प्रार्थनाए कर रहे थेमुझे हँसी भी रही थी और इतना उत्साह देख आँखों में आंसू भी ( अभी भी रहे है उस क्षण को लिखते हुए)। हँसी इसलिए रही थी की यह वो ही लोग है जो १५ अगस्त और २६ जनवरी को १० बजे सो कर उठते हैऔर सरकार की जबरदस्ती से सरकारी कर्यकर्मो में नाक भों सिकोड़ कर शामिल होते हैऔर आज यह लोग स्वप्रेरणा से अपने परिवार के साथ बिना किसी उत्सव, तीज त्यौहार के अपना सर्वस्व लुटाते से प्रतीत हो रहे हैं ए़सा हाल इस शहर का ही नही था हिंदुस्तान के हर शहर का यही हाल थाइस हिंदू उत्साह को किसी संघ ने जगाया था और ही किसी लाल कृष्ण अडवाणी ने और ही यह बीजेपी के वोटर थे और ही किसी मुस्लमान के दुश्मनथे तो केवल शुद्ध अन्तकरण से प्रेरणा लेने वाला विशुद्ध हिंदू जिसको की लगा हिन्दुओ के मर्यादा पुर्सोतम श्री राम अपनी प्रजा के लिए एक बार फ़िर रामराज्य लाने आगयइस हिंदू को लगा की हजारो वर्षो पहेले जिस राम की सीता पर संदेय कर के अपने अरध्ये को उसकी सीता से अलग कर जो अपराध किया था उस अपराध से मुक्त उने का कुछ कुछ भावः था

परन्तु जल्द ही मेरी कल्पनाओ को नजर लग गईभारत के निवर्तमान प्रधानमंत्री ने वही पर मस्जिद बनवाने की घोषणा कर एक धरम विशेष के अन्दर एक चिंगारी धद्कादी की शायद तुम्हारे साथ कुछ ग़लत हुआ हैबस फ़िर क्या था उसकी हिन्दुओ में प्रतिक्रिया भी आगई की श्री राम जन्मभूमि पर अबकी बार कुछ भी कारस्तानी बर्दास्त नही होगी

बस
बाकि सब तो इतिहास है

अब
जब कोई रिपोर्ट आई है तो हिंदू की काली करतूत ही होगी की वो क्यो वामपंथियो का इतिहास नकारता है और नकार कर राम को अयोध्या में बताने का पाप करता हैऔर जब यह पाप किया है तो कोई कोई सजा तो इन संविधान विरोधी, वाम इतिहास विरोधियो को मिलनी ही चाहिय


अब बात करते हैं आज कीजो बात मुझे समझ नही आती की हिंदू यदि अयोध्या, काशी, मथुरा मांग रहा था और है तो क्या ग़लत हैआप मुझे कहेते हो की आपका धरम जिन्दाबाद तो जिंदाबाद है मुझे कोई भी ओब्जेक्शन नही हैमैं तो मक्का मदीना को प्रणाम कर कर ही इस लेख की शुरुवात की हैपरन्तु आप मुझ मेरे धरम को मुर्दाबाद क्यों बोलने और करने के लिए कहे रहे हो।क्यों राम का मन्दिर नही बनने देते और जो बना है राम सेतु उसे तोड़ना चाहते हो। यह कदापि स्वीकार नहीआपका धरम जिंदाबाद है परन्तु मेरा धरम भी जिन्दाबाद हैजो लोग बाबरी ढांचे और राम मन्दिर की तुलना करते है वो हिन्दुओ को हीन, कमजोर और बे-गेरत करते है

आज मैं यदि श्री राम जन्मभूमि की बात करता हूँ तो अपने देश की धरती पर अपने आराध्य जिसका का यहाँ पर अधिपतये था और है और रहेगा। उसकी बात करता हूँमें किसी ऐसे हिंदू राजा की बात नही करता जो श्री लंका गया या थाईलैंड गया और उसने वहा अपनी पूजा के लिए मन्दिर स्थापित कियामैं उस मन्दिर की भी बात नही कर रहा हूँ ही मैं इतिहास में जाकर किसी अरब राष्ट्र से किसी भी हिंदू मन्दिर की भीख मांग रहा हूँ मैं तो बबियान में टूटे मंदिरों के अधिकार की बात भी नही कर रहा हूँमैं बात करता हूँ हिन्दुओ के परम अराध्य देवी देवताओ कीमैं बात करता उन वीर हिंदू साहसी और पराक्रमी राजा भोज और विक्र्मदितिये की जिन्होंने बहुत से आज के देशो में बिना किसी विवाद के सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया थाउनको तोड़ दिया गया मैं उनके तो पुनर्स्थापना के लिए लड़ रहा हूँ और ही मुझे किसी देशो को इस बारे में कुछ कहेना

मैं मानता हूँ जो हो चुका वो हो चुका वो उनका देश है वहा पर उनका हक़ है परन्तु अब हिन्दुस्थान में क्या बने और क्या बने यह बांग्लादेश और पाकिस्तान के मुस्लमान निर्णय करेंगे? दिसम्बर १९९२ के बाद कितने मन्दिर बांग्लादेश और पाकिस्तान में नेस्तनाबूद कर दिए गएउन मंदिरों का क्या कसूर था? और इन ही मुसलमानों की आंख और कान खोलते हुए बता दू की हिंदू यदि विद्वेष और सुनोयोजित रूप से यह ढांचा तोड़ता जैसे की बाबरी ढांचे के बाद सारे मुस्लिम देश में हुआ था तो काशी और मथुरा के साथ साथ वो ३० हजार मस्जिदे खतरे में पड़ जाती जो मन्दिर तोड़ कर बनी हैऔर हिंदू यदि प्रतिक्रियावादी होता तो कश्मीर में टूटे उन हजारो मन्दिर का हिसाब इसी देश के मुसलमानों से मांगने की कुव्वत रखता है क्या बाबरी के ढांचे के बाद एक भी मस्जिद खतरे में थी, नही थीपरन्तु उस दिसम्बर के बाद लाखो हिंदू सूली पर चढा दिए गए चाहए वो मुंबई में हो या किसी और देश में, कभी बम ब्लास्ट में तो कभी ट्रेनों में । आज तक उन नेताओ को संविधान का डर दिखा कर मुस्लिम गुंडई पर सवार पार्टी उनके रसूख और प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ कर रही है जिन्होंने हिंदू को हिंदू कहकर गर्व की अनुभूति कराइ

अरे इन नेताओ ने कुछ किया हो या नही इन्होने हिन्दुओ को बता दिया की चाहे शेर भेडो के साथ रह रह कर भेड़ जैसा व्यवहार करने लग जाए परन्तु तुम एक जिन्दा कौम हो जिसको बस एक छत्रपति शिवाजी की आवश्यकता पड़ती ही हैतुम वो कौम हो जिसके पौरुष में अभी जंग नही लगातुम सभ्यता की वो मूर्ति हो जिसको लाख उतेजित करने पर भी सडको पर अनान्यास ही नही उतर जातेतुम अपनी रक्षा करनी बखूबी जानते हो बस अपने पूर्व अवतारों की तरहे पाप का घडा भरने की इंतजार करते होपरन्तु इन सब बातो के बाद भी दुःख उस हिंदू जवार के खोने का हैवो हिंदू दोबारा से बाँट गया परन्तु इसी प्रकार जैसे सूर्य के सामने कुछ समय के लिए बादल आजाते हैंपरन्तु मुझे आशा है की फ़िर से कोई
छत्रिये कुलवंत सिन्हास्नाधिश गो ब्रह्मण पालक श्री मंत छत्रपति श्री शिवाजी महाराज जी जैसा नेतृत्व जाएगाउस दिन फ़िर से हिंदू कल्कि अवतार बन न्याय करेगा
और येंही था वो श्री राम जन्मभूमि आन्दोलन बाकि सब राजनीती और भांडगिरी हैऔर जो नस्ल इसको नही समझ रही वो जानले की आनेवाली पीढियो में वीर्ये नामक बीज भी समाप्त हो जाएगा परन्तु राम का अस्तित्व अक्षुण बना रहेगा.

Wednesday, June 24, 2009

और यदि आत्मा मरती तो दलाई लामा कब का कोमुनिस्ट हो गया होता !!!!!!!

क्या बँटा भारत हिन्दुओ का नहीं है? इसमे इतिहास यदि किसी एक आदमी को विश्व के १२० करोड़ लोगो का भाग्य विधाता बनाने की रसीद जारी कर सकता है तो वो शख्स जवाहर लाल नेहेरू है। इस व्यक्ति ने हिन्दुओ की किस्मत का फैसला अपनी मर्जी से विशेष रूप का हिन्दू इजाद कर के किया । आज मैं पूछना चाहता हूँ की कौन हिन्दू इस संसार में भारत जैसा सेकुलर होना चाहता है? और क्यों हिन्दुओ को इस सेकुलर शब्द का मोहताज होना ही पड़े। इस छदम पंडित श्री जवाहरलाल नेहेरू के तथाकथित वंशजो से ही पूछलो की क्या कालीकट की उस नौका को जिसमे विदेशी सवार थे को हिंदुस्तान में रहेने की इजाजत आज के इसी संविधान से पूछ कर दी थी? या चाणक्य ने चन्द्र गुप्त को सेलेकुस की बेटी की शादी इन सेकुलरों से ही पूछ कर की थी? अरे यह हिन्दू की थाती थी जिसके बलबूते पर हिन्दू फैसला लेते रहे है।
इसलिए ये लाल पीली किताबवाले वामपंथी और संविधान की ओट में छुपे नापुंसको को हिन्दुओ को सेकुलारिसम की परिभाषा सिखाने की जरुरत नहीं है। हाँ अपनी अधम राजनीती को जारी रखने के लिए इस मानवता की गौरवशाली धरोहर हिन्दू जाति को शर्मिंदा कर सकते हैं। क्या कोई कांग्रेसी मुझे एक उत्तर दे सकता है जब नेहेरू इतना ही बड़ा सेकुलर था तो क्यों अपने नाम के आगे पंडित लगाये घूमता था?
हाँ बात कर रहे थे १९४७ में हिन्दुतान के हिन्दुओ को जबरदस्ती सेकुलर जामा पहनाने की। धर्मनिरपेक्षता शब्द चाहे बाद में संविधान में शामिल किया गया हो परन्तु हिन्दुओ को गिरियाने की शुरुवात तो नेहेरू ने ही कर दी थी। मुझे आज तक समझ नहीं आया की वो करोडो हिन्दू जो अपनी जमीन, अपनी पगड़ी, अपना मान, अपनी इज्जत, अपनी माँ, बेहेन, बेटी, अपना सब कुछ लुटा कर हिंदुस्तान में क्या धर्मनिरपेक्षता की खटाई चाटने आये थे। वो आये थे अपने हिन्दुओ के हिन्दुस्थान में। परन्तु वो यहाँ आते अपनी पीडाओं को हिन्दुओ को बता कर एक ऐसे नए हिन्दुस्थान का निर्माण करते जिस से की हालात भविष्य में कभी भी दुबारा एअसे न बनते जैसे १९४७ में बने थे। परन्तु नेताजी को ठिकाने लगा कर, वीर सावरकर को दोषी बता कर, संघ को कटघरे में खडा कर कर, पाकिस्तान से लुटे पिटे हिन्दुओ को कुछ एक प्लाट दे कर और बाकि बचे हिन्दुस्थान के हिन्दुओ को सेकुलेरिसम का झुनझुना पकडा दिया ।
और लगे गाँधी के नाम पर धडा धड नोट छापने। बस बना कर रख दिया एक धुलधूसरित हिन्दुओ का अजायबघर।
जिसमे आज ६० साल बाद भी हिन्दू ही यह पूछता फिर रहा है की मुसलमानों को आरक्षण क्यों नहीं देदेते। अब चरखे वाले बाबा के इन बंदरो को कौन बताये की जिनके लिए तुम मुझे दीनानाथ बनने के लिए कह रहे हो इन्होने (पूर्वजो) ही तुम्हारे ही माँ बेहेन की इज्जत लुट कर तुम्हारे ही बाप दादों की छाती पर खूंटा गाड़ कर हिन्दुस्थान से अलग अपने रहेने के लिए दो देश १९४७ में ही ले लेलिये हैं।
और जो हिन्दुओ के लिए मिला था उसको नेहेरू - गाँधी परिवार ने चिडियाघर बना दिया।
जहाँ हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट को भी कई बार नीचा दिखा चुके यह सरकारी विदूषक । आज सुप्रीम कोर्ट हिन्दुओ को डराने के लिए ही इस्तमाल होता है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने १९९५ में हिन्दू शब्द की वियाख्या की थी और यदि उसका पालन सरकार ने किया होता तो सभी लोग हिन्दुस्थान के आज हिन्दू ही केहेलाते परन्तु फिर धर्म्निर्पेक्षेता की क्या दही जमाई जाती सो सुप्रीम कोर्ट को एक बार फिर धकिया दिया गया और फ़िर सच्चर नाम के विशुद हातमताई अवतरित हुए जिन्होंने अपनी ब्रहम लेखनी से एक बार फिर हिंदुस्तान के हिन्दुओ को अरस्तु और सुकरात की दिव्येद्रष्टि का परमज्ञान दे दिया। अथः एक बार फिर भारत के ही भूभाग पर मुसलमानों को आरक्षण की चिलम देने की सच्चर कमेटी रिपोर्ट पकडा दी ।
अरे जब हमारे मनमोहन सिंह जी ने ही हिन्दुओ को असली ज्ञान दे दिया था की ओ हिन्दुओ सुनलो की हिन्दुस्थान (पाकिस्तान और बांग्लादेश देने के बाद भी) के सभी भौतिक साधनों और संसाधनों पर इसलाम के वारिसों का ही प्रथम अधिकार है.
और हाँ यदि अभौतिक ज्ञान जिसको की तुम आज के युग में ढूंढ़ते फ़िर रहे हो को पहेले अंग्रेजो ने फिर मुसलमानों ने और फिर वामपंथियों ने मिटा दिया पर भी अपना अधिकार जताओगे तो बता दू की उसके लिए हम परम तेजस्वी सुप्रीम कोर्ट के काबिल वकील श्री कपिल सिबल को यह अधिकार देते हैं की यह सरस्वती शिशु मंदिर जैसे संस्थाओ के नाक में भी नकेल डाले फिर देखते हैं उन धार्मिक पुस्तकों को जिसमे राम सेतु को राम का बनाया बताया जाता है। सैम पित्रोदा को ज्ञान आयोग इसीलिए दिया हैं की इन हिन्दुओ के ज्ञान में सही बात ठोस ठोस कर भर दो। बाकि काम अम्बिका सोनी मीडिया में देख ही लेंगी।
अच्छा तो मित्रो बात कर रहा था की हिन्दुओ को बताया जाता है की तुम अपनी औकात में रहो जिन बंधुओ को विश्वाश नहीं होता तो मुझे बता दो की फ्रांस में सरकोजी ने एसा क्या कर दिया जो मुख्यधारा के चार चार बड़े चैनल प्राइम टाइम में मुसलमानों के बुर्के पर गंभीर मंत्रणा करते हुए दिखे। क्या हिन्दुस्थान में गरीबी कम होगी या देश में सभी गरीबी रेखा से ऊपर आगये, या अमरनाथ में हिन्दू तीरथ यात्री मरने बंद होगये, या मानसरोवर में फसे सभी हिन्दू यात्री घर आगये या भारत का एक रुपया ५० डालर के बराबर होगया जो हिंदुस्तान के चैनल मुसलमानों की खुदमुख्तारी की सुपारी लेकर सीधा फ्रांस से टकराने को तैयार होगये। अरे हद तो जब हो गई जब भारत के विदेश मंत्री ने भी फ्रांस से एसा करने पर एतराज जाता दिया। भाई हद होगई एसा अब्दुला तो हिंदुस्तान में ही दिख सकता हैं अब पता नहीं की एक सम्मानित विदेश मंत्री की इस बिजली सी फुर्ती भरे बयान की वज़ह क्या है? वो तो मैं नहीं जानता परन्तु विस्मित जरुर हूँ और फिर ऊपर से येही सरकार मुझे धर्मनिरपेक्षता की शरबती ठंडाई पिलाती है। भाई वाकई ऐसी दोरंगी नीति का तो अमरीका भी कायल हो जाये।
अच्छा बात फ्रांस की तो यार एअसा फ्रांस ने क्या कर दिया जो सौ से ऊपर मुस्लिम देशो के पेरिस में बैठे अम्बेसडर उसको करने से नहीं रोक पाए और हिंदुस्तान की सरकार और न्यूज़ चैनलो ने इस मामले को भारत की अस्मिता का प्रशन बना लिया या फ्रांस जहाँ का फैशन देख देख कर जवान हुए पत्रकार और नेता अब अपने चैनलो को ऍफ़ टीवी का मुकाबले में खडा करने की तयारी कर रहे है? भाई जिन अल्प ज्ञानी टीवी पत्रकारों को पता ही नहीं की सरकोजी किन राष्ट्रवादी वोटो से राष्ट्रपति बना है तो उनका क्या करे जो कार्लो ब्रूनी तक ही अपने ज्ञान के अन्तरंग चक्षु खोलना चाहता हो। अरे भइये यह सरकोजी उन धुरंधर राष्ट्रवादी वोटरों के वोटो से बना राष्ट्रपति है जिसको दोबारा से चुनावो में भी जाना है और फ्रांस के राष्ट्रवाद को भी जिन्दा रखना है। इसलिए उसने एसा किया हमारी तरहे तो हैं नहीं की मंदिर बनाते बनाते अपने हिंदुत्व को ही आज बचाने की नौबत आगई। अरे भैया, राम जी का मंदिर बनाने से शुरुवात हुई थी और आज हद यह होगई की हमे ही बैठे बैठे हिंदुत्व के दर्शन पर स्पष्टीकरण देना पड़ गया। वाकई चौब्बे जी दुबे बनगए। फ्रांस पर यह दोयम दर्जे के राजनीती तो इतना ही साबित करती है की अपनी माँ तो मर गई अँधेरे में और धी (बेटी) का नाम लालटेन।
हो सकता हैं इतना बताने पर कुछ नाम के हिन्दू मेरा विरोध भी करे। भाई हो भी क्यों न सेकुलर सरकार की बाकायदा स्कुलो में शिक्षा ली है तो भइया जी एक और बात बता दो की यह हिन्दुतान में दिल्ली से हरिद्वार जाने वाली ही सड़क क्यों नहीं बनी है। जब की आगरा, अजमेर, जयपुर, चडीगढ़ और माशाअल्लह पुणे मुंबई एक्सप्रेस हाई वे बने इतने साल हो गए। अब कुछ सेकुलर बिरादरी वाले आरोप लगा देंगे अरे देखो हर चीज में हिंदुत्व दीखता है इस हिन्दू बावले को। तो भैया यह आरोप भी स्वीकार है। तो भाई न राम जन्मस्थान पर मस्जिद बनी उसपर बोलू, न मथुरा पर, न काशी पर, न कुतुब्मिनारी मंदिर पर, न आगरा के ताजमहल पर और न उन हजारो मस्जिदों पर जो हिन्दुओ के मंदिरों की छाती पर बनी है। तो भाई देश के वातावरण को शांतिपूर्ण बनाने के भरपूर प्रयास करते हुए न बहराइच में परसों पिटे हिन्दू की, न मेरठ में लुटे हिन्दुओ की (पिछले हफ्ते), न लखनऊ में हत्या हुए हिन्दुओ के नेता की (कल), न बात करता सूरत के बलात्कार की और न ही बात करता हिन्दुओ को बधिया करने के एक तरफा मुस्लमान वोटो की। अरे तो अपनी तो बात कर सकता हूँ तो भइया मुझे कोई यह बता दो की हिन्दुओ के जीवन में हरिद्वार का क्या महत्व है जो देश भर की चार, छ , आठ लेन सड़क तक बन गई परन्तु दिल्ली से हरिद्वार जो की एक मात्र जाने का मार्ग है उसकी चांदनी चौक टाइप संकरी सड़क क्यों है? परसों सोमीअमावस्या थी हरिद्वार से दिल्ली एक गाड़ी से दूसरी गाड़ी में एक इंच भी जगह नहीं थी। तो जो सरकर उर्स के इश्तहार देने के लिए करोडो रूपया अखबारों में खर्च कर रही है वो हरिद्वार के बारे में क्या सोच रही है? क्या इस मांग को करने पर मुझे मीडिया भगवा गुंडा तो नहीं कहेगी या सरकार मुझे हिन्दू आतंकवादी तो नहीं कहेगी भाई डर तो यही लगता हैं पता नहीं किस किस से अपने देश में साँस भी लेने की इजाजत लेनी होगी। भाई यहाँ खाड़ी का पैसा भी नहीं जो कुछ कर लेते हम तो सरकार के ही भरोसे है। सुना है कांग्रेस ने चुनाव से पहेले मुस्लिम बस्तियो में मुस्लमान को सरकारी बैंको के जरिए सात आठ महीनो में ही अरबो रूपये बाँट दिए और हम हैं की अडवाणी की उम्र पर ही नाक भों सिकोड़ रहे है।
अच्छा तो बात कर रहे थे हिन्दुओ के अधिकारों की खैर जो पिछले १००० साल से दुसरे दर्जे की जिंदगी जी रहा है उसे अधिकार देकर क्या चाचा नेहेरू की क्रीज जमी जैकेट में लगे गुलाब को बदबूदार बनाना है। अरे तो भाई यह सावन में कावड का मौसम आने वाला है और मीडिया शिव भक्तो की भक्ति और त्याग तो देखेगी नहीं उनकी मुजबुरी का मजाक बनाया जायेगा। हाँ इसी भक्ति पर कल अजमेर गई कैटरिना कैफ की तारीफों के सभी चैनलो पर कसीदे पड़े गए। तो दिल्ली की सेकुलर सरकार इन २५ लाख कवडियो को इंतजाम तो कर देगी जिस से यह भी अपने शंकर पर जल चढा दे। या इनके जल का भी मजाक उड़ाया जायगा। मीडिया तो उडाती है और धड़ल्ले से इनको देश के कानून व्यवस्था बिगाड़ने का आरोप लगाती है। जब हजारो वर्षो से हिन्दू जनता हरिद्वार का गंगा जल विभिन् शिव मंदिरों में चढाती है तो क्यों इनके लिए अलग से कोई व्यवस्था होती जिस से ये हिन्दू भी अपनी धार्मिक कार्यविधि निर्बाध रूप से कर सके। अब सोचो एसा ही कोई मुस्लिम कार्यकर्म होता अरे इस बात पर सरकारे तो छोडो संविधान बदल जाते, अपने तो बदल ही जाते यहाँ तक ये विदेशो के भी बदल देते जैसे की फ्रांस के बदलने की कोशिश कर रहे है (जैस की बुर्के जैसे नाहक ही छोटे वाकया पर किया जा रहा है) तो सरकर जी मेरी विनती हैं मेरे सभी नागरिक अधिकार तो आपके ४२ बार खारिज संविधान ने बंधक बना ही दिए (उसकी उलजुलूल सेकुलर लोगो की व्याखा की वेजेह से) अब धार्मिक अधिकार जिनको की पहेले से ही नेस्तनाबूद किया हुआ है तो जो बचा हुआ अनुष्ठान है इसको सुचारू रूप से करने के लिए कृपया हरिद्वार - दिल्ली सड़क को उसकी श्रद्धालु के हिसाब से तवाजो दे कर हिन्दुओ नामक प्राणी को देश के बचे कुचे कोने में साँस लेते रहेने की उन पर कृपया करो। हाँ मुझ से उमीद मत करना (हिंदू होने के नाते) मैं मंदिरों को बहुत दान देता हूँ जिसके ऊपर भी आपका ही कब्जा हैं और जिनसे मैं लाखो की संख्या में मदरसों के लिए कंप्युटर खरीदते और बंटते देख रहा हूँ। इसलिए की यह लोग इनसे कुछ पढ़ कर इस देश में शांति बख्शेंगे।
रही बात हमारी तो इस कम्बखत शांति के लिए ही तो आज हमारी हालत यह होगई की हिन्दुओ के अत्यंत परम धार्मिक स्थल के लिए एक अदद ढंग की सड़क की मांग मुझे करनी पड़ रही है। उस पर भी इस बात पर हलकान हुए जा रहा हूँ की कही कोई मुझे हिंदुत्व से जुड़े मुद्दे उठाने का अपराधी घोषित न कर दे। क्या करू हजूर आत्मा नहीं मानती है इस शारीर को तो आपका कानून बांधे ही हुआ है। और यदि आत्मा मरती तो दलाई लामा कब का कोमुनिस्ट हो गया होता।

Thursday, June 18, 2009

संघ! हिंदुत्व ! चीन ! यहूदी ! और ब्लू प्रिंट!!!!!!!!

समय आगया है अब जब संघ के विचारो को दिशा दी जाये. संघ हिंदुत्व के चाणक्य के रूप में परिभाषित हो. जो की समाज का सर्जन करता हो। यह एक एसा वृक्ष है जिसकी की एक निश्चित अन्तराल (१०० वर्ष में एक बार) पर कटाई और छटाई हो ही। संग को मूल रूप से कुछ बातों पर अब गौर अवश्य करनी होगी।
  1. संघ को भारतीयता और हिंदुत्व को अलग से परिभाषित करना होगा।
  2. संघ को अपने को दिशा देनी होगी की वो भारत तक सिमित रहेना चाहता है या उसका वैश्विक रोल हो। अर्थात संघ भारत (भारतीयता) का प्रतिनिधित्व करता है या विश्व के हिन्दुओ का प्रतिनिधित्व करता है।
  3. संघ को परिभाषित करना होगा उसका सिख, बोद्ध (चीन, जापान, कम्बोडिया और थाईलैंड) प्रकृति पूजको (अफ्रीका) से क्या सम्बन्ध होगा।
  4. संघ कहेता हैं की वह सांस्कृतिक संघठन है परन्तु उसकी संस्कृति हिंदुत्व है या भारतीय (आज के भारत जो की एक संविधान के अतेर्गत) ।अब कुछ वो बातें जिन पर लोग संघ को विचार में विज्ञानिकता और नूतनता लाने को कहेते है। मैं पूरे तथ्यों के साथ कहेता हूँ की यह दोनों बातें संघ के विचारो में है। इसलिए बात सिर्फ दिशा की है। संघ को पहेले तो इसलाम फोबिया से बहार आना पड़ेगा। संघ को हिंदुत्व के धनात्मक पक्ष पर ही ध्यान देना होगा। संघ को पहेले भारत में ही हिंदुत्व की वो बातें निकालनी होंगी जिनसे की भारत देश में बसे लोगो में एकत्व का भावः बने और हिंदुत्व की धुरी पर टिके। दूसरा संघ अपने मुह पश्चिम से पूर्व की और करे। हिंदुत्व की वो भूली बिसरी परन्तु अब तत्पर कम्बोडिया, थाईलैंड, म्यांमार, श्री लंका और जापान की तरफ देखना होगा। जो हिंदुत्व से जुड़ने की हर संभव कोशिश कर रहे है। बैंकाक (थाईलैंड) विश्वे के सर्वश्रेष्ठ हवाई अड्डो में से एक स्वर्णभूमि एअरपोर्ट में भगवन विष्णु की समुन्दर मंथन करती हुई विशाल भीमकाय मुर्तिया। इस बात को परीलक्षित करती हैं की थाई लोगो में अपनी पुरातन और सम्रद्ध संस्कृति से जुड़ने की कितनी उत्कंठा हैं।

क्या भारत (कथित सेकुलर) में येह संभव है। विश्व को संघ यह समझाय की बुद्ध हिन्दुओ के आराध्य देवे थे और हैं भगवन बुद वो नौवा अवतार हैं जिस विचार पर हिन्दू धरम टिका है। चीन आज भले ही कोमुनिस्ट देश हो परन्तु वहा पर हिंदुत्व (जब बोद्ध हिंदुत्व का ही एक अंग है) की जड़े बहुत ही गहेरी हैं। मेरी इस बात की पुष्टि पांचजन्य के पूर्व संपादक श्री तरुण विजय जी से भी की जा सकती है। आज संघ को इस बात पर विचार करना होगा की यदि भारत, चीन, मयन्मार, नेपाल, श्री लंका, कम्बोडिया, थाईलैंड, जापान, कोरिया यह देश जो सवाभाविक रूप से हिंदुत्व की परम्परा के वाहक है को कैसे जोड़ा जाये। परन्तु संघ जब तक यह नहीं कर पायेगा जब तक भारत और हिंदुत्व की अलग से परिभाषित नहीं करेगा।

इस के लिए संघ को विचारना होगा की - सभी भारतीय हिन्दू हो सकते हैं परन्तु क्या सभी हिन्दू भारतीय हो सकते है।

यदि संघ ने इस पर विचार कर लिया तो संघ कम से कम आज की भारत में निहयेत ही निम्न और दोयम दर्जे की राजनीती से बच कर हिंदुत्व के विकास का वास्तव में मार्ग प्रशिक्षित करेगा। जब आप हिंदुत्व के साथ भारतीयता को भी लेकर जाओगे तो दुसरे देश में रहेने वाले हिन्दू भारत माता की जय क्यूँ करेंगे। जब हम हिन्दू भारतीयों को अपनी जन्मभूमि पर गर्व हैं तो वो हिन्दू जो दुसरे देशो में रहेते है तो उनको वहा की जय जय कार करनी दी जाये। अभी में कुछ समय पहेले नेपाल में था पशुपति नाथ मंदिर परिसर में बहुत ही भव्य कार्यक्रम था वहा पर सभी मुख्य ऋषिगन भारत के ही थे तो जिस प्रकार हमारे मंदिरों में अंत में सभी देवी देवताओ की जे जे कार की जाती है उसमे भारत माता की जे होती है (और हिन्दू भारतीय होने के नाते मैं भी करता हूँ और मुझे गर्व है) तो नेपाल में भी करवाई गई परन्तु बहुत से देशभक्त नेपाली हिन्दुओ में यह संकोच का भावः हुआ की भारत माता की जय जय कार करू या न करू। तो संघ को इस बात को समझ न होगा की धरती पर लाइन (जो की अधिकतेर अंग्रेजो ने खिची है) को देश मान कर हम राजनीती करने लग जाये तो हिंदुत्व का रास्ता तो बाद ही होगया समझो। हिंदुत्व अग्रेजो के द्वार खिंची किसी भी बड़े भू भाग से कही बड़ा है। हाँ यह सत्य है की में भारत में रहेता हूँ परन्तु यह भी सत्य ही की यह मेरा (हिंदुत्व की द्रष्टि से) अधुरा भारत हैं। इसलिए हमे आधुनिक समय में अंग्रेजो द्वारा खिंची हुई लाइनों के हिसाब से ही चलना होगा और मुझे कोई फरक भी नहीं पड़ता परन्तु यदि संघ के लिया यह कटा छठा देश ही हमारे हिन्दुओ का भारतवर्ष है तो गलत है।

संघ को अपनी दिशा में तिक्षीनता लाने के लिए हिन्दुओ का पुरोधा वाक्य वसुधेव कुटम्बकम का सही अर्थो में पालन करना होगा। अर्थात हिन्दू भारत में राजनेतिक तौर पर तो रह सकता हैं परन्तु संघ के लिए हिन्दू धार्मिक रूप से विश्व का है। और संघ को विश्व के हिन्दुओ की बात धार्मिक और संस्कृतिक रूप से सुन कर उसपर निर्णय करना होगा।

जैसे की मलेशिया में पीड़ित हिन्दू, श्री लंका में पीड़ित हिन्दू (हलाकि सिंहल भी हिन्दू ही है) को भारत सरकार से इतर जा कर संबोधित करनी ही होंगी। भारत सरकार से हिन्दू न तो बंधा है और न भारत सरकार में इतनी शक्ति हैं की विश्व के १०० करोड़ हिन्दुओ की देख रेख कर सके वो तो भारत के नागरिको की सरकार है (संविधान के हिसाब से) और उसमे सभी वर्गो के लोग शामिल है। मैं यह भी नहीं कहेता की हिन्दू या संघ भारत सरकार पर दबाव भी न बनाये। अवश्य बनाये परन्तु वो अधिकतेर नागरिक अधिकार होंगे। आज हम हिन्दू भारत देश में काशी , मथुरा और अयोध्या के लिए और न जाने कितने असंख्य मुद्दे है जिन पर की नाराज हुआ जा सकता है। परन्तु उसमे सरकार का दोष मानना ही गलत है और संविधान बदलने की कुव्वत हम में हैं नहीं। इसलिए संघ को इसमें उलझना ही नहीं चाहिय। अभी आप देखो चीन में कोमुनिस्ट सरकार कितने साल है (अब यह बात कहे कर में चीन का विरोध नहीं कर रहा हु) क्योंकि चीन की कोमुनिस्ट सरकार अपनी साम्यवादी निति बदल सकती हैं (जो की मार्क्स के बिलकुल विपरीत है) तो क्या कभी धार्मिक निति नहीं बदल सकती अवश्य बदल सकती है। आज जो लोग चीन गए हैं वो जानते है की चीन में हिंदुत्व (यदि बौध को हिंदुत्व का हिस्सा माने) की जड़े कितने गहेरी है। शायद उतनी तो भारत में भी नहीं। संघ अपनी शक्ति चीन और जापान में क्यों नहीं बढाता। सोचो भारत - चीन - जापान हिंदुत्व की एक सामजस्य सोच पर एकमत होजये तो विश्व का नक्शा क्या होगा। अब इसमे अपनी संस्कृत जो निश्चित रूप से हिंदुत्व है से कम्बोडिया और थाईलैंड कितने कुलबुला रहे है।

क्यों संघ हिन्दुओ को शिक्षित नहीं करता की कम्बोडिया के अंगकोर वाट के मंदिर भी हिन्दुओ के धार्मिक स्थल में शामिल किये जाये। क्यों संघ शंकराचार्य जी की पुरानी परम्परा को संशोधन कर कर उसे विश्व में लागु करे। शंकराचार्य जी ने तो भारत वर्ष (जो की आज इंडिया की नाम से है) में ही अपनी पीठ स्थापित की थी संघ उसको पूरे विश्व में फैलाता क्यों नहीं। उसमे पाकिस्तान की हिंगलाज देवी, लव कुश मंदिर (पाकिस्तान), अंगकोर वाट (कम्बोडिया), श्रीलंका, बामियान (अफगानिस्तान), कैंडी, बारबुदुर और जावा (इंडोनशिया), अग्नि मंदिर बाकू (अजरबेजान), ढाकेश्वरी मंदिर (ढाका),कीनिया, फिजी, गुआना, बन्दर अब्बास (इरान), वाट फाऊ (लाओस), वाट रोंग खूं (थाईलैंड) ऐसे बहुत से हिन्दुओ के बड़े मंदिर हैं। क्यों हिन्दू भारत के ही मंदिर को तीर्थ मानता हैं। हम अभी हल ही के ढाकेश्वरी और हिंगलाज देवी के पाकिस्तान और बांग्लादेश के मंदिर भूल चुके हैं। तो संघ को शंकराचार्य की पुरानी परम्परा को विस्तार देना होगा। और मुझे लगता हैं इसी काम को संघ को अपनी एक स्तम्भ बनाना होगा। इनकी जानकारी अपने साहित्य में करनी होगी। यह हिन्दू जो पैसे कमा कमा कर उसका निर्लजरूप में उपभोग संस्कृति में लगे हैं उनको उद्देश्य और दिशा भी संघ को ही देनी होगी। शंकराचार्य जी के समय में भी एअसा ही था और आज भी वैसा ही हैं और संघ को वोही परम्परा का पालन करना होगा।

दूसरा संघ को यह ड्रामा (क्षमा करे) मुस्लमान को जोड़ने के लिए एक अलग से इन्द्रेश जी के नेत्रत्व में विंग बनाने की तो बिलकुल ही आवश्यकता नहीं है। अरे येह राजनेतिक है यह काम तो राजनेतिक पार्टियों पर ही छोड़ देना चाहिय। संघ का जनम कम से कम इस क्षुद्र काम के लिए तो हुआ ही नहीं। इस इस्लामिक फोबिए से तो बिलकुल ही बहार निकलना होगा। आप इस का मुकाबला कमसे कम आज जैसे समय और संघ की इस सिमित शक्ति से तो बिलकुल ही नहीं कर पाओगे। २०-२२ साल का अरसा बहुत बड़ा तो नहीं पर काफी होता है संघ के १९२५ में स्थापित होने के बाद भी संघ १९४७ में भारतवर्ष और हिन्दू के बहुत बड़े भू भाग को इस्लामिक हाथो में जाने से रोक नहीं पाया। तब संघ के होते हमने हिन्दू परम्परा के एक बहुत बड़े भू भाग को गवा दिया और अभी भी भारत में ८५ साल के संघ के बाद भी हिंदुस्तान में हिन्दू किसी भी सूरत में सुरक्षित, समानित, सुखी नहीं कहा जासकता। मैं यह नहीं कहेता संघ ने कुछ भी नहीं किया संघ ने वो काम कर दिया की आज देश की रोते बिलखते कुते बिल्ली की जिंदगी बिताते लोग संघ रूपी वटवृक्ष के निचे खडा हो सकता है।

एक आसरा हैं हिन्दू के पास संघ के रूप में। संघ क्यों यहूदियो से अपने संपर्क नहीं बढ़ता क्यों संघ स्पष्ठ रूप से धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से (राजनेतिक अभी नहीं क्योंकि यहाँ पर भारत सरकार से सम्बंधित दुविधाये आजाएंगी) संबध बनाता। जितनी इस्राइल के रूप में संघ हिंदुत्व को सक्षम बना सकता हैं उतना कोई भी नहीं बना सकता। और मैं इस बात को कोईं छुप कर नहीं बड़े स्पष्ठ रूप से कहूँगा की यहूदियो के पास ताकत है, ज्ञान है, संसाधन है परन्तु मानव शक्ति नहीं और हमारे रूप से १०० करोड़ का मानव संसाधन है। उसको यह चाहिय और हमे वो जो यहूदी भईयो के पास है। दूसरा यहूदी हमारे वो ही यदुवंशी हैं जो द्वारका से उसके डूबने पर इसेरेअल में जाकर बस गए थे। यदि इनको विज्ञानिक तरीके से खोजा जाये तो सभी को इस तथ्य का पता चल सकता है चाहए तो डीएनए टेस्ट करा लो अभी यहूदियो ने स्वयम नागालैंड में अपने पूर्वज खोजने की पुष्ठी की थी। संघ भारत से बहार अपने धार्मिक स्थल पर हिन्दुओ को जाने के लिया प्रेरित करे उनको वित्तए सहयेता भी करे। जापान - चीन (जिसमे तिब्बत शामिल है)- कम्बोडिया - विअतनाम-ताईवान- थाईलैंड - मयन्मार - श्रीलंका- नेपाल - इसेरेइल से धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से हिन्दू से हिन्दू संपर्क पर जोर दे। भारत माता (जिस पर की मुझे गर्व है और मेरी आराध्य है जनम भूमि की वेजेह से) उसका कृपया धर्मिकरण न किया जाये नहीं तो आप जो हिन्दू तो है भारतीये नहीं उसके नागरिक अधिकारों में अनावश्यक बाधा डालो गे ।

अब आप सोच की ऊपर लिखी शक्ति यदि वास्तव में एक हो जाये (जो की निश्चित रूप से होगी) तो हिन्दू विश्व का फिर से वो ही उद्धार करेगा जैसा की हिन्दुओ ने अपने स्वर्णिमकाल में कभी किया था। अब कुछ बाते आज की जो आवश्यक चुभने वाली है। संघ सिमित होता जा रहा है। किस रूप में यह भी समझना होगा।