Friday, July 30, 2010

हिन्दुओ में जाति एक घोर अपराध !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

हिन्दुओ में जाति एक घोर अपराध!!!
आज किसी भी हिन्दू से पूछो तो कूद कर अपनी जाति बताएगा और उसका बखान भी बखूबी करेगा. हम यदि आज जाति को समझने की कोशिश करे तो बड़ी असफलता हाथ लगती है. आज किसी से भी पूछो तो जाति पर गर्व किया जायेगा उस पर भाषण भी दिया जायेगा और अपने खून की तारीफ में कसीदे भी पढ़ेगा और अंत में एक दो अपनी ही जाति में हुए किसी महापुरुष की गाथा भी सुना देगा. यह अच्छा तरीका है अपने मिया मिट्टू बनने का. मेरा अपना मानना है की जाति कुछ होती ही नहीं है. हिन्दू धर्म ने अपने निहित स्वार्थ के चलते इस ढकोसले को ढोने की परम्परा गढ़ी है. जानकारी के लिया बता दू की अंग्रेजो ने १८५७ की क्रांति का ताप देख कर हिन्दू समाज को जातियो में विभक्त करने की एक घिनौनी साजिश रची गई और देश में जाति आधारित जनगणना कराइ गई. तभी लोगो ने अपने अपने लिए जाति का टाइटल भी ढूंढा. और हड़बड़ी में अपने लिए जाति की व्यवस्था कर ली. सोचने की बात यह है की आज जिनको हम जातिया कहेते है उनमे से कुछ एक के नाम इतने भद्दे है की खुद जिसकी जाति या सर नेम है वो भी उसे नहीं रखना चाहेगा तो समझने के बात है की यह जाति आई कहाँ से. तो मेरा मानना है इस जाति व्यवस्था का उदय १८५७ के बाद की पहली जनगणना में हुआ था जो अंग्रेजो ने कराइ थी . एक बात स्पष्ठ कर दू की जाति और वर्ण दोनों अलग अलग व्यवस्था है. वर्ण काफी पहेले से शुरू किया गया था अमूमन माना गया है की मनु स्मृति से वर्ण की व्यवस्था हुई परन्तु मेरा मानना है यह उस से भी काफी पहेले से था. अंग्रेजो ने जैसे भारत को बाँटने के लिए जाति आधारित जनगणना कराई थी उसी प्रकार आज कांग्रेस भी जाति आधारित जनगणना करा रही है. अभी कुछ लोग मुझसे भी प्रशन करते है की और जोर देकर बताते है की जाति तो पुरातन काल से चली आरही है तो मित्रो बता दू यह तो बिलकुल ही गलत है. देखे भगवन राम की पीछे कोई जाति है क्या, कृष्ण के नाम या अर्जुन और पांडवो के नाम के पीछे कोई जाति है क्या, नहीं है तो यह कहेना गलत होगा की जाति उस समय से थी दूसरा जाति और वर्ण में अंतर है उस पर बाद में आएंगे. कभी कभी बड़ा ही कोफ़्त होता है की लोग जाति के लिए मरे जाते है बिना यह जाने की इसको तो कोई अस्तित्व ही नहीं. मेरे एक मित्र इस बात को गीता से जोड़ते है की गीता में लिखा है की जाति से बहार शादी करना या न करना और उसके परिणाम और कुपरिणाम है और गीता में सुपर विस्तार से बताया गया है. हाँ ठीक है. मेरे मित्र की बात बिलकुल ही ठीक है गीता में जातियो का जिक्र है परन्तु क्षमा करे यह वो जाति नहीं की यह यादव है वो कुर्मी, यह गुप्ता है या वो खत्री. मित्र उस समय जो जातीय थी वो थी जैसे मानव जाति, देव जाति, असुर जाति, गंधर्व जाति, वानर जाति, सर्प जाति, किन्नर जाति अदि और कृष्ण भगवान् ने गीता में एक जाति से दुसरे जाति में विवाह की मनाई की है जो एक जाति से दूसरी जाति में विवाह करेगा उसकी वर्ण संकर संतान उत्पति होगी और वो वंश नाशक होगी. यह एक सच है और मैं इसको मानता हूँ. महाभारत में इसका उद्धरण भी है और आप भी जानते होंगे की उस समय इस प्रकार की जातियों में विवाह हुए है जैसे की भीम का हिड़अम्बा से भीम मानव जाति से थे और हिड़अम्बा असुर जाति से परन्तु वनवास के समय पांडवो में से एक भीम को हिड़अम्बा से प्रेम होगया और फिर शादी. इन से एक संतान भी प्राप्त हुई जिसका नाम घटोत्कच था. जो की वर्ण संकर था. इसी वर्ण संकर संतान से भगवन कृष्ण ने गीता में इन से कुपरिणामो का जिक्र किया है जो कालांतर में मानव जाति और वंश के लिए हानिकारक होंगे. इस लिए एक रणनीति के तहत कृष्ण ने घटोत्कच का महाभारत युद्ध में इस्तेमाल करके उसको वीरगति को प्राप्त करवाया. तो इस प्रकार की जातियो के लिए ही गीता में कहा गया है. और कल को विज्ञानं इतनी तरक्की कर लेगा फिर से यह होना संभव होगा तब गीता की बात मोंजू होगी की मानव जाति अपनी जाति के आलावा किसी और से विवाह न करे. और यदि आज की जातियो के हिसाब से जाते है तो भगवन कृष्ण को यादव माना जाता है और कृष्ण पांड्वो छत्रियो के रिश्तेदार थे. राधा जी खुद गुज्जर थी. राजा शांतुनु की पत्नी सत्यवती हो जो की एक मछुवारे की बेटी थी या फिर भूमिहार अम्बा अम्बिका और अम्बालिका हो. तो कहेने का तात्पर्य है की जाति हमारी मानव मानी गई है न की जो सर नेम हम रख रहे है और उनके लिए मार काट कर रहे है. हिन्दू अपने को जाति में बाँट कर ही आज इस कष्ट में पहुंचा है और जाती ही तोड़ कर वापस अपने स्वर्णिम काल में पहुँच पायेगा. मुश्किल जरुर है परन्तु असंभव नहीं है. अपने तुछ स्वार्थो को त्याग कर ही एसा हम कर पाएंगे और हर हिन्दू को हर हिन्दू से रोटी और बेटी का सम्बन्ध बनाना होगा बिना किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हुए. दूसरा इस प्रकार के सम्बन्ध बनाते हुए में एक बहुत ही महत्वपूर्ण चीज पर जोर देकर बोलूँगा की इस बीच गोत्र का ध्यान जरुर रखना है. एक गोत्र में शादी तो घोर आपति जनक है. लोग पूछते है की क्यों गलत है तो मित्र एक ही परिवार को कमसे कम १५ पीढ़ी तक एक दुसरे से सम्बन्ध बनाने के लए रोका गया है जैसे जाति से बहार शादी करके रक्त दूषित होता है इसी प्रकार बहुत नजदीक रिश्तो सगोत्र विवाह करके संतान में विकृति आती है और अनैतिक भी है. देखिये यह है भी बहुत व्यहवारिक जिस प्रकार एक गाँव में अमूमन एक ही गोत्र रहता है और सभी एक दुसरे के भाई बहेन हुए तो बड़ा ही विश्वास और भरोसा एक दुसरे पर होता है और पूरा गाँव मिलजुल कर रहेता है अब जब यह कांग्रेस सरकार एक कानून बनाना चाहती है की एक ही गोत्र में शादी की जा सकती है जो की गोर आपतिजनक और हिन्दू धार्मिक कार्यो में दखलअंदाजी है. तो एक ही गाँव के भाई बहेन और उनके माता पिता तो फिर किसी पर भी विश्वास कर ही नहीं पाएंगे और बड़े ही विकृत यौन समंध और आपतिजनक सम्बन्ध बनने के संभव हो जाएगी. इस लिए ऋषियों ने इस प्रकार की व्यवस्था की थी जिस से गाँव में परस्पर विश्वास का माहोल हो और रक्त की शुद्ता बनी रहे. तो सगोत्र विवाह तो वर्जित है और न ही करना चाहिए. परन्तु सरकार तो उनके लिया आश्रितघर बनने पर तुली है और तताकथित पड़े लिखे भडवे टाईप लोग तो लव कमांडो फ़ोर्स भी बना रहे है.
मजे की बात है की हिन्दू समाज में रुडिया भी बड़ी अजीब ही बनी है जैसे एक सज्जन बड़े गर्व से मुझे मिलकर बताते है की उनकी बहु तो घर में बड़ा लम्बा घूँघट करके रहेती है, हम अपनी परम्परा को आज भी आधुनिक युग में अपनाते है और उनको उसपर गर्व है और ऊपर से तुर्रा यह की वो पढ़ी लिखी भी है. मेने उन सज्जन को कहाँ की किस हिन्दू किताब, शास्त्र , वेद में घूँघट के बारे में लिखा है. क्या सीता जी घूँघट पहनती थी या करती थी, वो तो स्वयंवर करती थी. और रामायणकाल में स्त्रिओ को इतनी छुट थी. परन्तु आप उसके पढ़ी लिखी होने के बात भी उसको घूँघट के बुर्के टाइप अन्धकार में मुसलमानों की तरह रख रहे है. क्या किस तस्वीर में गंगा, लक्ष्मी जी और दुर्गा को आपने घूँघट करते देखा है? क्या शंकर जी के साथ पर्वती जी घूँघट कर के बैठी है? तो २०० -४०० साल की रुडियो और विक्रतियो को हिन्दू समाज की परम्परा मत बोलो उनको ख़त्म करो. मुगलों के कारण उनके शासन में राजा और जैसे की बाकी मुस्लमान ही चूँकि उच्च पद पर थे और इस्लाम एक अभिजात्य पंथ मान लिया गया था , या तो उसके जैसे बुर्के की नक़ल में यह घूँघट आया है या फिर इन मुस्लिम आक्रंतो से डरकर हिन्दू ने अपनी बहु बेटी को परदे में रखा. परन्तु इस को हिन्दू अपनी परम्परा मानकर आज तक ढोह रहा है जो की घोर आपत्तिजनक और लज्जाजनक है. ऐसी बहुत से कुरतिया हिन्दू समाज में है जो गुलामी के समय मज़बूरी में कुछ करना पड़ा और उसको अपनी संस्कृति और परम्परा मानकर अब भी ढोह रहे है.
वापस जाति पर आते है तो अंत में मैं कहेना चाहूँगा एस मूर्खो के संसार से बहार निकलो और हिन्दुओ एक जुट हो जाओ और अपने निहित स्वार्थो को त्याग करके खाली नाम से जीना सीखो जातियो का ढकोसला वो करते है जो किसी सहारे की तलाश चाहते है और जो अपनी कोई पहेचान बनने में असमर्थ होते है. और कांग्रेस तो हिन्दू समाज को अगले १०० साल इस जाति आधारित जनगणना से पीछे धकेलना चाहती है. हिन्दू जब तक अपास में सगोत्र छोड़कर रोटी बेटी का सम्बन्ध नहीं बनाएगा तब तक हिंदुस्तान पर गैर हिन्दू और विदेशी ही राज करते और अपना घर भरते रहेंगे. इसलिए अपने पूर्वजो की तरह जाति विहीन समाज बनाओ और उसको सींचो.
जय भारत जय भारती.

4 comments:

  1. उत्तम लेख
    जाति तोड़ो,हिन्दू जोड़ो और राष्ट्र निर्माण करो...

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  2. इस बारे में मैंने भी पहले लिखा है, लोग जानकारी के लिये इसको भी पढ़ सकते हैं --

    क्या वर्तमान हिन्दू जाति व्यवस्था का कोई प्रमाणित शास्त्रीय आधार है?

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. tyaagi ji bahut sahi samjhaya kuch nasamjh logo ko apne bilkul sahmat hu apki baat se jaha or sabse badi vidambana to dekho ki muslman (shrukh khan ) hindu ladki se shadi kr sakta hai amir khan kiran rao se or saif kareena se ...magar ek hindu hindu hindu se shadi nahi kar sakta kyunki ye jaati beech me ajati hai to hamare jo hindu bhai hai unki sabse badi kamjori yahi hai ki ekjut nahi ho re hain or khud hi apne dharm me jaati paati me toote foote pade hian

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