Saturday, March 7, 2009

दर बदर हिन्दू।

पोंगे प्रगतिशील (स्वम्बू) लोग हिन्दुओ के जख्मो मैं नमक डाल कर उसमें सुई से कुरेद रहे है और यह सब पिछले ६० वर्षो से निरंतेर हो रहा है. क्या कभी किसीने सोचा है एसा क्यों है. नहीं सोचने की जरूरत क्योंकि जिनका शंकराचार्य ही हवालात मैं दिन गिन रहा हो उसका कौन वली वारिस है। अब यहाँ साउदी अरब की तरह कोई सरकार तो है नहीं जो इसे बचाय न ही इसईओ की वेटिकेन सिटी है जो इनके बचाव मैं आये. इनको अमरीका योरोप भी नहीं जंहा इनको नोकरी की गारंटी हो. मुसलमानों की तरह खाडी देश भी नहीं जहाँ इनको नौकरी पर रख लिया जाये. हाँ बचारे धर्मं बचने के चक्कर मैं कहीं चीन के भी हाथ नौकरी नहीं पा पाते. अच्छा भारत मैं शने शंने आरक्षण दिया जा रहा है. नौकरी कहाँ मिलेगी.
अब देखिया स्वं ही की एक छोटे से फिलिस्तीन के लिया १०० से ऊपर देश के मुस्लमान दुखी है। और पचास से ऊपर इसाई देशो को बमों से डरा रखा है. बेचारा अमरीका भी दुखी है. अच्छा लोग कितने है कुछ एक लाख फिलिस्तीन मैं.
अब इधर देखो बटवारे मैं एक करोड़ से ऊपर हिन्दू तबाह हुए। उनकी नसले आज भी दुखी. लाखो बहनों और माँओं ने अपनी इजत गवई वो अलग. घर बहार छोडा वो अलग. अब तो बम गिरे नागासाकी और हिरोशिमा के नसले सुधर गई परन्तु हमारे हिन्दू भाई अभी भी उस सदमा से बहार नहीं आये. उसके बाद भी नेहरू पंडित हैं और गाँधी महात्मा है. है न कमाल का जोक. फिलिस्तीनी लड़े तो यासर अराफात को शांति का नोबल परुस्कार. शमा प्रशाद मुखर्जी लड़े तो मौत. हैं न कमाल.
अच्छा कमाल दूसरा भी है. आप (जो सेकुलर नीचे टिपणी लिख कर हर ब्लॉग के नीचे अपनी सेकुलरईस्ट होने की तनखा की वफादारी निभाते है वो भी) बताएँ की पिछले २००० वर्षो मैं एक भी मानव अधिकार के लिया हिन्दुओ को भी कभी सुरक्षा मिली है. नहीं है तो क्यों? बटवारे मैं हिन्दू पिटे, पाकिस्तान गवाया, बांग्लादेश (१९४७) गवाया. मयन्मार (बर्मा १९३५ मैं), श्री लंका (१९०५ मैं ) अफगानिस्तान (१८९० मैं) गवाया। परन्तु कभी हिन्दुओ के देश गवाए गए वो तो छोडो, उनके वहा पर मानवअधिकारों का भी कोई नाम लेवा पानी देवा नहीं. और आश्चर्य की बात तो यह है की जो सेकुलर होने का ढोंग ढ़ोने वाली भारत सरकार भी अपने भारत्वंशियो की खैर खबर नहीं लेती. डरती है कही मुस्लमान न नाराज हो जाये.
अब बताओ की हिन्दुओ का क्या मानव अधिकार नहीं। चलो यार कोई प्रगतिशील मित्रो पशुअधिकार मैं ही ले लो. तुम्हारे बालो, झोलों, कुर्तो, कलम, लाल किताब के पन्नो, और अखबारों की सिहाई तो इन्ही के पैसो से आती हैं.
चलो भाई पुरानी बाते छोडो कश्मीर मैं तो कोई मानवअधिकार या सरकार इनको बचाओ। श्री लंका और मलयेशिया मैं नहीं कर सकती तो.
तो दोस्तों हिंदुस्तान के बूढे शंकराचार्य को जेल मैं बंद कर रखा है। कोई उसको भी बचाओ. हा कमाल येहे है की डॉ. विनायक सेन को बचाने के लिया इन्होने झारखण्ड के सारे कोएलो मैं से जितनी रोशनाई निकल सकती थी लिख लिख कर सब खर्च कर दी.
हिन्दू बेचारा यहाँ हिंदुस्तान मैं आज छाती ठोक कर भारत माता की जय भी नहीं बोल सकता। नहीं विश्वास तो सड़क पर कर के देखलो. अलोक तोमर की तरह जेल मैं टूस दिया जाओगे सम्पर्दयिकता के नाम पर.
जय बोलनी ही है तो कांग्रेस भैएयो की तरह स्लम डोग की बोलो. वो भी कई करोड़ खर्चे है. परन्तु लाख भी नहीं दे पाय अपनी बाप की चपल, कटोरी और चश्मा बचाने के लिय. जय हो प्रभु जय हो।
अब तो भैया हिन्दुओ के नाक मैं नकेल गिरा कर उस पर चढना बाकि है। अब हंक तो पहले से ही रहे है.
अडवाणी जी ने सही ही कहा था की आपातकाल मैं इंद्रा जी ने हमे झुकने को कहा और हम रेंगने लग गय.

2 comments:

  1. हिन्दुओं को अपस में लड़ने से फ़ुर्सत कहाँ ? कोई ऊँची जात का ,तो कोई दलित । कोई माले तो कोई बनिया ,जब मन एक नहीं तो एका कैसा और जब एका ही नहीं तो सुरक्षा हो कैसे ? वैसे भी हिन्दू सहिष्णुता की आड़ में अपना दब्बूपन छिपाता चला आया है आज तक ।

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